भारत-अमेरिका में 18% टैरिफ पर डील—विपक्ष ने पूछा "सच क्या है?", विशेषज्ञों ने बताया "आत्मनिर्भर भारत की जीत", जानें इस समझौते के हर पहलू का विश्लेषणImage via IANS
नई दिल्ली/वाशिंगटन, दिनांक: 4 फरवरी 2026 — भारत और अमेरिका के बीच चल रही कूटनीतिक रस्साकशी आखिरकार एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में दोनों देशों के बीच तनावपूर्ण रहे व्यापारिक संबंधों को अब एक नई दिशा मिली है। दोनों देशों के बीच 18 फीसदी टैरिफ वाली डील पक्की हो गई है, जिसके साथ ही भारत को अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा लगाए गए संभावित 50 प्रतिशत दंडात्मक शुल्क (25% टैरिफ + 25% रूसी तेल खरीद पर अतिरिक्त शुल्क) से बड़ी राहत मिल गई है। राष्ट्रपति ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच सोमवार को हुई एक महत्वपूर्ण फोन वार्ता के बाद इस नए समझौते का ऐलान किया गया।
हालांकि, इस समझौते की शर्तों को लेकर पारदर्शिता का मुद्दा गरमाया हुआ है। जहां एक तरफ बाजार इसे ऐतिहासिक बता रहा है, वहीं विपक्ष और कुछ कूटनीतिक विशेषज्ञ इसकी शर्तों और रूसी तेल पर लगी पाबंदियों को लेकर सवाल उठा रहे हैं।
राजनीतिक घमासान: "जश्न से पहले शर्तें बताएं"
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सांसद शशि थरूर (Shashi Tharoor) ने मंगलवार को केंद्र सरकार की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए मांग की है कि इस 'सीक्रेट डील' के सभी पहलुओं को सार्वजनिक किया जाए। थरूर ने एएनआई से बातचीत में तंज कसते हुए कहा कि भले ही टैरिफ को 50 फीसदी से घटाकर 18 फीसदी करना एक सकारात्मक खबर हो, लेकिन सरकार को पहले यह स्पष्ट करना चाहिए कि इसके बदले में हमने क्या खोया है? उनका कहना है कि वे भी इस डील का जश्न मनाना चाहेंगे, लेकिन पहले सरकार देश को यह तो बताए कि मसला आखिर है क्या? थरूर की मुख्य आपत्ति सरकार की 'ट्वीट कूटनीति' को लेकर रही। उन्होंने पूछा कि क्या हमारे पास सिर्फ राष्ट्रपति ट्रंप और प्रधानमंत्री मोदी के ट्वीट्स ही जानकारी का स्रोत हैं?
विपक्ष और कांग्रेस पार्टी की चिंता का एक और बड़ा केंद्र बिंदु भारत का कृषि क्षेत्र और ऊर्जा सुरक्षा है। शशि थरूर ने आशंका जताई कि यदि अमेरिका भारत को अपने कृषि उत्पादों का बड़ा बाजार बनाना चाहता है, तो इसका सीधा असर हमारे किसानों पर पड़ेगा। उन्होंने सवाल किया कि क्या भारतीय किसानों के हितों की सुरक्षा के लिए कोई प्रावधान किए गए हैं? वहीं, सबसे बड़ा सवाल रूसी तेल को लेकर है। कांग्रेस ने पूछा है कि क्या मोदी सरकार ने ट्रंप के दावे के अनुसार रूस से मिलने वाले रियायती तेल की खरीद बंद करने पर सहमति जता दी है?
विशेषज्ञों की राय: "सकारात्मक विकास, लेकिन चुनौतियां बरकरार"
इस डील पर विदेश मामलों और बाजार के विशेषज्ञों की प्रतिक्रिया मिली-जुली रही है।
- केपी फैबियन (विदेश मामलों के विशेषज्ञ): उन्होंने इसे एक मिश्रित परिणाम बताया। फैबियन ने कहा, "यह अच्छा है कि कुछ डील हुई है, क्योंकि हमारा रुपया नीचे जा रहा था। जियो-पॉलिटिक्स में अगर किसी देश का अमेरिका के साथ संबंध अच्छा नहीं है, तो उसकी वैश्विक स्थिति कमजोर होती है। इसलिए संबंध मजबूत करना जरूरी है।" हालांकि, उन्होंने शर्तों पर चिंता जताते हुए कहा कि ट्रंप ने टैरिफ 18% किया है, लेकिन वे भारत से अमेरिकी एक्सपोर्ट्स के लिए 'जीरो टैरिफ' चाहते हैं। ग्लोबल इंपोर्ट्स में अमेरिका का शेयर केवल 9% होने के बावजूद, जो उनके बाजार में आना चाहते हैं, उन्हें उनके नियम मानने पड़ रहे हैं।
- महेश कुमार सचदेव (पूर्व राजनयिक): उन्होंने इसे भारत की आत्मनिर्भरता की जीत बताया। सचदेव ने कहा, "यह एक सकारात्मक विकास है जो दिखाता है कि भारत स्वावलंबी है और आत्मविश्वास के साथ लंबी अवधि के समझौतों के लिए तैयार है। अन्य देशों (जैसे ईयू) के साथ हुए समझौतों ने ट्रंप पर दबाव बनाया कि अगर वे 50% टैरिफ पर अड़े रहते, तो अमेरिका को ही भारत जैसे बाजार से हाथ धोना पड़ता।"
- रिक रोसो (CSIS): सीएसआईएस में भारत और इमर्जिंग एशिया इकोनॉमिक्स के चेयर रिक रोसो ने इसे 'ऐतिहासिक दिन' करार दिया। उन्होंने कहा कि लंबे इंतजार के बाद द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर हुए हैं। 2025 में भारी टैरिफ के बावजूद व्यापार का मजबूत बना रहना दोनों देशों की आर्थिक गहराई को दर्शाता है।
- सुनील शाह (मार्केट एक्सपर्ट): बाजार के नजरिए से सुनील शाह ने इसे 'पक्का सेंटिमेंट बूस्टर' कहा। उनका मानना है कि यह डील साफ इरादा दिखाती है कि अमेरिका, ब्रिटेन और ईयू भारत के साथ हैं। उन्होंने कहा, "व्यापार समझौते दोनों तरफ के लिए फायदेमंद होते हैं; यह हमेशा जीत की स्थिति होती है। एंगेजमेंट की गैर-मौजूदगी में ही चुनौतियां आती हैं।"
हमारी राय (The Trending People Analysis)
भारत-अमेरिका डील एक जटिल भू-राजनीतिक शतरंज की चाल है। यूरोपीय संघ के साथ डील करके भारत ने अपनी सौदेबाजी की ताकत दिखाई, जिसका असर वाशिंगटन पर पड़ा। लेकिन रूसी तेल छोड़ने की शर्त भारत की ऊर्जा सुरक्षा और महंगाई के लिए एक चुनौती बन सकती है।
The Trending People का विश्लेषण है कि शशि थरूर द्वारा उठाए गए पारदर्शिता के सवाल जायज हैं। 18% टैरिफ एक बड़ी राहत है, लेकिन अगर इसकी कीमत किसानों के हित या महंगी ऊर्जा है, तो संसद में इस पर बहस होनी चाहिए। विशेषज्ञों की राय भी यही इशारा करती है कि यह डील रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन इसकी आर्थिक कीमत का आकलन लंबी अवधि में ही हो पाएगा। यह डील 2026 की कूटनीति का सबसे बड़ा जुआ साबित हो सकती है।
