भारत की 'ऊर्जा क्रांति'—अब प्राइवेट कंपनियां बनाएंगी परमाणु बिजली, सरकार ने तोड़ा दशकों पुराना एकाधिकार, क्या सस्ती होगी बिजली?pexels
नई दिल्ली, दिनांक: 29 जनवरी 2026 — भारत की ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक विकास की गाथा में गुरुवार का दिन एक ऐतिहासिक मोड़ लेकर आया है। केंद्र सरकार ने संसद में पेश किए गए आर्थिक सर्वेक्षण (Economic Survey) के जरिए एक ऐसी घोषणा की है, जिसने ऊर्जा जगत में हलचल मचा दी है। सरकार ने दशकों से चले आ रहे अपने एकाधिकार को समाप्त करते हुए परमाणु ऊर्जा उत्पादन (Nuclear Power Generation) के दरवाजे निजी क्षेत्र के लिए खोल दिए हैं। अब तक यह संवेदनशील क्षेत्र पूरी तरह से सरकारी नियंत्रण में था, लेकिन अब टाटा, रिलायंस या अडानी जैसी निजी कंपनियां भी परमाणु बिजली घर स्थापित कर सकेंगी। इसके साथ ही, बीमा क्षेत्र में विदेशी निवेश (FDI) की सीमा को 100 प्रतिशत करने की अनुमति भी दे दी गई है। यह फैसला भारत की दीर्घकालिक विकास रणनीति और 'आत्मनिर्भर ऊर्जा' के सपने को साकार करने की दिशा में एक साहसिक और निर्णायक कदम माना जा रहा है।
परमाणु ऊर्जा को स्वच्छ, स्थिर और बड़े पैमाने पर बिजली उत्पादन का सबसे भरोसेमंद स्रोत माना जाता है। भारत जैसे तेजी से विकसित हो रहे देश के लिए, जहां औद्योगिकीकरण और डिजिटलीकरण की रफ्तार तेज है, वहां बिजली की मांग आसमान छू रही है। सौर और पवन ऊर्जा जैसे नवीकरणीय स्रोत अच्छे हैं, लेकिन वे मौसम और सूरज की रोशनी पर निर्भर करते हैं। इसके विपरीत, परमाणु ऊर्जा साल के 365 दिन और 24 घंटे बिना रुके 'बेस-लोड' (Base-load) बिजली प्रदान करने की क्षमता रखती है। सरकार ने महसूस किया है कि अगर भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनना है, तो उसे अपनी ऊर्जा टोकरी में परमाणु ऊर्जा की हिस्सेदारी बढ़ानी ही होगी। निजी क्षेत्र के प्रवेश से सबसे बड़ा फायदा पूंजी निवेश में तेजी के रूप में देखने को मिल सकता है। परमाणु संयंत्र लगाने में हजारों करोड़ रुपये का खर्च आता है और सरकार के पास सीमित संसाधन होते हैं। निजी कंपनियां न केवल नई पूंजी लेकर आएंगी, बल्कि वे वैश्विक तकनीक, बेहतर प्रोजेक्ट मैनेजमेंट और तेज निर्माण क्षमता भी साथ लाएंगी। इससे नए परमाणु संयंत्र तेजी से बनेंगे और देश की उत्पादन क्षमता में कई गुना वृद्धि होगी।
हालांकि, सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह फैसला केवल आर्थिक नहीं है, बल्कि सुरक्षा और नियामकीय दृष्टि से भी बेहद संवेदनशील है। परमाणु ऊर्जा के साथ सबसे बड़ी चुनौती सुरक्षा मानकों की होती है। रेडिएशन नियंत्रण, परमाणु कचरा प्रबंधन और दुर्घटना का जोखिम—ये ऐसे मुद्दे हैं जिन पर रत्ती भर भी लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जा सकती। इसलिए, सरकार एक बेहद मजबूत और सख्त 'रेगुलेटरी फ्रेमवर्क' (Regulatory Framework) तैयार करेगी। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होगा कि निजी कंपनियां मुनाफे की होड़ में सुरक्षा मानकों से कोई समझौता न करें। परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड (AERB) की भूमिका अब और भी महत्वपूर्ण और चुनौतीपूर्ण हो जाएगी। सरकार लाइसेंसिंग से लेकर संचालन तक हर चरण पर कड़ी निगरानी रखेगी।
आर्थिक सर्वेक्षण ने यह भी संकेत दिया है कि भारत ने कई अन्य सेक्टरों में भी बड़े संरचनात्मक सुधार किए हैं। जीएसटी (GST) में बड़ा ओवरहॉल, नए लेबर कोड्स का लागू होना, ग्रीन कवर नियमों में लचीलापन और क्वालिटी कंट्रोल ऑर्डर्स पर पुनर्विचार जैसे कदम उद्योगों के लिए 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' को बढ़ावा दे रहे हैं। बीमा क्षेत्र में 100% एफडीआई की अनुमति से विदेशी बीमा कंपनियां भारत में बड़ा निवेश कर सकेंगी, जिससे बीमा की पहुंच बढ़ेगी और प्रीमियम कम होने की संभावना बनेगी। यह वित्तीय सुरक्षा के लिहाज से एक बड़ा कदम है।
ऊर्जा सेक्टर में यह बदलाव भारत को अपने कार्बन उत्सर्जन कम करने के अंतरराष्ट्रीय लक्ष्यों (Climate Commitments) को पूरा करने में भी मदद करेगा। अब तक भारत अपनी बिजली जरूरतों के लिए कोयले पर बहुत ज्यादा निर्भर है, जो प्रदूषण का बड़ा कारण है। परमाणु ऊर्जा के विस्तार से कोयले पर निर्भरता धीरे-धीरे घटेगी और पर्यावरणीय दबाव कम होगा। आम उपभोक्ता के मन में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इस निजीकरण से बिजली सस्ती होगी? विशेषज्ञों का मानना है कि इसका जवाब सीधे तौर पर 'हां' नहीं है, क्योंकि परमाणु बिजली की शुरुआती लागत अधिक होती है। लेकिन लंबे समय में जब उत्पादन बढ़ेगा, तकनीक बेहतर होगी और बाजार में प्रतिस्पर्धा आएगी, तो प्रति यूनिट लागत घटने की प्रबल संभावना है। इसका अंतिम फायदा उपभोक्ताओं को ही मिलेगा।
हमारी राय (The Trending People Analysis)
परमाणु ऊर्जा क्षेत्र का निजीकरण भारतीय अर्थव्यवस्था के उदारीकरण (Liberalization) के सफर का अगला बड़ा पड़ाव है। यह जोखिम और अवसर का एक संतुलित मिश्रण है। निजी क्षेत्र की दक्षता और पूंजी का उपयोग करके भारत अपनी ऊर्जा की भूख को मिटा सकता है।
The Trending People का विश्लेषण है कि यह फैसला भारत को ऊर्जा के मामले में महाशक्ति बना सकता है। हालांकि, सरकार को सुरक्षा के मोर्चे पर 'जीरो टॉलरेंस' की नीति अपनानी होगी। भोपाल गैस त्रासदी जैसे इतिहास वाले देश में औद्योगिक सुरक्षा सर्वोपरि होनी चाहिए। अगर सही नियमन और पारदर्शिता के साथ इसे लागू किया गया, तो यह निवेश, रोजगार और ऊर्जा सुरक्षा के तीनों मोर्चों पर भारत की तकदीर बदल सकता है। अब वह दिन दूर नहीं जब भारत में भी निजी कंपनियों द्वारा संचालित परमाणु रिएक्टर देश को रोशन करेंगे।
