PM Modi Israel Visit: 'नैतिक कायरता' या कूटनीतिक मास्टरस्ट्रोक? पीएम मोदी के इजराइल दौरे पर कांग्रेस का तीखा प्रहार
नई दिल्ली (नेशनल डेस्क): भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) बुधवार को अपने दो दिवसीय रणनीतिक दौरे के लिए इजराइल रवाना हो गए हैं। इस यात्रा के दौरान वह इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू (Benjamin Netanyahu) से द्विपक्षीय वार्ता करेंगे और इजराइल की संसद 'नेसेट' (Knesset) को भी संबोधित करेंगे। हालांकि, पीएम मोदी की यह यात्रा देश में एक बड़े राजनीतिक भूचाल का कारण बन गई है। कांग्रेस पार्टी ने इस दौरे को लेकर केंद्र सरकार और विशेष रूप से प्रधानमंत्री मोदी पर सीधा और तीखा हमला बोला है। प्रमुख विपक्षी दल ने इस कदम को गाजा में हो रहे मानवीय संकट की अनदेखी और 'नैतिक कायरता' करार दिया है।
सरकारी घोषणा का सारांश और योजना की रूपरेखा
विदेश मंत्रालय द्वारा जारी आधिकारिक घोषणा के अनुसार, प्रधानमंत्री मोदी का यह दो दिवसीय इजराइल दौरा दोनों देशों के बीच 30 वर्षों के राजनयिक संबंधों और रणनीतिक साझेदारी को और अधिक मजबूत करने के उद्देश्य से तय किया गया है।
योजना की रूपरेखा (Outline of the Visit):
- द्विपक्षीय वार्ता: पीएम मोदी और नेतन्याहू के बीच रक्षा, कृषि, जल प्रबंधन और साइबर सुरक्षा जैसे अहम मुद्दों पर उच्च स्तरीय बैठक होगी।
- नेसेट में संबोधन: प्रधानमंत्री मोदी इजराइली संसद 'नेसेट' को संबोधित करेंगे, जो एक दुर्लभ और विशेष कूटनीतिक सम्मान माना जाता है।
- उद्देश्य: इस कूटनीतिक यात्रा का मुख्य उद्देश्य पश्चिम एशिया (Middle East) में भारत के सामरिक हितों को सुरक्षित करना, रक्षा तकनीक हस्तांतरण को गति देना और व्यापारिक साझेदारी को नए आयाम तक ले जाना है।
हालांकि, यह यात्रा ऐसे समय में हो रही है जब इजराइल और हमास के बीच गाजा पट्टी (Gaza Strip) में भीषण युद्ध जारी है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इजराइल की सैन्य कार्रवाइयों की तीखी आलोचना हो रही है।
बयान: कांग्रेस नेताओं के तीखे प्रहार और ऐतिहासिक संदर्भ
प्रधानमंत्री के रवाना होने से ठीक पहले, कांग्रेस के शीर्ष नेताओं ने 'एक्स' (पूर्व में ट्विटर) पर मोर्चा खोल दिया। कांग्रेस ने भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के समय की विदेश नीति की याद दिलाते हुए वर्तमान सरकार की नीतियों को कटघरे में खड़ा किया।
जयराम रमेश का ऐतिहासिक पलटवार: कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने तीखे शब्दों का प्रयोग करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री मोदी वहां ''नैतिक कायरता'' (Moral Cowardice) का परिचय देने जा रहे हैं। उन्होंने भारतीय विदेश नीति के सुनहरे पन्नों को पलटते हुए सिलसिलेवार ऐतिहासिक तथ्य साझा किए:
- 20 मई 1960: "जवाहरलाल नेहरू गाजा में थे और उन्होंने वहां संयुक्त राष्ट्र आपातकालीन बल (UNEF) की भारतीय टुकड़ी से मुलाकात की थी।"
- 29 नवंबर 1981: "भारत ने फलस्तीन के साथ अपनी अटूट एकजुटता प्रदर्शित करते हुए एक विशेष स्मारक डाक टिकट जारी किया था।"
- 18 नवंबर 1988: "भारत ने आधिकारिक और औपचारिक रूप से फलस्तीन राष्ट्र को मान्यता दी थी।"
जयराम रमेश ने मौजूदा प्रधानमंत्री पर कड़ा प्रहार करते हुए लिखा, "वह एक अलग युग था। अब भारतीय प्रधानमंत्री बेशर्मी से इजराइल के प्रधानमंत्री को गले लगा रहे हैं, जिन्होंने गाजा को मलबे और धूल में बदल दिया है और जो कब्जे वाले वेस्ट बैंक में अवैध बस्तियों के विस्तार की योजना बना रहे हैं।" रमेश का स्पष्ट आरोप है कि जब पूरी दुनिया नेतन्याहू की अमानवीय नीतियों की निंदा कर रही है, तब भारत का उनके साथ खड़ा होना एक शर्मनाक कूटनीतिक विफलता है।
प्रियंका गांधी वाद्रा की न्याय की अपील: कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाद्रा ने भी इस मुद्दे पर अपनी कड़ी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने एक्स पर पोस्ट करते हुए लिखा, "मुझे आशा है कि माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी अपनी आगामी इजराइल यात्रा पर नेसेट को संबोधित करते हुए गाजा में हजारों निर्दोष पुरुषों, महिलाओं और बच्चों के नरसंहार का स्पष्ट उल्लेख करेंगे और उनके लिए न्याय की पुरजोर मांग करेंगे।" प्रियंका गांधी ने जोर देकर कहा कि एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में भारत ने अपने पूरे इतिहास में हमेशा सत्य और न्याय का साथ दिया है। "हमें दुनिया को सत्य, शांति और न्याय की रोशनी दिखाना जारी रखना चाहिए," उन्होंने कहा।
जनता और विशेषज्ञों की प्रतिक्रिया
इस हाई-प्रोफाइल दौरे और उस पर विपक्ष की प्रतिक्रिया ने भारतीय विदेश नीति के जानकारों और आम जनता को दो खेमों में बांट दिया है।
- कूटनीतिक विशेषज्ञ: कई रक्षा और रणनीतिक मामलों के जानकारों का मानना है कि प्रधानमंत्री मोदी की यह यात्रा पूरी तरह से 'यथार्थवादी कूटनीति' (Realpolitik) पर आधारित है। भारत को अपनी रक्षा जरूरतों, आतंकवाद से निपटने की रणनीतियों और कृषि तकनीकी के लिए इजराइल की आवश्यकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, राष्ट्रीय हितों को अंतरराष्ट्रीय भावनाओं से ऊपर रखना आधुनिक कूटनीति का हिस्सा है।
- मानवाधिकार कार्यकर्ता और जनता: दूसरी ओर, मानवाधिकार संगठनों और एक बड़े तबके का मानना है कि गाजा में मारे गए 30,000 से अधिक नागरिकों (जिनमें बड़ी संख्या में महिलाएं और बच्चे शामिल हैं) को देखते हुए, भारत का इजराइल के साथ इस तरह गर्मजोशी से मिलना महात्मा गांधी और नेल्सन मंडेला के आदर्शों के खिलाफ है। सोशल मीडिया पर #StandWithPalestine और #PMInIsrael जैसे हैशटैग के साथ तीखी बहस छिड़ी हुई है।
प्रभाव: सामाजिक-आर्थिक और कूटनीतिक असर
प्रधानमंत्री मोदी के इस दौरे के केवल राजनीतिक ही नहीं, बल्कि गहरे सामाजिक-आर्थिक (Socio-economic) और भू-राजनीतिक प्रभाव भी हैं:
- रक्षा और आर्थिक साझेदारी: इजराइल भारत का एक प्रमुख हथियार आपूर्तिकर्ता है। इस यात्रा से मेक इन इंडिया के तहत ड्रोन्स, मिसाइल डिफेंस सिस्टम और उन्नत राडार के भारत में निर्माण का रास्ता साफ होगा। साथ ही कृषि और जल-संरक्षण के क्षेत्र में इजरायली तकनीक भारतीय किसानों के लिए वरदान साबित हो सकती है।
- अरब देशों के साथ संतुलन: भारत के लिए सबसे बड़ी कूटनीतिक चुनौती इजराइल के साथ दोस्ती बढ़ाते हुए यूएई, सऊदी अरब और ईरान जैसे खाड़ी देशों के साथ अपने संबंधों को संतुलित रखना है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों (कच्चे तेल) और लाखों प्रवासी भारतीयों के रोजगार के लिए अरब देशों पर निर्भर है।
- घरेलू ध्रुवीकरण: इस दौरे का घरेलू राजनीति पर भी सीधा असर पड़ रहा है। विपक्ष इसे एक विशेष वर्ग (मुस्लिम मतदाताओं) के प्रति सरकार की असंवेदनशीलता के रूप में पेश कर रहा है। कांग्रेस के बयान इसी घरेलू राजनीतिक नैरेटिव को सेट करने का प्रयास हैं, जिससे आने वाले चुनावों में सामाजिक ध्रुवीकरण देखने को मिल सकता है।
निष्कर्ष
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इजराइल यात्रा और नेसेट में उनका संबोधन भारत की विदेश नीति में आए एक स्पष्ट 'पैराडाइम शिफ्ट' (Paradigm Shift) को दर्शाता है। जहाँ पहले भारत की विदेश नीति आदर्शवाद और गुटनिरपेक्षता के सिद्धांतों पर चलती थी, वहीं आज वह पूरी तरह से व्यावहारिक और राष्ट्रीय हित-केंद्रित हो गई है। कांग्रेस के आरोप अपनी जगह सही हो सकते हैं कि भारत ने ऐतिहासिक रूप से फलस्तीन का समर्थन किया है, लेकिन बदलती वैश्विक व्यवस्था में सरकार वर्तमान लाभ और रणनीतिक गठबंधन को अधिक तरजीह दे रही है। यह देखना दिलचस्प होगा कि पीएम मोदी अपनी इस यात्रा के दौरान गाजा संकट पर भारत का रुख किस तरह दुनिया के सामने रखते हैं।
संपादकीय विश्लेषण (TheTrendingPeople.com की राय में)
कांग्रेस और भाजपा के बीच यह टकराव केवल एक विदेशी दौरे का विरोध नहीं है, बल्कि यह भारत की आत्मा और उसकी पहचान से जुड़ा एक वैचारिक संघर्ष है। एक ओर जहाँ कांग्रेस 'नेहरूवियन आदर्शवाद' (Nehruvian Idealism) और मानवाधिकारों की दुहाई दे रही है, वहीं दूसरी ओर मोदी सरकार 'इंडिया फर्स्ट' (India First) के यथार्थवादी सिद्धांत पर आगे बढ़ रही है।
क्या कूटनीति में नैतिकता का कोई स्थान नहीं रह गया है? यह सवाल जायज है। जब गाजा में मानवीय त्रासदी अपने चरम पर है, ऐसे में नेतन्याहू के साथ खुले तौर पर खड़े होना विश्व पटल पर भारत की छवि को एक 'मूक दर्शक' या 'समर्थक' के रूप में भी पेश कर सकता है। भारत को विश्वगुरु बनने के लिए न केवल आर्थिक और सैन्य ताकत चाहिए, बल्कि वह नैतिक बल भी चाहिए जो अन्याय के खिलाफ आवाज उठा सके। प्रियंका गांधी की यह बात बिल्कुल सही है कि पीएम मोदी को नेसेट के मंच का उपयोग कर शांति और न्याय की वकालत करनी चाहिए, क्योंकि यही भारत का सच्चा और प्राचीन चरित्र है। कूटनीतिक जीत तभी सार्थक है, जब वह इंसानियत की कीमत पर न मिले।
