सिर्फ ट्वीट काफी नहीं, देश को सच बताइए"—भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर शशि थरूर का सरकार से सीधा सवाल, "क्या किसानों के हितों का सौदा हो गया?
नई दिल्ली, दिनांक: 4 फरवरी 2026 — भारत और अमेरिका के बीच हुए ऐतिहासिक व्यापार समझौते पर जहां बाजार में जश्न का माहौल है, वहीं राजनीतिक गलियारों में सवालों का बवंडर उठना शुरू हो गया है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सांसद शशि थरूर (Shashi Tharoor) ने मंगलवार को केंद्र सरकार की कार्यशैली और पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए मांग की है कि इस 'सीक्रेट डील' के सभी पहलुओं को सार्वजनिक किया जाए। कूटनीतिक मामलों के जानकार माने जाने वाले थरूर ने एएनआई से बातचीत में तंज कसते हुए कहा कि भले ही भारतीय वस्तुओं पर अमेरिकी टैरिफ को 50 फीसदी से घटाकर 18 फीसदी करना एक सकारात्मक खबर हो सकती है, लेकिन सरकार को पहले यह स्पष्ट करना चाहिए कि इसके बदले में हमने क्या खोया है? उनका कहना है कि वे भी इस डील का जश्न मनाना चाहेंगे, लेकिन पहले सरकार देश को यह तो बताए कि मसला आखिर है क्या?
थरूर की मुख्य आपत्ति सरकार की 'ट्वीट कूटनीति' को लेकर रही। उन्होंने संसदीय लोकतंत्र की मर्यादाओं का हवाला देते हुए पूछा कि क्या हमारे पास सिर्फ राष्ट्रपति ट्रंप और प्रधानमंत्री मोदी के ट्वीट्स ही जानकारी का एकमात्र स्रोत हैं? क्या दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में संसद और जनता को अंधेरे में रखना उचित है? थरूर का तर्क है कि इतने बड़े और दूरगामी प्रभाव वाले समझौते की जानकारी संसद के पटल पर रखी जानी चाहिए थी, न कि सोशल मीडिया के जरिए साझा की जानी चाहिए। उन्होंने सरकार से मांग की है कि वह देश की जनता को समझाए कि इस सौदे की शर्तें (Terms and Conditions) क्या हैं और भारत ने अमेरिका को क्या आश्वासन दिए हैं।
विपक्ष की चिंता का सबसे बड़ा केंद्र बिंदु भारत का कृषि क्षेत्र है। शशि थरूर ने आशंका जताई कि यदि अमेरिका भारत को अपने कृषि उत्पादों का बड़ा बाजार बनाना चाहता है, जैसा कि ट्रंप ने संकेत दिया है, तो इसका सीधा असर हमारे किसानों पर पड़ेगा। उन्होंने सवाल किया कि क्या भारतीय किसानों के हितों की सुरक्षा के लिए कोई प्रावधान (Safeguards) किए गए हैं या फिर उन्हें अमेरिकी कॉरपोरेट खेती के सामने खुला छोड़ दिया गया है? इसके अलावा, थरूर ने आयात के गणित पर भी सवाल उठाया। उन्होंने पूछा कि अगर अमेरिका भारत के साथ 500 अरब डॉलर के व्यापार की बात कर रहा है, जबकि भारत का कुल आयात बिल लगभग 700 अरब डॉलर है, तो क्या इसका मतलब यह है कि भारत को रूस या अन्य देशों से आयात कम करके अमेरिका से खरीदना पड़ेगा? यह भारत की रणनीतिक स्वायत्तता पर भी सवाल खड़ा करता है।
कांग्रेस पार्टी ने भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर एक विस्तृत पोस्ट साझा कर सरकार को घेरा है। पार्टी ने आपत्ति जताई कि जिस तरह युद्धविराम की घोषणाएं एकतरफा होती हैं, वैसे ही इस व्यापार समझौते की घोषणा भी अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा की गई और यह बताया गया कि यह पीएम मोदी के अनुरोध पर हुआ है, जो भारत की कूटनीतिक स्थिति को कमजोर दिखाता है। कांग्रेस ने 'जीरो टैरिफ' के डर को भी रेखांकित किया है। ट्रंप के दावे के अनुसार, भारत अमेरिकी उत्पादों पर टैरिफ और गैर-टैरिफ बाधाओं को शून्य करने पर सहमत हो गया है। कांग्रेस का मानना है कि इससे भारतीय बाजार पूरी तरह अमेरिका के लिए खुल जाएगा, जिससे स्थानीय एमएसएमई (MSME) और छोटे व्यापारियों को भारी नुकसान हो सकता है।
रूसी तेल पर पाबंदी का मुद्दा भी गरमाया हुआ है। कांग्रेस ने सीधा सवाल पूछा है कि क्या मोदी सरकार ने ट्रंप के दावे के अनुसार रूस से मिलने वाले रियायती तेल की खरीद बंद करने पर सहमति जता दी है? अगर ऐसा है, तो यह भारत की ऊर्जा सुरक्षा और महंगाई पर सीधा प्रहार होगा। विपक्ष का मुख्य तर्क यही है कि किसी भी बड़े अंतरराष्ट्रीय समझौते को केवल सोशल मीडिया की वाहवाही तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए। कांग्रेस ने मांग की है कि सरकार संसद और जनता के सामने इस सौदे का पूरा कच्चा चिट्ठा (White Paper) रखे ताकि यह स्पष्ट हो सके कि भारतीय किसानों और राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा कैसे की जा रही है।
हमारी राय (The Trending People Analysis)
शशि थरूर द्वारा उठाए गए सवाल लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका को सही ठहराते हैं। पारदर्शिता के बिना कोई भी समझौता संदेह के घेरे में रहता है। अगर भारत ने कृषि क्षेत्र को अमेरिका के लिए खोला है, तो यह एक बहुत बड़ा नीतिगत बदलाव है जिस पर बहस होनी चाहिए।
The Trending People का विश्लेषण है कि सरकार को जल्द ही स्थिति स्पष्ट करनी होगी। 18% टैरिफ अच्छी खबर है, लेकिन अगर उसकी कीमत 'जीरो टैरिफ' और रूसी तेल का त्याग है, तो यह सौदा महंगा पड़ सकता है। संसदीय लोकतंत्र में जनता को यह जानने का हक है कि उनके भविष्य के फैसले बंद कमरों में किन शर्तों पर लिए जा रहे हैं।
