दुनिया मंदी की ओर या 'महा-विनाश' की ओर? आर्थिक सर्वेक्षण ने बजाई खतरे की घंटी—2026 में ग्लोबल इकॉनमी हो सकती है क्रैश, भारत के लिए 'अग्निपरीक्षा'
नई दिल्ली, दिनांक: 29 जनवरी 2026 — दुनिया भर के बाजारों में छाई अनिश्चितता के बीच भारत सरकार ने संसद में आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 (Economic Survey 2025-26) पेश कर दिया है। वित्त मंत्रालय द्वारा तैयार किया गया यह दस्तावेज न केवल भारतीय अर्थव्यवस्था का लेखा-जोखा है, बल्कि यह वैश्विक अर्थव्यवस्था के भविष्य के लिए एक 'रेड अलर्ट' (Red Alert) भी है। सर्वेक्षण में साफ शब्दों में चेतावनी दी गई है कि साल 2026 वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़े संकट का साल साबित हो सकता है। भले ही 2025 में विकास की रफ्तार उम्मीद से बेहतर रही हो, लेकिन आने वाले समय में भू-राजनीतिक तनाव, व्यापारिक नीतियों में अस्थिरता और वित्तीय बाजारों की उथल-पुथल दुनिया को एक नाजुक मोड़ पर ले आई है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने भी अपनी जनवरी 2026 की रिपोर्ट में वैश्विक विकास दर 3.3% रहने का अनुमान तो लगाया है, लेकिन साथ ही व्यापार युद्ध और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से जुड़े जोखिमों को एक टाइम बम बताया है।
आर्थिक सर्वेक्षण ने 2026 के लिए तीन संभावित और डरावने परिदृश्यों (Scenarios) का खाका खींचा है। सबसे पहला और सबसे प्रबल परिदृश्य 'मैनेज्ड डिसऑर्डर' (Managed Disorder) का है, जिसकी संभावना 40 से 45 प्रतिशत जताई गई है। इसका मतलब है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था चलती तो रहेगी, लेकिन उसमें भारी अस्थिरता बनी रहेगी। छोटे-मोटे झटके, जैसे कि अचानक छेड़ा गया कोई ट्रेड वॉर या किसी बड़े देश में वित्तीय तनाव, पूरी दुनिया की सप्लाई चेन को हिलाकर रख सकते हैं। विश्व आर्थिक मंच (WEF) की 'ग्लोबल रिस्क्स रिपोर्ट 2026' भी इसी ओर इशारा करती है, जिसमें भू-आर्थिक टकराव को सबसे बड़ा जोखिम माना गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि छोटे व्यापारिक प्रतिबंध भी अब बड़े आर्थिक नुकसान का कारण बन रहे हैं। उत्तरी अमेरिका और एशिया के बाजारों पर इसका सबसे गहरा असर देखने को मिल सकता है।
दूसरा परिदृश्य इससे भी कहीं ज्यादा गंभीर और चिंताजनक है। सर्वेक्षण के अनुसार, इसकी संभावना भी 40-45 प्रतिशत है कि दुनिया की मौजूदा बहुध्रुवीय (Multipolar) व्यवस्था टूट सकती है। इस स्थिति में व्यापार को एक हथियार (Weaponization of Trade) की तरह इस्तेमाल किया जाएगा और देशों के बीच आर्थिक टकराव तेज हो जाएंगे। विश्व बैंक की रिपोर्ट पहले ही चेतावनी दे चुकी है कि व्यापारिक तनाव बढ़ने से विकास दर घट सकती है और क्षेत्रीय असमानताएं बढ़ेंगी। इसका सबसे बुरा असर यह होगा कि दुनिया अलग-अलग आर्थिक गुटों (Economic Blocs) में बंट जाएगी। भारत जैसी निर्यात-आधारित और उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं के लिए यह स्थिति बेहद चुनौतीपूर्ण होगी, क्योंकि तब बाजार सीमित हो जाएंगे और प्रतियोगिता अनुचित हो जाएगी। आईएमएफ का मानना है कि ऐसी अराजकता से वैश्विक विकास 3.2 प्रतिशत तक गिर सकता है।
तीसरा और सबसे भयावह परिदृश्य, जिसकी संभावना भले ही 10 से 20 प्रतिशत है, लेकिन अगर यह सच हुआ तो परिणाम विनाशकारी होंगे। इसमें वित्तीय संकट, टेक्नोलॉजी का गुब्बारा (खासकर एआई बबल) और भू-राजनीतिक टकराव एक साथ मिलकर एक 'परफेक्ट स्टॉर्म' पैदा कर सकते हैं। आशंका जताई जा रही है कि एआई इंफ्रास्ट्रक्चर में बना निवेश का बुलबुला (AI Bubble) अगर फूटा, तो यह 2008 की मंदी से भी बदतर संकट ला सकता है। आईएमएफ ने चेतावनी दी है कि एआई से जुड़ी अति-अपेक्षाएं अगर पूरी नहीं हुईं, तो निवेश में भारी गिरावट आएगी और शेयर बाजार ताश के पत्तों की तरह बिखर सकते हैं। यह वैश्विक ऋण संकट को भी जन्म दे सकता है, जिससे ब्याज दरें आसमान छूने लगेंगी।
हालांकि, घने बादलों के बीच भारत के लिए एक चांदी की लकीर (Silver Lining) भी है। सर्वेक्षण बताता है कि भारत की मैक्रोइकोनॉमिक स्थिति अपने कई प्रतिद्वंद्वियों के मुकाबले काफी मजबूत है। हमारा घरेलू बाजार विशाल है, विदेशी मुद्रा भंडार 700 बिलियन डॉलर के ऐतिहासिक स्तर पर है और बैंकिंग सिस्टम की सेहत सुधरी है। लेकिन हम पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं। डेलॉयट और बिजनेस स्टैंडर्ड की रिपोर्ट्स के मुताबिक, कैपिटल फ्लो में बाधा और रुपये पर दबाव भारत के लिए सबसे बड़ा जोखिम बना हुआ है। वैश्विक झटकों का असर हमारी मुद्रा और निर्यात पर पड़ना तय है।
निवेशकों का डर सोने की कीमतों में आए उछाल से साफ देखा जा सकता है। अनिश्चितता के दौर में निवेशक हमेशा 'सुरक्षित ठिकानों' (Safe Havens) की ओर भागते हैं। रॉयटर्स और सीएनएन बिजनेस की रिपोर्ट्स बताती हैं कि 2026 के पहले 26 दिनों में ही सोने की कीमतों में 15 प्रतिशत तक की तेजी आ चुकी है और यह रिकॉर्ड स्तर पर कारोबार कर रहा है। यह इस बात का संकेत है कि बाजार को आने वाले तूफान का आभास हो चुका है। ऐसे माहौल में भारत को अपनी रणनीति बदलनी होगी। नीतिगत स्थिरता और प्रशासनिक अनुशासन को अब रणनीतिक संपत्ति मानना होगा। सप्लाई चेन को विविध बनाना और विदेशी मुद्रा कमाने वाले निर्यात को बढ़ाना ही बचाव का एकमात्र रास्ता है।
हमारी राय (The Trending People Analysis)
आर्थिक सर्वेक्षण 2026 ने हमें आईना दिखाया है। दुनिया एक ऐसे मुहाने पर खड़ी है जहां एक गलत फैसला दशकों की प्रगति को मटियामेट कर सकता है। एआई बबल और ट्रेड वॉर की जुगलबंदी किसी डरावने सपने जैसी है।
The Trending People का विश्लेषण है कि भारत के लिए यह समय 'आत्ममुग्धता' का नहीं, बल्कि 'सतर्कता' का है। 700 बिलियन डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार हमें झटकों से बचाने के लिए एक कुशन (Cushion) जरूर देता है, लेकिन अगर वैश्विक मंदी आई, तो हमारी निर्यात आधारित इंडस्ट्रीज (जैसे आईटी और टेक्सटाइल) को भारी नुकसान होगा। सरकार को घरेलू खपत (Domestic Consumption) को बढ़ाने पर जोर देना चाहिए, क्योंकि जब दुनिया के दरवाजे बंद होंगे, तो हमारा अपना बाजार ही हमें बचाएगा। 2026 में 'सावधानी' ही सुरक्षा है।
