'बॉर्डर 2'—तकनीक नई, जज्बा पुराना; सनी देओल की दहाड़ तो है, पर क्या 'मिट्टी की वो खुशबू' लौट पाई? पढ़ें विस्तृत समीक्षा
नई दिल्ली/मुंबई, दिनांक: 23 जनवरी 2026 — भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ फिल्में केवल रील पर नहीं, बल्कि लोगों के दिलों पर अपनी अमिट छाप छोड़ जाती हैं। साल 1997 में जब जेपी दत्ता ने ‘बॉर्डर’ बनाई थी, तो वह सिर्फ एक फिल्म नहीं थी, वह एक सामूहिक अहसास था। लोंगेवाला की उस महान लड़ाई को जब बड़े पर्दे पर सनी देओल ने जिया, तो थिएटर में बैठा हर भारतीय गर्व से भर उठा था। उस फिल्म की सबसे बड़ी खूबी उसकी 'ऑरिजनलिटी' और 'सादगी' थी। अब ठीक 29 साल बाद, उसी गौरवशाली विरासत का अगला अध्याय ‘बॉर्डर 2’ (Border 2) के रूप में आज यानी 23 जनवरी 2026 को सिनेमाघरों में उतर चुका है। भूषण कुमार, जेपी दत्ता और उनकी बेटी निधि दत्ता के निर्माण में बनी इस फिल्म का निर्देशन अनुराग सिंह ने किया है। फिल्म को लेकर उम्मीदें हिमालय जैसी ऊंची थीं, लेकिन क्या यह फिल्म उन उम्मीदों पर खरी उतरी? क्या सनी देओल की दहाड़ एक बार फिर वही जादू पैदा कर पाई? आइए विस्तार से जानते हैं।
इसमें कोई दोराय नहीं कि फिल्म में आपको आज भी वही पुराना ‘बॉर्डर’ वाला फ्लेवर महसूस होगा। फिल्म के इमोशन्स इतने गहरे हैं कि कई दृश्यों में आपकी आंखें नम होना तय है। हालांकि, तकनीकी भव्यता के बावजूद फिल्म में जिस चीज की सबसे ज्यादा खली, वह है इसका 'ओरिजिनल टेस्ट'। 1997 की ‘बॉर्डर’ में जो मिट्टी की सोंधी खुशबू और सादगी थी, उसके मुकाबले ‘बॉर्डर 2’ का स्वाद थोड़ा कमतर और ज्यादा 'फिल्मी' महसूस होता है। यह सच है कि ‘बॉर्डर’ जैसी कल्ट क्लासिक का सीक्वल तैयार करना मेकर्स के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं था, और काफी हद तक वे इसमें कामयाब भी रहे हैं। चाहे वह देशभक्ति का जज्बा हो या फिर रूह को छू लेने वाला संगीत, फिल्म के हर विभाग में मेहनत साफ झलकती है।
‘बॉर्डर 2’ की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह पहली फिल्म का रीमेक या सीधा सीक्वल नहीं है, बल्कि यह एक बिल्कुल नई कहानी पेश करती है। फिल्म 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध की एक ऐसी सच्ची घटना पर आधारित है, जहां भारतीय सशस्त्र बल, वायु सेना और नौसेना ने मिलकर एक ऐतिहासिक संयुक्त अभियान को अंजाम दिया था। कहानी के केंद्र में हैं लेफ्टिनेंट कर्नल फतेह सिंह कलेर (सनी देओल), जो न केवल एक जांबाज फौजी हैं, बल्कि एक मार्गदर्शक भी हैं। वे सेना के तीनों अंगों के जवानों को एक विशेष मिशन के लिए तैयार करते हैं। इस टुकड़ी में मेजर होशियार सिंह दहिया (वरुण धवन), एयरफोर्स ऑफिसर निर्मल जीत सिंह (दिलजीत दोसांझ) और नेवी कमांडर एमएस रावत (अहान शेट्टी) शामिल हैं। फिल्म इन चारों की व्यक्तिगत कहानियों, उनके परिवारों के बलिदान और युद्ध के मैदान में उनके सामूहिक पराक्रम को बड़े पर्दे पर बखूबी उतारती है।
फिल्म की कास्टिंग को लेकर शुरुआत में काफी सवाल उठे थे, खासकर वरुण धवन को लेकर, लेकिन फिल्म देखने के बाद यह साफ हो जाता है कि वरुण ने अपने आलोचकों को बोलकर नहीं, बल्कि अपने अभिनय से जवाब दिया है। एक फौजी के अनुशासन और उसके भीतर के जज्बात को वरुण ने बहुत गहराई से जिया है। उन्होंने कहीं भी ओवरएक्टिंग नहीं की, जो उनकी सबसे बड़ी जीत है। सनी देओल एक बार फिर यह साबित करते हैं कि जब बात पर्दे पर गरजने की आती है, तो उनके जैसा कोई नहीं। उनकी स्क्रीन प्रेजेंस आज भी वही रोंगटे खड़े कर देने वाली ऊर्जा पैदा करती है जो 29 साल पहले ‘बॉर्डर’ में थी। फतेह सिंह कलेर के रूप में उनकी गंभीरता फिल्म की रीढ़ है। वहीं, दिलजीत दोसांझ ने अपनी मासूमियत और वीरता के मिश्रण से फिल्म में एक अलग चमक पैदा की है। उनकी डायलॉग डिलीवरी और युद्ध के दृश्यों में उनकी तीव्रता काबिले तारीफ है। अहान शेट्टी ने अपनी सीमित भूमिका में भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है और अपने पिता सुनील शेट्टी की विरासत को संभाला है।
निर्देशन के मोर्चे पर जेपी दत्ता की ‘बॉर्डर’ की तुलना से बचना मुश्किल था, लेकिन निर्देशक अनुराग सिंह ने अपनी एक अलग शैली अपनाई। जहां जेपी दत्ता का निर्देशन ‘रॉ और रियल’ था, वहीं अनुराग सिंह ने आधुनिक तकनीक और इमोशन्स का सहारा लिया है। उन्होंने युद्ध के दृश्यों को ‘लार्जर देन लाइफ’ बनाने की कोशिश की है। अनुराग ने तीनों सेनाओं के बीच के तालमेल को जिस तरह से पर्दे पर बुना है, वह उन्हें एक कुशल निर्देशक के रूप में स्थापित करता है। फिल्म की असली जान इसकी सिनेमैटोग्राफी है। रेतीले जमीन से लेकर समंदर की लहरों और आसमान की ऊंचाइयों तक, कैमरे का काम मंत्रमुग्ध कर देने वाला है। युद्ध के दृश्यों को फिल्माते समय जिस तरह के ‘वाइड एंगल्स’ का उपयोग किया गया है, वह आपको युद्ध के मैदान के बीच होने का अहसास कराता है।
संगीत की बात करें तो ‘बॉर्डर’ की सफलता का एक बड़ा हिस्सा ‘संदेसे आते हैं’ जैसे गीतों को जाता है। ‘बॉर्डर 2’ में भी संगीत पर कड़ी मेहनत की गई है। फिल्म के गाने इमोशनल मोमेंट्स पर आपकी आंखों में आंसू लाने की ताकत रखते हैं। बैकग्राउंड स्कोर काफी प्रभावशाली है, जो देशभक्ति के दृश्यों में जोश भर देता है। हालांकि, 1997 वाले उस ‘मैजिक’ को दोबारा पैदा करना लगभग नामुमकिन था, लेकिन मेकर्स ने एक ऐसा एंथम देने की कोशिश की है जो लंबे समय तक सुना जाएगा।
ईमानदारी से विश्लेषण करें तो ‘बॉर्डर 2’ एक शानदार फिल्म है, लेकिन यह 1997 वाली ‘बॉर्डर’ की जगह नहीं ले सकती। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह है ‘टेस्ट’। पुरानी बॉर्डर में एक किस्म की सादगी थी, जो आज के चकाचौंध वाले सिनेमा में कहीं खो गई है। 1997 वाली फिल्म में हर छोटे किरदार की एक रूह थी, जबकि ‘बॉर्डर 2’ तकनीकी रूप से मजबूत होने के बावजूद कहीं-कहीं थोड़ी ‘बनावटी’ लगने लगती है। फिल्म का पहला पार्ट काफी अच्छा है, जहां फिल्म की गति अपने रफ्तार से चलती है, लेकिन सेकेंड हाफ आते ही गति थोड़ी धीमी पड़ जाती है और कुछ वॉर सीन जबरन खींचे हुए लगते हैं।
बावजूद इसके, फिल्म का आखिरी हिस्सा दर्शकों के लिए किसी बड़े सरप्राइज से कम नहीं है। मेकर्स ने क्लाइमैक्स को इस तरह डिजाइन किया है कि उसे देखकर आप न केवल रोमांचित होंगे, बल्कि आपकी आंखें भी नम हो जाएंगी। फिल्म के अंत में एक ऐसा भावुक पल आता है, जो आपको सीधे 1997 की मूल ‘बॉर्डर’ की यादों में ले जाएगा। यह सरप्राइज पहली फिल्म के प्रति एक शानदार ट्रिब्यूट है।
हमारी राय (The Trending People Analysis)
‘बॉर्डर 2’ उन सभी के लिए मस्ट-वॉच है जो भारतीय सेना के शौर्य को बड़े पर्दे पर देखना पसंद करते हैं। यह फिल्म आपको गर्व महसूस कराएगी, आपको रुलाएगी और अंत में एक फौजी के प्रति आपके सम्मान को और बढ़ा देगी। यह 1997 वाली फिल्म जितनी महान शायद न हो, लेकिन यह आज के दौर की सबसे बेहतरीन वॉर-फिल्मों में से एक जरूर है।
The Trending People का विश्लेषण है कि सनी देओल और नई स्टारकास्ट ने अपनी पूरी ईमानदारी झोंक दी है। अगर आप तुलना के चश्मे को उतारकर देखेंगे, तो 'बॉर्डर 2' आपको निराश नहीं करेगी। बॉक्स ऑफिस पर यह फिल्म निश्चित रूप से धमाका करने वाली है, क्योंकि देशप्रेम का फ्लेवर कभी पुराना नहीं होता।
रेटिंग: ⭐⭐⭐ (3/5)
