धर्म डेस्क: महाकाल में परंपरा के संग होली का उल्लास मध्य प्रदेश के उज्जैन स्थित Mahakaleshwar Temple में मंगलवार को फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा के अवसर पर होली का पर्व पारंपरिक आस्था और उत्साह के साथ मनाया गया। तड़के सुबह 4 बजे हुई भस्म आरती में बाबा महाकाल के साथ पुजारी-पुरोहितों ने हर्बल गुलाल से होली खेली।
भक्तों की मौजूदगी में भगवान शिव के साथ माता पार्वती, भगवान गणेश और कार्तिकेय को भी गुलाल अर्पित किया गया। नंदी जी का विधिवत स्नान, ध्यान और पूजन संपन्न हुआ। मंदिर प्रशासन के अनुसार, पूरे आयोजन में प्राकृतिक रंगों का उपयोग किया गया और सुरक्षा व्यवस्था के विशेष इंतजाम किए गए थे।
भस्म आरती में विशेष अभिषेक और श्रृंगार
भस्म आरती के दौरान भगवान महाकाल का हरि ओम जल से अभिषेक किया गया। इसके बाद दूध, दही, घी, शक्कर, शहद और फलों के रस से बने पंचामृत से पूजन संपन्न हुआ।
भगवान को रजत शेषनाग मुकुट, रजत मुंडमाला, रुद्राक्ष माला और पुष्पहार से अलंकृत किया गया। भांग, फल और मिठाइयों का भोग अर्पित किया गया। आरती के दौरान श्रद्धालुओं पर भी गुलाल उड़ाकर उत्सव मनाया गया, जिससे मंदिर परिसर भक्तिमय और रंगमय वातावरण में सराबोर हो गया।
3 मार्च 2026: चंद्र ग्रहण पर भी खुले रहेंगे मंदिर के पट
इसी बीच 3 मार्च 2026 को पड़ रहे चंद्र ग्रहण को लेकर मंदिर की पूजा पद्धति में आंशिक बदलाव किया गया है। ग्रहण का समय शाम 6:32 से 6:46 बजे तक निर्धारित है, जबकि वेध काल सूर्योदय से प्रारंभ हो चुका है।
मंदिर प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि ग्रहण के दौरान मंदिर के पट बंद नहीं किए जाएंगे और श्रद्धालु दर्शन कर सकेंगे।
वेध काल में सुबह की दद्योदक एवं भोग आरती में केवल शक्कर का भोग अर्पित किया जाएगा। ग्रहण समाप्ति के बाद मंदिर का शुद्धिकरण, भगवान का पुनः स्नान और विधिवत पूजन किया जाएगा। इसके बाद नियमित भोग अर्पित कर संध्या आरती संपन्न होगी।
परंपरा और आस्था का अद्भुत संगम
महाकालेश्वर मंदिर में ग्रहण के दौरान भी पट खुले रहने की परंपरा विशेष मानी जाती है। धार्मिक मान्यता है कि महाकाल स्वयं काल के स्वामी हैं, इसलिए ग्रहण जैसी खगोलीय घटनाओं का उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
होली और चंद्र ग्रहण जैसे विशेष अवसरों पर महाकाल मंदिर में उमड़ने वाली श्रद्धालुओं की भीड़ उज्जैन की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को और मजबूत करती है।
3 मार्च 2026 को ग्रहण के अवसर पर भी मंदिर में विशेष आध्यात्मिक वातावरण देखने को मिलेगा, जहां आस्था और परंपरा का संगम एक बार फिर साक्षात होगा।