एआई की अंधी दौड़ या तबाही की आहट? आर्थिक सर्वे 2026 की चेतावनी—'एआई बबल' फूटा तो 2008 जैसा संकट संभव, 2.5 ट्रिलियन डॉलर दांव पर
नई दिल्ली, दिनांक: 29 जनवरी 2026 — पिछले कुछ वर्षों में 'आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस' (AI) ने दुनिया की टेक्नोलॉजी, बिजनेस और अर्थव्यवस्था की दिशा को पूरी तरह बदल दिया है। चैटजीपीटी से शुरू हुई यह क्रांति आज प्रोडक्टिविटी बढ़ाने और नए रोजगार पैदा करने का सबसे बड़ा साधन मानी जा रही है। लेकिन हर चमकती चीज सोना नहीं होती। हाल के आर्थिक विश्लेषणों में एक डरावनी चेतावनी दी गई है कि एआई इंफ्रास्ट्रक्चर में हो रहे अत्यधिक और अनियंत्रित निवेश एक विशालकाय 'वित्तीय बुलबुले' (Financial Bubble) का रूप ले रहे हैं। भारत के आर्थिक सर्वे 2026 (Economic Survey 2026) ने इस मुद्दे पर विशेष जोर देते हुए आगाह किया है कि अगर यह बुलबुला फूटा, तो इसके प्रभाव सिर्फ टेक सेक्टर तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि यह पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था को मंदी (Recession) की गर्त में धकेल सकता है।
सबसे पहले एआई में निवेश की वर्तमान स्थिति और आंकड़ों पर नजर डालना जरूरी है, जो किसी सुनामी से कम नहीं हैं। गार्टनर की 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक एआई खर्च 44 प्रतिशत बढ़कर 2.5 ट्रिलियन डॉलर के ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच गया है, जिसमें एआई इंफ्रास्ट्रक्चर की हिस्सेदारी 54 प्रतिशत रही है। आईडीसी (IDC) की रिपोर्ट बताती है कि 2025 की दूसरी तिमाही में एआई इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च 166 प्रतिशत उछलकर 82 बिलियन डॉलर हो गया और अनुमान है कि यह 2029 तक बढ़कर 758 बिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है। वहीं, आईओटी एनालिटिक्स के मुताबिक 2024 में डेटा सेंटर इंफ्रास्ट्रक्चर पर 290 बिलियन डॉलर खर्च हुए, जो 2030 तक 1 ट्रिलियन डॉलर से अधिक हो सकते हैं। यह तेज़ वृद्धि मुख्य रूप से अल्फाबेट, माइक्रोसॉफ्ट, अमेजन और मेटा जैसे 'हाइपरस्केलर्स' द्वारा किए गए करीब 200 बिलियन डॉलर के कैपेक्स (Capex) से प्रेरित है। गोल्डमैन सैक्स का अनुमान है कि एआई कंपनियां 2026 में 500 बिलियन डॉलर से अधिक का निवेश कर सकती हैं। ये आंकड़े दिखाते हैं कि एआई निवेश एक 'मेगा-ट्रेंड' है, लेकिन इसमें लीवरेज (कर्ज पर आधारित) का बढ़ता उपयोग सबसे बड़ी चिंता का विषय है।
भारत के आर्थिक सर्वे 2025-26 ने आईएमएफ (IMF) की 'विश्व आर्थिक आउटलुक 2026' का हवाला देते हुए चेतावनी दी है कि एआई में एक खतरनाक बुलबुला बन रहा है। सर्वे के अनुसार, कई टेक कंपनियों ने डेटा सेंटर और एआई इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च को अपनी बैलेंस शीट से बाहर विशेष फंडिंग स्ट्रक्चर, जैसे स्पेशल पर्पज व्हीकल्स (SPVs) के जरिए किया है। इससे वास्तविक जोखिम निवेशकों और नियामकों से छिपा रह जाता है। फाइनेंशियल टाइम्स की रिपोर्ट के हवाले से, वैश्विक टेक कंपनियों ने 120 बिलियन डॉलर से अधिक डेटा सेंटर खर्च को 'ऑफ-बैलेंस शीट' पर शिफ्ट किया है। खतरा यह है कि अगर ये प्रोजेक्ट्स अपेक्षित रिटर्न नहीं देते, तो कर्ज चुकाने में समस्या आ सकती है, जो बाजार में घबराहट फैला सकती है। सर्वे ने 10 से 20 प्रतिशत संभावना जताई है कि यह स्थिति 2008 जैसी या उससे भी बदतर वैश्विक वित्तीय संकट का कारण बन सकती है। एसएंडपी ग्लोबल रेटिंग्स की रिपोर्ट भी बताती है कि एआई निवेश में डेब्ट फाइनेंसिंग बढ़ रही है, जिसमें ऑफ-बैलेंस शीट अरेंजमेंट्स शामिल हैं। अगर ये फेल हुए, तो बबल का फूटना तय है।
इसका वैश्विक प्रभाव भयावह हो सकता है। अगर एआई निवेश में तेज गिरावट आई, तो बैंकिंग सिस्टम, शेयर बाजार और निवेश फंड्स बुरी तरह प्रभावित होंगे। निवेशक जोखिम से बचने लगेंगे, जिससे पूंजी बाजार सिकुड़ सकते हैं, ब्याज दरें बढ़ सकती हैं और नई परियोजनाओं में निवेश रुक सकता है। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की 'ग्लोबल रिस्क्स रिपोर्ट 2026' के अनुसार, एआई से जुड़े आर्थिक जोखिम जैसे एसेट बबल्स और इकोनॉमिक डाउनटर्न बढ़ रहे हैं। बीआईएस (BIS) की रिपोर्ट में कहा गया है कि 'मैग्निफिसेंट सेवन' (Magnificent Seven) टेक स्टॉक्स एसएंडपी 500 का 35 प्रतिशत हिस्सा हैं। अगर एआई बबल फूटा, तो फाइनेंशियल मार्केट्स में अराजकता फैल सकती है। ओलिवर विमन की रिपोर्ट के मुताबिक, एआई बबल फूटने के दो परिदृश्य हैं—इक्विटी क्रैश या डेब्ट-ट्रिगर्ड हाइब्रिड क्रैश, जो ग्लोबल फाइनेंशियल मार्केट्स को हिलाकर रख सकता है। गोल्डमैन सैक्स की रिपोर्ट में चिंता जताई गई है कि एआई में 'सर्कुलर इन्वेस्टमेंट' बढ़ रहा है, जो बबल का क्लासिक संकेत है।
अब सवाल यह है कि भारत के लिए यह कितना बड़ा खतरा है? भारत के लिए यह खतरा सीधा नहीं है, लेकिन इसे इग्नोर करना भारी भूल होगी। भारत तेजी से एआई और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश कर रहा है। एचएसबीसी (HSBC) की रिपोर्ट के अनुसार, भारत एशिया की एआई, डेटा सेंटर और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश साइकिल का प्रमुख लाभार्थी है। यहां क्लाउड यूसेज, ऊर्जा और सस्ती लेबर कॉस्ट के कारण वैश्विक हाइपरस्केलर्स आकर्षित हो रहे हैं। हालांकि, अगर वैश्विक संकट आया, तो विदेशी निवेश (FDI/FPI) घट सकता है और टेक सेक्टर की ग्रोथ प्रभावित हो सकती है। बिजनेस स्टैंडर्ड की रिपोर्ट के अनुसार, आईएमएफ ने भारत की 2025-26 ग्रोथ को 7.3 फीसदी अनुमानित किया है, लेकिन एआई निवेश में स्लोडाउन से स्टॉक मार्केट्स में करेक्शन और विदेशी निवेशकों का निकलना भारत को प्रभावित कर सकता है। फिर भी, सर्वे में कहा गया है कि भारत के मजबूत 'मैक्रो बफर्स' इसे सापेक्षिक सुरक्षा (Relative Protection) देते हैं।
सर्वे स्पष्ट करता है कि एआई का विकास रुकने वाला नहीं है, लेकिन अति उत्साह में अनियंत्रित पैसा झोंकना जोखिम पैदा कर सकता है। इसलिए, सरकारों और रेगुलेटर्स को जोखिम प्रबंधन, डेटा गवर्नेंस और वित्तीय निगरानी मजबूत करनी होगी। नैसकॉम (NASSCOM) की रिपोर्ट के अनुसार, भारत एआई इंफ्रास्ट्रक्चर को बड़े पैमाने पर अपनाने के लिए तैयार हो रहा है, जिसमें डेटा सेंटर्स पर महत्वपूर्ण निवेश शामिल है। समय की मांग है कि विश्व बैंक और आईएमएफ जैसे संगठन एआई से जुड़े रिस्क्स पर ग्लोबल स्टैंडर्ड्स बनाएं।
हमारी राय (The Trending People Analysis)
तकनीक का इतिहास गवाह है कि हर बड़ी क्रांति के साथ एक 'बुलबुला' आता है—चाहे वह डॉट-कॉम हो या हाउसिंग। एआई के साथ भी यही हो रहा है। कंपनियां 'फोमो' (FOMO) के चक्कर में अरबों डॉलर लगा रही हैं, बिना यह सोचे कि मुनाफा कब और कैसे आएगा।
The Trending People का विश्लेषण है कि आर्थिक सर्वे की चेतावनी को गंभीरता से लेना चाहिए। ऑफ-बैलेंस शीट फंडिंग एक 'टाइम बम' है। भारत के लिए यह मौका है कि वह अपनी एआई रणनीति को 'हार्डवेयर' तक सीमित न रखकर 'स्किलिंग' और 'सॉल्यूशंस' पर केंद्रित करे। अगर बबल फूटता है, तो वही देश बचेंगे जिनकी बुनियादी अर्थव्यवस्था मजबूत होगी, न कि वे जो केवल हवा (Hype) पर सवार हैं।