ट्रंप के दावे पर रूस की 'दो टूक'—कहा "भारत ने तेल रोकने की कोई बात नहीं कही," मास्को ने दिल्ली के साथ रिश्तों को बताया 'अटूट
मॉस्को/वाशिंगटन/नई दिल्ली, दिनांक: 4 फरवरी 2026 — वैश्विक कूटनीति के पटल पर ऊर्जा और व्यापार को लेकर एक नई रस्साकशी शुरू हो गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) द्वारा किए गए एक सनसनीखेज दावे के बाद भारत, अमेरिका और रूस के त्रिकोणीय संबंधों में हलचल तेज हो गई है। सोमवार को एक ऐतिहासिक व्यापार समझौते का ऐलान करते हुए ट्रंप ने दावा किया था कि भारत ने अमेरिका के साथ डील के तहत रूस से कच्चा तेल खरीदना बंद करने पर सहमति जता दी है। इस बयान ने अंतरराष्ट्रीय बाजारों और रणनीतिक गलियारों में खलबली मचा दी थी। लेकिन अब रूस ने इस दावे पर अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए बेहद सधी हुई मगर दो टूक प्रतिक्रिया दी है।
रूस के राष्ट्रपति कार्यालय (क्रेमलिन) के प्रवक्ता दिमित्री पेसकोव (Dmitry Peskov) ने मंगलवार को साफ शब्दों में कहा कि मास्को को नई दिल्ली की ओर से ऐसा कोई आधिकारिक संदेश या संकेत नहीं मिला है कि वह रूसी तेल की खरीद रोकने जा रहा है। पेसकोव ने जोर देकर कहा कि रूस भारत के साथ अपने 'विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी' (Privileged Strategic Partnership) वाले रिश्तों को बेहद अहम मानता है और उन्हें आगे भी और मजबूत करना चाहता है। रूस का यह बयान ट्रंप के उस नरेटिव को चुनौती देता है जिसमें उन्होंने भारत को रूस से दूर करने का श्रेय लेने की कोशिश की थी।
विवाद की जड़ ट्रंप का वह बयान है जो उन्होंने टैरिफ कटौती की घोषणा के साथ दिया था। ट्रंप ने कहा था कि अमेरिका और भारत के बीच एक नया व्यापार समझौता हुआ है, जिसके तहत भारतीय निर्यात पर लगने वाला टैरिफ 50% से घटाकर 18% कर दिया जाएगा। लेकिन इस 'रियायत' के बदले उन्होंने एक बड़ी शर्त का जिक्र किया—भारत को रूस से तेल खरीदना बंद करना होगा और अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए अमेरिका पर निर्भर होना होगा। ट्रंप ने तर्क दिया था कि भारत के रूसी तेल खरीदने से यूक्रेन युद्ध में रूस को अप्रत्यक्ष रूप से मदद मिल रही है और वे इस 'फंडिंग लाइन' को काटना चाहते हैं।
इस दावे पर प्रतिक्रिया देते हुए क्रेमलिन के प्रवक्ता पेसकोव ने कूटनीतिक संयम का परिचय दिया। उन्होंने कहा कि रूस भारत के साथ संबंधों पर ट्रंप की टिप्पणियों का बहुत ध्यान से और बारीकी से विश्लेषण कर रहा है। जब पत्रकारों ने उनसे सीधे पूछा कि क्या भारत ने रूसी तेल खरीदना बंद करने का फैसला किया है, तो उन्होंने स्पष्ट किया कि अब तक तो हमने भारत की ओर से रूस से तेल खरीद रोकने को लेकर कोई आधिकारिक बयान नहीं सुना है। पेसकोव ने कहा कि हम द्विपक्षीय अमेरिकी-भारतीय संबंधों का सम्मान करते हैं, क्योंकि हर देश को अपने हित साधने का अधिकार है। लेकिन साथ ही, हम रूस और भारत के बीच एक उन्नत रणनीतिक साझेदारी के विकास को भी उतना ही महत्व देते हैं। भारत के साथ हमारे रिश्ते हमारे लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं और हम उन्हें भविष्य में भी विकसित करना चाहते हैं।
यह मामला इतना सीधा नहीं है जितना दिखता है। यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद, यानी 2022 से, भारत ने पश्चिमी देशों के भारी दबाव और प्रतिबंधों को दरकिनार करते हुए रूस से रियायती दरों पर कच्चे तेल की रिकॉर्ड खरीद की है। भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देते हुए रूस का सबसे बड़ा तेल खरीदार बनकर उभरा है। इस कदम ने न केवल भारत को महंगाई से बचाया, बल्कि रूस की अर्थव्यवस्था को भी सहारा दिया। अमेरिका और यूरोप ने इस पर कई बार नाराजगी जताई है और रूस की ऊर्जा आय को सीमित करने के लिए 'प्राइस कैप' (Price Cap) जैसे प्रतिबंध भी लगाए हैं। लेकिन भारत ने अपनी स्वतंत्र विदेश नीति पर कायम रहते हुए 'मल्टी-अलाइनमेंट' का रास्ता चुना है।
अब तस्वीर थोड़ी धुंधली हो गई है। एक तरफ दुनिया के सबसे ताकतवर नेता का दावा है कि भारत झुक गया है, तो दूसरी तरफ रूस का कहना है कि उसे इसकी कोई खबर नहीं है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत सरकार की ओर से अब तक इस विशिष्ट मुद्दे (तेल खरीद रोकने) पर कोई औपचारिक प्रतिक्रिया या पुष्टि नहीं आई है। विदेश मंत्रालय ने टैरिफ डील का स्वागत तो किया है, लेकिन तेल वाली शर्त पर चुप्पी साधे रखी है।
हमारी राय (The Trending People Analysis)
डोनाल्ड ट्रंप का बयान उनकी 'लेन-देन' (Transactional) वाली राजनीति का हिस्सा हो सकता है, जहां वे घरेलू दर्शकों को यह दिखाना चाहते हैं कि उन्होंने रूस को आर्थिक चोट पहुंचाई है। लेकिन रूस की प्रतिक्रिया यह बताती है कि भारत और रूस के रिश्ते इतने कच्चे धागे से नहीं बंधे हैं कि एक डील से टूट जाएं।
The Trending People का विश्लेषण है कि भारत के लिए रूसी तेल छोड़ना आसान नहीं होगा। अमेरिका से तेल खरीदना महंगा सौदा हो सकता है, जो भारत के चालू खाता घाटे को बढ़ाएगा। संभव है कि भारत ने 'धीरे-धीरे कम करने' का वादा किया हो, जिसे ट्रंप ने 'बंद करने' के रूप में पेश कर दिया। सच्चाई जो भी हो, भारत को जल्द ही अपनी स्थिति स्पष्ट करनी होगी क्योंकि मास्को और वाशिंगटन दोनों को एक साथ खुश रखना कूटनीति की सबसे कठिन परीक्षा है। यह तेल, व्यापार और भू-राजनीति का एक ऐसा त्रिकोण है जिसमें संतुलन बनाना 2026 की सबसे बड़ी चुनौती होगी।
