पश्चिम एशिया में जारी तनाव ने भारत की ऊर्जा संरचना की कमजोरियों को फिर से उजागर कर दिया है। Reserve Bank of India (RBI) की मौद्रिक नीति समिति के बाहरी सदस्य Nagesh Kumar ने साफ कहा है कि आयातित कच्चे तेल पर अत्यधिक निर्भरता भारत को वैश्विक झटकों के प्रति असुरक्षित बनाती है। ऐसे समय में जब तेल की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं, सवाल यह है कि क्या भारत ने समय रहते अपनी ऊर्जा रणनीति को पर्याप्त रूप से मजबूत किया है।
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल और गैस के रूप में आयात करता है, जिससे पश्चिम एशिया जैसे अस्थिर क्षेत्रों पर उसकी निर्भरता बनी रहती है। मौजूदा संकट के चलते आपूर्ति मार्गों में बाधाएं आई हैं और कीमतों में उछाल देखने को मिला है। इसका सीधा असर आयात बिल, रुपये की मजबूती और औद्योगिक लागत पर पड़ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह स्थिति लंबी चली तो चालू खाते का घाटा और मुद्रास्फीति दोनों पर दबाव बढ़ सकता है।
हालांकि भारत की आर्थिक वृद्धि दर 2026-27 में करीब 7 प्रतिशत रहने का अनुमान है, लेकिन ऊर्जा कीमतों में उतार-चढ़ाव इस गति को प्रभावित कर सकता है। खासकर सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSME) पर इसका असर साफ दिखने लगा है, जहां ईंधन लागत बढ़ने से मुनाफा घट रहा है। इसके साथ ही वैश्विक अनिश्चितताओं ने निवेश और मांग के माहौल को भी कमजोर किया है।
सरकार की ओर से कूटनीतिक प्रयासों और उत्पाद शुल्क में कटौती जैसे कदम जरूर उठाए गए हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या ये कदम दीर्घकालिक समाधान दे पाएंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल अस्थायी राहत से काम नहीं चलेगा। घरेलू तेल और गैस अन्वेषण को बढ़ाना, रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार का विस्तार करना और नवीकरणीय ऊर्जा की ओर तेज बदलाव अब विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता बन चुका है।
ऊर्जा क्षेत्र में विद्युतीकरण, आयात स्रोतों का विविधीकरण और ऊर्जा दक्षता बढ़ाने जैसे कदम भारत को भविष्य के झटकों से बचा सकते हैं। इसके साथ ही निर्यात बढ़ाकर बाहरी असंतुलन को संतुलित करने की जरूरत भी लगातार सामने आ रही है।
यह संकट केवल एक अस्थायी वैश्विक घटना नहीं, बल्कि भारत की ऊर्जा नीति के लिए चेतावनी है। बार-बार सामने आने वाले ऐसे झटके दिखाते हैं कि आयात आधारित मॉडल लंबे समय तक टिकाऊ नहीं है। सरकार ने कुछ तात्कालिक कदम जरूर उठाए हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में प्रगति अभी भी धीमी नजर आती है। यदि भारत को अपनी तेज आर्थिक वृद्धि बनाए रखनी है, तो उसे ऊर्जा क्षेत्र में निर्णायक और आक्रामक सुधार करने होंगे। आने वाले समय में यह साफ हो जाएगा कि मौजूदा रणनीति सिर्फ संकट प्रबंधन तक सीमित है या वास्तव में दीर्घकालिक समाधान की ओर बढ़ रही है।
