भारतीय सिनेमा में कुछ कलाकार ऐसे होते हैं जो अपनी मेहनत और प्रयोगों से खुद को बार-बार साबित करते हैं। ऐसे ही अभिनेता हैं जितेंद्र, जिनका असली नाम रवि कुमार था। 200 से अधिक फिल्मों में काम कर चुके जितेंद्र ने हिंदी सिनेमा को एक अलग ऊर्जा और पहचान दी। हालांकि, उनके लंबे करियर में साल 1972 में आई फिल्म परिचय उनके लिए सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुई।
निर्देशक गुलज़ार की इस फिल्म ने जितेंद्र की छवि को पूरी तरह बदल दिया। इससे पहले वह ‘जंपिंग जैक’ के नाम से जाने जाते थे, जो सफेद जूतों में ऊर्जावान डांस के लिए मशहूर थे। लेकिन ‘परिचय’ में उन्होंने एक गंभीर और भावनात्मक किरदार ‘रवि’ निभाया, जिसने दर्शकों को चौंका दिया।
फिल्म में उनका साधारण लुक—सफेद कुर्ता, पतली मूंछें और आंखों में गहराई—ने उनके अभिनय के नए आयाम को सामने रखा। खासतौर पर “मुसाफिर हूं यारों” जैसे गीतों ने फिल्म को और यादगार बना दिया।
फिल्म इंडस्ट्री में पहले यह धारणा थी कि जितेंद्र केवल डांस और हल्के-फुल्के किरदारों तक सीमित हैं। यहां तक कि कुछ लोगों ने उन्हें भावहीन अभिनेता तक कहा। लेकिन ‘परिचय’ के लिए उन्होंने खुद को पूरी तरह बदलने की ठानी।
कहा जाता है कि गुलज़ार ने उन्हें बिना डायलॉग के सिर्फ आंखों और चेहरे के भाव से अभिनय करने का अभ्यास कराया। जितेंद्र ने बंद कमरे में लगातार प्रैक्टिस की और इसका परिणाम फिल्म में साफ नजर आया। दर्शकों और समीक्षकों ने उनके इस नए अंदाज को खूब सराहा।
‘गीत गाया पत्थरों ने’, ‘फर्ज’ और ‘हमजोली’ जैसी फिल्मों में उनकी एक तय छवि बन चुकी थी, लेकिन ‘परिचय’ ने उस छवि को तोड़कर उन्हें एक गंभीर अभिनेता के रूप में स्थापित किया। यह फिल्म न केवल एक क्लासिक फैमिली ड्रामा बनी, बल्कि बॉक्स ऑफिस पर भी सफल रही।
हमारी राय में
जितेंद्र का करियर इस बात का उदाहरण है कि एक कलाकार अगर खुद को बदलने का साहस रखता है, तो वह किसी भी छवि से बाहर निकल सकता है। ‘परिचय’ सिर्फ एक फिल्म नहीं थी, बल्कि यह उनके करियर का पुनर्जन्म थी। आज के दौर में भी कलाकारों के लिए यह सीख है कि टाइपकास्ट होने के बावजूद खुद पर काम करके नई पहचान बनाई जा सकती है।
