कुत्तों के आतंक पर सुप्रीम कोर्ट का 'अंतिम प्रहार' सुरक्षित—राज्यों को फटकार, 'फीडर्स' से पूछा "सिर्फ खाना दोगे या जिम्मेदारी भी लोगे?
नई दिल्ली, दिनांक: 30 जनवरी 2026 — देश की सड़कों, गलियों और पार्कों में कुत्तों (Stray Dogs) का बढ़ता आतंक और उससे उपजा 'इंसान बनाम जानवर' का संघर्ष अब देश की सबसे बड़ी अदालत के फैसले का इंतजार कर रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्तों के हमलों, रेबीज के बढ़ते मामलों और सार्वजनिक सुरक्षा से जुड़ी विभिन्न याचिकाओं पर लंबी और मैराथन सुनवाई के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। जस्टिस विक्रम नाथ की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ, जिसमें जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एन.वी. अंजारिया शामिल हैं, ने केंद्र सरकार, राज्य सरकारों, एनिमल वेलफेयर बोर्ड ऑफ इंडिया (AWBI) और याचिकाकर्ताओं की दलीलें सुनने के बाद यह निर्णय लिया है।
यह मामला कितना गंभीर है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सुप्रीम कोर्ट ने इसे स्वतः संज्ञान (Suo Motu) में उठाया था। सुनवाई के दौरान अदालत का रुख बेहद सख्त नजर आया। जजों ने न केवल राज्य सरकारों की निष्क्रियता पर नाराजगी जताई, बल्कि उन 'डॉग फीडर्स' (Dog Feeders) को भी आईना दिखाया जो सड़कों पर कुत्तों को खाना तो खिलाते हैं लेकिन उनकी जिम्मेदारी लेने से कतराते हैं। कोर्ट ने साफ संकेत दिया कि सार्वजनिक सुरक्षा (Public Safety) और पशु अधिकारों (Animal Rights) के बीच संतुलन बनाना जरूरी है, लेकिन इंसानी जान की कीमत पर नहीं।
सुनवाई के दौरान कोर्टरूम में आंकड़ों और हकीकत की जोरदार बहस हुई। एनिमल वेलफेयर बोर्ड ऑफ इंडिया (AWBI) की तरफ से पेश वकील ने देशभर में आवारा कुत्तों के लिए बनाए गए नसबंदी और टीकाकरण केंद्रों का ब्यौरा दिया, जिस पर कोर्ट ने कई सवाल खड़े किए। बोर्ड ने बताया कि उनके साथ केवल 76 सेंटर ही आधिकारिक रूप से रिकग्नाइज्ड (मान्यता प्राप्त) हैं, जबकि 250 से ज्यादा एप्लीकेशन अभी पेंडिंग हैं। इस पर जस्टिस नाथ ने तीखा सवाल किया कि ये कब से पेंडिंग हैं और बोर्ड इतनी सुस्त रफ्तार से क्यों काम कर रहा है। बोर्ड ने रिकॉर्ड पर बताया कि 7 नवंबर के आदेश के बाद आवेदनों की बाढ़ आई है और फिलहाल देशभर में 883 सेंटर ऑपरेशनल हैं, लेकिन उन्हें अभी तक रिकग्निशन नहीं दिया गया है। जस्टिस मेहता ने पूछा कि क्या बोर्ड इन सेंटर्स का फिजिकल वेरिफिकेशन करता है या सब कुछ कागजों पर चल रहा है। कोर्ट ने एडब्ल्यूबीआई को सख्त निर्देश दिया कि पेंडिंग एप्लीकेशन्स को लटकाने के बजाय जल्दी प्रोसेस किया जाए—या तो उन्हें स्वीकार करें या कमियों के आधार पर रिजेक्ट करें।
अदालत की सबसे तल्ख टिप्पणी राज्य सरकारों के लिए थी। बेंच ने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि राज्य सरकारें पिछले 75 सालों से इस समस्या का हल निकालने में विफल रही हैं और नियम लागू नहीं कर रही हैं। कोर्ट ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि डॉग बाइट (कुत्ते के काटने) या मौत के हर केस में भारी मुआवजा लगाया जा सकता है, जिसकी जिम्मेदारी स्थानीय प्रशासन की होगी। एनिमल बर्थ कंट्रोल (ABC) रूल्स 2023 के तहत नसबंदी और वैक्सीनेशन पर जोर दिया गया है, लेकिन इसका जमीनी कार्यान्वयन (Implementation) बेहद कमजोर है। कोर्ट ने माना कि स्थानीय निकाय अपनी जिम्मेदारी से भाग रहे हैं, जिसका खामियाजा आम जनता, विशेषकर बच्चे और बुजुर्ग भुगत रहे हैं।
इस सुनवाई का एक और अहम पहलू 'डॉग फीडर्स' को लेकर कोर्ट का नजरिया रहा। अक्सर सोसाइटियों और कॉलोनियों में कुत्तों को खाना खिलाने वालों और निवासियों के बीच झगड़े होते हैं। कोर्ट ने फीडर्स को भी समस्या के लिए आंशिक रूप से जिम्मेदार ठहराया। जजों ने टिप्पणी की कि अगर आप कुत्तों से प्यार करते हैं और उन्हें खाना खिलाते हैं, तो यह अच्छी बात है, लेकिन अगर आप उन्हें घर नहीं ले जा सकते या उनकी पूरी जिम्मेदारी नहीं ले सकते, तो आप समस्या को बढ़ा रहे हैं। कोर्ट ने स्कूलों, अस्पतालों, समुद्र तटों और पर्यटन स्थलों पर कुत्तों के झुंड की मौजूदगी पर गहरी चिंता जताई। जजों का मानना था कि सड़कें और सार्वजनिक जगहें सुरक्षित होनी चाहिएं। आवारा कुत्तों के कारण दुर्घटनाएं और भय का माहौल एक सभ्य समाज की निशानी नहीं है।
पशु अधिकार कार्यकर्ताओं और डॉग लवर्स ने दलील दी कि कुत्तों को मारना या उन्हें बड़े पैमाने पर हटाना अमानवीय है और समस्या का हल एबीसी रूल्स के तहत वैज्ञानिक तरीके से नसबंदी में ही छिपा है। वहीं, याचिकाकर्ताओं और आम नागरिकों ने कुत्तों के हमलों से हुई मौतों के डरावने आंकड़े पेश किए और बच्चों के खेलने के अधिकार की बात उठाई। अब सभी की निगाहें सुप्रीम कोर्ट के सुरक्षित फैसले पर टिकी हैं, जो यह तय करेगा कि भारत की सड़कों पर 'इंसान' और 'कुत्ते' के सह-अस्तित्व की शर्तें क्या होंगी।
हमारी राय (The Trending People Analysis)
आवारा कुत्तों की समस्या एक ऐसा नासूर बन गई है जिस पर अब तक सिर्फ 'बैंड-एड' लगाने की कोशिश हुई है। सुप्रीम कोर्ट की सख्ती स्वागत योग्य है। समस्या कुत्ते नहीं हैं, समस्या वह सिस्टम है जो नसबंदी के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति करता है।
The Trending People का विश्लेषण है कि 'फीडर्स' पर कोर्ट की टिप्पणी एक नई बहस छेड़ेगी। पशु प्रेम और नागरिक जिम्मेदारी (Civic Responsibility) एक साथ चलनी चाहिए। अगर कोई कुत्ता किसी बच्चे को नोचता है, तो उसके लिए केवल नगर निगम नहीं, बल्कि उस इलाके में कुत्तों की आबादी को अनियंत्रित रूप से बढ़ाने वाले कारक भी जिम्मेदार हैं। हमें उम्मीद है कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला एबीसी रूल्स को सख्ती से लागू करने और पीड़ितों को न्याय दिलाने के बीच एक व्यावहारिक रास्ता निकालेगा। अब समय आ गया है कि सड़कें खौफ का नहीं, सुरक्षा का पर्याय बनें।