आतिशी के वायरल वीडियो का सच आया सामने—फॉरेंसिक रिपोर्ट में निकला 'छेड़छाड़' का खेल, कोर्ट ने कहा- "तुरंत हटाओ यह फेक वीडियो
जालंधर/नई दिल्ली, दिनांक: 15 जनवरी 2026 — डिजिटल युग में 'सच' और 'झूठ' के बीच की लकीर कितनी धुंधली हो गई है, इसका ताजा उदाहरण दिल्ली की आम आदमी पार्टी (AAP) विधायक और पूर्व मुख्यमंत्री आतिशी मार्लेना (Atishi Marlena) से जुड़े वायरल वीडियो मामले में देखने को मिला है। सिखों की धार्मिक भावनाओं को आहत करने के आरोपों से घिरीं आतिशी के लिए जालंधर की अदालत से एक बड़ी राहत की खबर आई है। गुरुवार को कोर्ट ने एक अहम आदेश जारी करते हुए न केवल वीडियो को फर्जी करार दिया, बल्कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को इसे तत्काल प्रभाव से हटाने का निर्देश भी दिया।
यह मामला केवल एक वीडियो का नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रोपेगेंडा और डीपफेक/एडिटिंग (Video Doctoring) के खतरनाक चलन का है। कोर्ट ने फॉरेंसिक रिपोर्ट को आधार बनाते हुए माना कि सोशल मीडिया पर प्रसारित वीडियो के साथ छेड़छाड़ की गई थी ताकि एक विशेष नरेटिव सेट किया जा सके।
फॉरेंसिक रिपोर्ट का खुलासा: "वीडियो एडिटेड है"
मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट के सामने सबसे बड़ा सबूत फॉरेंसिक साइंस लैब (FSL) की रिपोर्ट थी। रिपोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि जो वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, वह मूल (Original) नहीं है।
- छेड़छाड़: जांच में सामने आया है कि वीडियो को जानबूझकर एडिट किया गया है। आतिशी के बयानों को संदर्भ से काटकर (Out of Context) और ऑडियो के साथ छेड़छाड़ करके पेश किया गया था।
- मकसद: इसका स्पष्ट उद्देश्य धार्मिक भावनाओं को भड़काना और उनकी राजनीतिक छवि को धूमिल करना था।
कोर्ट का हंटर: "हर लिंक डिलीट करो"
फॉरेंसिक रिपोर्ट देखने के बाद कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया।
- प्लेटफॉर्म्स को निर्देश: कोर्ट ने फेसबुक, एक्स (ट्विटर), इंस्टाग्राम और यूट्यूब समेत सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को आदेश दिया है कि उक्त विवादित वीडियो को तुरंत हटाया जाए।
- लिंक ब्लॉक: इसके साथ ही, जिन अकाउंट्स या पेजों ने इस वीडियो को साझा किया है, उनसे जुड़े यूआरएल (URL) और लिंक को भी हटाने या ब्लॉक करने का आदेश दिया गया है। कोर्ट का मानना है कि फर्जी सामग्री का प्रसार समाज में वैमनस्य फैला सकता है।
शिकायतकर्ता 'गायब': कौन है इकबाल सिंह बग्गा?
इस केस का एक और दिलचस्प और रहस्यमयी पहलू सामने आया है—शिकायतकर्ता की पहचान। जालंधर में जिस व्यक्ति की शिकायत पर आतिशी के खिलाफ धार्मिक भावनाओं को आहत करने (IPC 295A) की एफआईआर दर्ज की गई थी, वह अब पुलिस और मीडिया की पहुंच से बाहर है।
- पहचान: शिकायतकर्ता का नाम इकबाल सिंह बग्गा बताया गया है, जो जालंधर के मिट्ठू बस्ती इलाके का निवासी है।
- पता नहीं मिला: पुलिस और स्थानीय सूत्रों के मुताबिक, एफआईआर में दर्ज दस्तावेजों में घर का नंबर 180 लिखा है। लेकिन जब वहां जाकर देखा गया, तो इलाके में नंबर प्लेट्स व्यवस्थित न होने के कारण उस घर को ढूंढना नामुमकिन हो गया।
- सवाल: शिकायतकर्ता का सामने न आना इस बात का संकेत है कि यह एफआईआर शायद राजनीतिक द्वेष से प्रेरित थी या किसी 'घोस्ट कॉलर' (फर्जी शिकायतकर्ता) का काम था।
क्या था पूरा विवाद?
आरोप लगाया गया था कि दिल्ली विधानसभा की एक बहस के दौरान आतिशी ने सिख गुरुओं को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। इस कथित वीडियो को पंजाब और देश भर में वायरल किया गया, जिससे सिख समुदाय में भारी रोष फैल गया था। बीजेपी और शिरोमणि अकाली दल ने आतिशी और 'आप' को घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। लेकिन अब कोर्ट के आदेश ने विपक्ष के आरोपों की हवा निकाल दी है।
हमारी राय (The Trending People Analysis)
आतिशी मामले में कोर्ट का फैसला 'फेक न्यूज' के दौर में एक नजीर है। राजनीतिक विरोध स्वीकार्य है, लेकिन किसी के बयानों को एडिट करके धार्मिक उन्माद फैलाना अपराध है। फॉरेंसिक रिपोर्ट ने साबित कर दिया है कि तकनीक का इस्तेमाल हथियार की तरह किया जा रहा है।
The Trending People का विश्लेषण है कि शिकायतकर्ता का गायब होना पुलिसिया जांच पर सवाल खड़े करता है। बिना सत्यापन के एफआईआर दर्ज करना और माहौल खराब होने देना प्रशासन की लापरवाही है। सोशल मीडिया कंपनियों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी; 'वायरल' होने की होड़ में वे अक्सर 'सच्चाई' की बलि चढ़ा देती हैं। आतिशी को राहत मिली है, लेकिन यह घटना एक चेतावनी है कि हम अपनी स्क्रीन पर जो देखते हैं, उस पर आंख मूंदकर भरोसा न करें।
