रानी मुखर्जी के 'बुलंद बोल' या 'बिगड़े बोल'? कहा- "पतियों पर चिल्लाना चाहिए औरतों को", बयान सुन भड़का इंटरनेट, पूछा- क्या यही है बराबरी?
नई दिल्ली/मुंबई, दिनांक: 29 जनवरी 2026 — बॉलीवुड की 'मर्दानी' यानी रानी मुखर्जी (Rani Mukerji) अपनी दमदार एक्टिंग और बेबाक अंदाज के लिए जानी जाती हैं, लेकिन हाल ही में उनका यही बेबाकपन उनके लिए मुसीबत का सबब बन गया है। अपनी बहुप्रतीक्षित फिल्म 'मर्दानी 3' (Mardaani 3) के प्रमोशन के सिलसिले में दिए गए एक इंटरव्यू में रानी ने जेंडर रोल्स और पति-पत्नी के रिश्तों पर एक ऐसा बयान दे दिया है, जिसने सोशल मीडिया पर एक नई और तीखी बहस छेड़ दी है। अभिनेत्री ने कहा कि महिलाओं को अपने पतियों से ऊंची आवाज में बात करनी चाहिए और उन पर चिल्लाना चाहिए। उनका यह तर्क, जो शायद महिला सशक्तिकरण के संदर्भ में दिया गया था, नेटिजन्स के एक बड़े वर्ग को रास नहीं आया है और लोग इसे 'विषाक्त नारीवाद' (Toxic Feminism) करार देते हुए उन्हें खरी-खोटी सुना रहे हैं।
रानी मुखर्जी ने अपने इंटरव्यू में परवरिश और बच्चों के मनोविज्ञान पर बात करते हुए कहा कि औरतों के सम्मान की शुरुआत घर की चारदीवारी से होती है। उन्होंने एक बहुत ही वैलिड पॉइंट उठाया कि बच्चे जो भी सीखते हैं, वह अपने घर के माहौल से ही सीखते हैं। अगर कोई छोटा लड़का अपनी मां को पिता से डांट खाते हुए या अपमानित होते हुए देखता है, तो उसके अवचेतन मन में यह बात बैठ जाती है कि महिलाओं के साथ ऐसा व्यवहार करना सामान्य है। रानी का मानना है कि यह पूरी तरह से पिता की जिम्मेदारी है कि वह घर में अपनी पत्नी के साथ कैसा व्यवहार करता है। यदि मां को घर में इज्जत मिलती है, तो बच्चे भी वही सीखते हैं और बड़े होकर समाज में महिलाओं को सम्मान देने लगते हैं। यहां तक उनकी बात से शायद ही कोई असहमत हो।
विवाद तब खड़ा हुआ जब रानी ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए 'बराबरी' का एक अलग ही पैमाना पेश कर दिया। उन्होंने कहा कि घर में पिता को मां पर बिल्कुल नहीं चिल्लाना चाहिए, यह तो तय है। लेकिन इसके तुरंत बाद उन्होंने जोड़ा कि बल्कि मैं तो कहती हूं कि मां को पिता पर चिल्लाना चाहिए। रानी का यह वाक्य सोशल मीडिया यूजर्स को चुभ गया। उन्होंने अपने निजी जीवन का उदाहरण देते हुए मजाकिया लहजे में यह भी कहा कि आप मेरे पति (आदित्य चोपड़ा) से मत पूछिए कि घर पर उनके साथ रोज क्या होता है। उनका इशारा शायद यह था कि वे घर में बॉस हैं, लेकिन लोगों ने इसे 'डोमिनेंस' (प्रभुत्व) के तौर पर लिया।
जैसे ही यह क्लिप वायरल हुई, रेडिट (Reddit) और इंस्टाग्राम (Instagram) जैसे प्लेटफॉर्म्स पर आलोचनाओं की बाढ़ आ गई। यूजर्स का कहना है कि सम्मान दोतरफा रास्ता (Two-way street) होता है। अगर पिता का चिल्लाना गलत है, तो मां का चिल्लाना सही कैसे हो सकता है? एक यूजर ने लिखा कि रानी शायद मजाक करने की कोशिश कर रही थीं, लेकिन यह मजाक नहीं है; यह घरेलू कलह को ग्लोरिफाई करना है। दूसरे यूजर ने तंज कसते हुए लिखा कि सिर्फ सीनियर एक्टर होने का मतलब यह नहीं है कि आप कुछ भी बोल दें और उसे 'विस्डम' (बुद्धिमत्ता) मान लिया जाए। चिल्लाना किसी भी रिश्ते के लिए स्वस्थ नहीं है, चाहे वह मर्द हो या औरत।
आलोचकों का तर्क है कि रानी मुखर्जी का यह बयान उस स्टीरियोटाइप को तोड़ता नहीं, बल्कि उसे पलट देता है। फेमिनिज्म का मतलब समानता होता है, न कि एक जेंडर का दूसरे पर हावी होना। अगर हम एक ऐसे समाज की कल्पना कर रहे हैं जहां पुरुष महिलाओं पर न चिल्लाएं, तो हमें यह भी सिखाना होगा कि महिलाएं भी पुरुषों के साथ सम्मान से पेश आएं। बच्चों के सामने मां का पिता पर चिल्लाना भी उतना ही नकारात्मक असर डाल सकता है, जितना पिता का मां पर चिल्लाना। यह बच्चे को यह सिखा सकता है कि समस्याओं का समाधान चीखने-चिल्लाने में है, संवाद में नहीं।
हालांकि, रानी के कुछ प्रशंसकों ने उनका बचाव भी किया है। उनका कहना है कि रानी के बयान को संदर्भ से काटकर देखा जा रहा है। शायद उनका मतलब यह था कि महिलाओं को अपनी आवाज दबानी नहीं चाहिए और अगर जरूरत पड़े तो अपने हक के लिए आवाज उठानी चाहिए। लेकिन शब्दों का चयन और उसे पेश करने का तरीका निश्चित रूप से बैकफायर कर गया है। 'मर्दानी 3' में एक सख्त पुलिस अफसर का किरदार निभाने वाली रानी से लोग रील लाइफ की तरह रियल लाइफ में भी परिपक्वता की उम्मीद करते हैं। फिल्म के प्रमोशन के दौरान अक्सर सितारे सुर्खियों में रहने के लिए विवादास्पद बयान देते हैं, लेकिन कभी-कभी यह रणनीति उल्टी पड़ जाती है। अब देखना होगा कि क्या रानी मुखर्जी इस प्रतिक्रिया के बाद कोई सफाई पेश करती हैं या अपनी बात पर कायम रहती हैं।
हमारी राय (The Trending People Analysis)
रानी मुखर्जी का बयान भावनाओं के आवेग में निकला हो सकता है, लेकिन एक सार्वजनिक हस्ती के तौर पर शब्दों की जिम्मेदारी बड़ी होती है। 'चिल्लाना' कभी भी सशक्तिकरण का प्रतीक नहीं हो सकता। सशक्तिकरण का असली मतलब है अपनी बात को दृढ़ता और सम्मान के साथ रखना, बिना आवाज ऊंची किए।
The Trending People का विश्लेषण है कि रानी का पहला तर्क बिल्कुल सही था कि बच्चे घर से सीखते हैं। लेकिन समाधान 'बदला' नहीं, बल्कि 'बदलाव' है। अगर हम चाहते हैं कि अगली पीढ़ी बेहतर बने, तो हमें उन्हें यह सिखाना होगा कि कोई किसी पर न चिल्लाए। रिश्तों में गरिमा जेंडर देखकर नहीं, बल्कि इंसानियत देखकर होनी चाहिए। यह विवाद हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि हम समानता की लड़ाई को कहीं 'वर्चस्व' की लड़ाई में तो नहीं बदल रहे?