भारत-अमेरिका में 18% टैरिफ पर बनी बात, रूसी तेल पर 'ना' की शर्त; डील पर शशि थरूर ने पूछा- "जश्न से पहले सच तो बताइए
नई दिल्ली/वाशिंगटन, दिनांक: 4 फरवरी 2026 — भारत और अमेरिका के बीच चल रही कूटनीतिक रस्साकशी आखिरकार एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है। दोनों देशों के बीच 18 फीसदी टैरिफ वाली डील पक्की हो गई है, जिसके साथ ही भारत को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा लगाए जाने वाले संभावित 50 प्रतिशत दंडात्मक शुल्क से बड़ी राहत मिल गई है। हालांकि, इस समझौते की शर्तों को लेकर दोनों ही पक्षों ने अभी तक विस्तार से आधिकारिक जानकारी साझा नहीं की है। राष्ट्रपति ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच सोमवार को हुई एक महत्वपूर्ण फोन वार्ता के बाद इस नए समझौते का ऐलान किया गया। लेकिन इस राहत के पीछे एक बड़ी और संवेदनशील शर्त छिपी है—भारत को रूस से तेल की खरीद बंद करनी होगी। इस क्लॉज ने जहां एक तरफ रणनीतिक विशेषज्ञों के कान खड़े कर दिए हैं, वहीं दूसरी तरफ विपक्ष ने सरकार की पारदर्शिता पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं।
इस डील की टाइमिंग और पृष्ठभूमि बेहद दिलचस्प है। न्यूजवीक की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका के अचानक नरम पड़ने के पीछे यूरोपीय संघ (EU) के साथ भारत की हालिया डील का भारी दबाव रहा है। भारत और यूरोपीय संघ ने बीते मंगलवार को एफटीए पर वार्ता के समापन की घोषणा की थी, जिसे ब्रुसेल्स और पीएम मोदी दोनों ने ऐतिहासिक बताया था। इसे व्यापारिक हलकों में 'मदर ऑफ ऑल डील्स' कहा जा रहा है। इस समझौते के तहत भारत के 93 प्रतिशत निर्यात को 27 देशों वाले यूरोपीय संघ में शुल्क-मुक्त पहुंच मिलेगी, जबकि यूरोपीय संघ से लग्जरी कारों और वाइन का आयात सस्ता हो जाएगा। करीब दो दशक तक चली बातचीत के बाद हुए इस समझौते से भारत और यूरोपीय संघ के बीच लगभग दो अरब लोगों का साझा बाजार बनेगा। भारत दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और यूरोपीय संघ दूसरी। माना जा रहा है कि इस डील के बाद भारत का पलड़ा भारी हो गया था और अमेरिका को यह डर सताने लगा था कि वह भारत जैसे विशाल बाजार में पीछे छूट जाएगा।
हालांकि, इस कूटनीतिक जीत के बीच घरेलू राजनीति में उबाल आ गया है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सांसद शशि थरूर (Shashi Tharoor) ने मंगलवार को केंद्र सरकार की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए मांग की है कि इस 'सीक्रेट डील' के सभी पहलुओं को सार्वजनिक किया जाए। थरूर ने एएनआई से बातचीत में तंज कसते हुए कहा कि भले ही टैरिफ को 50 फीसदी से घटाकर 18 फीसदी करना एक सकारात्मक खबर हो, लेकिन सरकार को पहले यह स्पष्ट करना चाहिए कि इसके बदले में हमने क्या खोया है? उनका कहना है कि वे भी इस डील का जश्न मनाना चाहेंगे, लेकिन पहले सरकार देश को यह तो बताए कि मसला आखिर है क्या? थरूर की मुख्य आपत्ति सरकार की 'ट्वीट कूटनीति' को लेकर रही। उन्होंने पूछा कि क्या हमारे पास सिर्फ राष्ट्रपति ट्रंप और प्रधानमंत्री मोदी के ट्वीट्स ही जानकारी का स्रोत हैं? क्या दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में संसद और जनता को अंधेरे में रखना उचित है?
विपक्ष और कांग्रेस पार्टी की चिंता का एक और बड़ा केंद्र बिंदु भारत का कृषि क्षेत्र और ऊर्जा सुरक्षा है। शशि थरूर ने आशंका जताई कि यदि अमेरिका भारत को अपने कृषि उत्पादों का बड़ा बाजार बनाना चाहता है, तो इसका सीधा असर हमारे किसानों पर पड़ेगा। उन्होंने सवाल किया कि क्या भारतीय किसानों के हितों की सुरक्षा के लिए कोई प्रावधान किए गए हैं? वहीं, सबसे बड़ा सवाल रूसी तेल को लेकर है। कांग्रेस ने पूछा है कि क्या मोदी सरकार ने ट्रंप के दावे के अनुसार रूस से मिलने वाले रियायती तेल की खरीद बंद करने पर सहमति जता दी है? रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकियों के लिए यह मामला एनर्जी और जियोपॉलिटिक्स से जुड़ा है। वाइट हाउस ने संकेत दिए हैं कि टैरिफ में राहत के तार रूस के राजस्व को रोकने से जुड़े हुए हैं। ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने हाल ही में कहा था कि भारत की रूसी तेल की खरीदी खत्म हो गई है, जिसके बाद ही टैरिफ हटाने का सुझाव दिया गया।
अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों के मुताबिक, एपी ने इस फैसले पर साफ शब्दों में रणनीति बताई है। इसमें कहा गया है कि यूक्रेन युद्ध को खत्म करने के लिए रूस पर दबाव डाला जाना अमेरिका की प्राथमिकता है, जहां ट्रंप वेनेजुएला जैसे विकल्पों की ओर भी इशारा कर रहे हैं। अब ईरान का मामला तूल पकड़ने के साथ ही यह दांव और भी जरूरी हो गया है, क्योंकि मिडिल ईस्ट में थोड़ी भी हलचल तेल बाजार में कीमतों में आग लगा सकती है। राजनीतिक रूप से देखा जाए तो ट्रंप ने दबाव के जरिए शांति की सुर्खियां बटोरीं, वहीं पीएम मोदी को टैरिफ से राहत और निर्यात के लिए रास्ता मिला। गहराई में इसके तार रणनीतिक सप्लाई चेन से भी जुड़े हैं। वॉशिंगटन चाहता है कि भारत चीन के विकल्प के तौर पर मैन्युफैक्चरिंग और डिफेंस पार्टनर के तौर पर खड़ा रहे। वहीं, भारत इस बात का सबूत चाहता है कि अमेरिका के साथ खड़े होने का उसे आर्थिक फायदा मिलेगा।
हमारी राय
भारत-अमेरिका डील एक जटिल भू-राजनीतिक शतरंज की चाल है। यूरोपीय संघ के साथ डील करके भारत ने अपनी सौदेबाजी की ताकत दिखाई, जिसका असर वाशिंगटन पर पड़ा। लेकिन रूसी तेल छोड़ने की शर्त भारत की ऊर्जा सुरक्षा और महंगाई के लिए एक चुनौती बन सकती है।
The Trending People का विश्लेषण है कि शशि थरूर द्वारा उठाए गए पारदर्शिता के सवाल जायज हैं। 18% टैरिफ एक बड़ी राहत है, लेकिन अगर इसकी कीमत किसानों के हित या महंगी ऊर्जा है, तो संसद में इस पर बहस होनी चाहिए। सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि 'जीरो टैरिफ' और 'तेल प्रतिबंध' की शर्तें भारतीय अर्थव्यवस्था के दीर्घकालिक हितों के साथ कैसे मेल खाती हैं। यह डील 2026 की कूटनीति का सबसे बड़ा जुआ साबित हो सकती है।
