बिहू अटैक'—जब ढोल की थाप के बीच गूंजी गोलियां, लेकिन जीत 'संवाद' की हुई; एक ऐसी फिल्म जो शोर नहीं, सोच पैदा करती है
मुंबई/गुवाहाटी, दिनांक: 15 जनवरी 2026 — भारतीय सिनेमा अक्सर आतंकवाद और राष्ट्रवाद की कहानियों को 'लार्जर देन लाइफ' एक्शन और भारी-भरकम डायलॉग्स के साथ परोसता आया है। लेकिन भीड़ से अलग हटकर, कभी-कभी ऐसी फिल्में आती हैं जो शोर-शराबे के बजाय संवेदनशीलता और यथार्थवाद (Realism) के दम पर अपनी जगह बनाती हैं। इस हफ्ते रिलीज हुई फिल्म ‘बिहू अटैक’ (Bihu Attack) इसी श्रेणी का एक ईमानदार प्रयास है।
असम के पावन और रंगीन लोकपर्व 'बिहू' की पृष्ठभूमि में रची गई यह फिल्म एक गंभीर विषय को उठाती है। यह केवल गोलियों और बमों की कहानी नहीं है, बल्कि यह आतंकवाद, राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक एकता जैसे मुद्दों पर एक परिपक्व संवाद (Dialogue) स्थापित करती है। बड़े बजट की चकाचौंध से दूर, निर्देशक सुज़ाद इक़बाल खान ने एक ऐसी दुनिया रची है जो उत्तर-पूर्व भारत की चुनौतियों और वहां के लोगों के जज्बे को सलाम करती है।
कहानी: कलम और बंदूक की जंग (The Plot)
फिल्म की कहानी के केंद्र में है राज कुंवर (देव मेनारिया), जो एक ईमानदार, अनुशासित और उसूलों वाला कोर्ट मार्शल अधिकारी है। राज का चरित्र उन फिल्मी हीरोज से अलग है जो सिर्फ मार-धाड़ में विश्वास रखते हैं। उसका मानना है कि "बंदूक से ज्यादा ताकत शिक्षा और संवाद में होती है।" पत्नी के निधन के बाद, राज अपनी छोटी बेटी के साथ एक सादा और सुकून भरा जीवन जी रहा होता है, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर होता है।
कहानी तब एक गंभीर और थ्रिलर मोड़ लेती है जब असम में बिहू महोत्सव की तैयारियां जोरों पर होती हैं। इसी दौरान देश के रक्षा मंत्री का दौरा प्रस्तावित होता है। खुफिया एजेंसियों को इनपुट्स मिलते हैं कि पड़ोसी देश से जुड़े आतंकी संगठन स्थानीय स्लीपर सेल्स की मदद से एक बड़े हमले को अंजाम देने की फिराक में हैं। उनका मकसद केवल दहशत फैलाना नहीं, बल्कि भारत की संप्रभुता को चुनौती देना है।
हालात की गंभीरता को समझते हुए, राज कुंवर को वापस एक्शन में लौटना पड़ता है। वह अपने पूर्व सीनियर केडी सर की मदद से इस खतरे को रोकने के मिशन में जुट जाता है। फिल्म का क्लाइमेक्स तनाव (Tension) और भावनात्मक जुड़ाव (Emotional Connect) का एक बेहतरीन मिश्रण है, जो दर्शकों को सीट से बांधे रखता है।
अभिनय: देव मेनारिया का 'संयमित' अवतार
फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसकी कास्टिंग और उनका अभिनय है।
- देव मेनारिया: लीड रोल में देव मेनारिया ने राज कुंवर के किरदार को मजबूती और सादगी के साथ निभाया है। एक सख्त अधिकारी के रूप में उनका बॉडी लैंग्वेज और एक पिता के रूप में उनकी कोमलता—इन दोनों पहलुओं को उन्होंने बहुत संतुलित ढंग से पेश किया है। उनकी आंखों में वह दर्द और दृढ़ता दिखती है जो इस किरदार की मांग थी।
- अरबाज खान: आईबी (Intelligence Bureau) चीफ के किरदार में अरबाज खान जंचते हैं। उनका अभिनय गंभीर और संयमित है, जो उनके अनुभव को दर्शाता है। वे बिना ज्यादा ड्रामे के अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं।
- सपोर्टिंग कास्ट: डेज़ी शाह का रोल सीमित है, लेकिन वे अपनी छाप छोड़ने में सफल रही हैं। राहुल देव और रज़ा मुराद जैसे दिग्गजों ने अपने किरदारों के साथ पूरा न्याय किया है। युक्ति कपूर, मीर सरवर और हितेन तेजवानी ने भी फिल्म को मजबूत सपोर्ट दिया है।
निर्देशन और तकनीक: यथार्थवाद का पुट
निर्देशक सुज़ाद इक़बाल खान ने विषय की नाजुकता को समझते हुए फिल्म को 'मसाला एंटरटेनर' बनाने से परहेज किया है।
- टोन: उन्होंने फिल्म को एक रियलिस्टिक टोन में रखा है। असम के लोकेशंस और बिहू के दृश्यों को खूबसूरती से कैप्चर किया गया है।
- डॉक्यूमेंट्री फील: कुछ जगहों पर फिल्म एक डॉक्यूमेंट्री जैसी फील देती है, जो शायद आम दर्शकों को थोड़ी धीमी लग सकती है, लेकिन यही इसके संदेश को असरदार बनाती है। यह दिखाती है कि आतंकवाद से लड़ना किसी वीडियो गेम जैसा नहीं होता।
- एडिटिंग: हालांकि, फिल्म की एडिटिंग थोड़ी और कसी (Crisp) हो सकती थी। कुछ दृश्य थोड़े खींचे हुए लगते हैं, जिन्हें छोटा करके फिल्म की गति बढ़ाई जा सकती थी।
संदेश: 'नफरत को शिक्षा ही काट सकती है'
'बिहू अटैक' केवल एक थ्रिलर नहीं है, बल्कि यह उग्रवाद के खिलाफ एक वैचारिक लड़ाई भी है। फिल्म यह रेखांकित करती है कि आतंकवाद का हल केवल एनकाउंटर नहीं है, बल्कि शिक्षा, संवाद और सामाजिक समावेशन (Social Inclusion) है। जब तक हम युवाओं को भटकने से नहीं रोकेंगे, तब तक बंदूकें खामोश नहीं होंगी। यह संदेश आज के दौर में बेहद प्रासंगिक है।
हमारी राय (The Trending People Analysis)
'बिहू अटैक' उन दर्शकों के लिए एक सौगात है जो देशभक्ति को छाती पीटने वाले शोर के बजाय एक गंभीर सोच के रूप में देखना पसंद करते हैं। यह फिल्म हमें याद दिलाती है कि पूर्वोत्तर भारत हमारी मुख्यधारा का अभिन्न अंग है और वहां की समस्याएं हमारी समस्याएं हैं।
The Trending People का रिव्यू है कि कमियों के बावजूद, अपने ईमानदार प्रयास और सामाजिक संदेश के कारण 'बिहू अटैक' एक बार देखी जा सकने वाली फिल्म (One-time Watch) है। यह फिल्म आपको रोमांचित करने के साथ-साथ सोचने पर भी मजबूर करती है। अगर आप सार्थक सिनेमा के शौकीन हैं और उत्तर-पूर्व भारत की वास्तविकताओं को समझना चाहते हैं, तो यह फिल्म आपको निराश नहीं करेगी। रेटिंग: ⭐⭐⭐ (3/5)
