उज्ज्वला योजना पर 'महंगाई' की मार: मध्य पूर्व संकट के नाम पर सरकार ने चुपचाप घटाई सब्सिडी वाले सिलेंडरों की संख्या, अब साल में मिलेंगे सिर्फ 4 रिफिल
PTI via The Wire
नई दिल्ली (विशेष रिपोर्ट): देश की करोड़ों गरीब और मध्यम वर्गीय महिलाओं को धुएं से मुक्ति दिलाने के उद्देश्य से शुरू की गई 'प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना' (PMUY) को लेकर एक बेहद चौंकाने वाली खबर सामने आई है। पश्चिम एशिया (Middle East) में चल रहे भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक स्तर पर एलपीजी (LPG) आपूर्ति पर बढ़ते दबाव का हवाला देते हुए, केंद्र सरकार ने उज्ज्वला योजना के लाभार्थियों को एक बड़ा झटका दिया है।
अब इस योजना के तहत रियायती (सब्सिडी वाले) दामों पर मिलने वाले रसोई गैस सिलेंडरों की अधिकतम सीमा एक साल में नौ (9) से घटाकर मात्र चार (4) कर दी गई है। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि देश के करोड़ों परिवारों पर सीधा असर डालने वाले इतने बड़े फैसले की सरकार द्वारा कोई औपचारिक घोषणा नहीं की गई थी। यह फैसला कब से लागू हुआ, इसे लेकर भी स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।
कैसे हुआ इस 'चुपचाप' कटौती का खुलासा?
इस गुपचुप तरीके से की गई कटौती का खुलासा तब हुआ जब अंग्रेजी के प्रतिष्ठित समाचार पत्र 'द हिंदू' (The Hindu) ने अपनी एक विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की। रिपोर्ट के मुताबिक, घरेलू एलपीजी की कीमतों में हालिया बढ़ोतरी को लेकर रविवार (7 जून 2026) को जारी किए गए एक प्रेस बयान के दस्तावेजों में यह जानकारी दबी हुई थी।
द हिंदू की इस खोजी रिपोर्ट के बाद, 'अमर उजाला' और अन्य प्रमुख हिंदी समाचार पत्रों ने भी इस मुद्दे पर अपनी नजर दौड़ाई है। इन समाचार पत्रों के विश्लेषकों का मानना है कि चुनाव खत्म होने के बाद अक्सर इस तरह के कड़े आर्थिक फैसले लिए जाते हैं, लेकिन बिना पूर्व सूचना के सब्सिडी की सीमा आधी से भी कम कर देना ग्रामीण भारत के लिए एक बड़ा झटका है।
कीमतों में उछाल: 89 रुपये तक महंगा हुआ सिलेंडर
पश्चिम एशिया में संघर्ष शुरू होने के बाद से वैश्विक ऊर्जा बाजार में भारी उथल-पुथल मची हुई है। कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति बाधित होने से अंतरराष्ट्रीय कीमतें आसमान छू रही हैं। इसका सीधा असर भारतीय उपभोक्ताओं पर पड़ रहा है।
रविवार को सरकार ने प्रति सिलेंडर 29 रुपये की बढ़ोतरी का ऐलान किया। पश्चिम एशिया में तनाव शुरू होने के बाद से यह दूसरी बार है जब भारत में रसोई गैस के दाम बढ़ाए गए हैं। पहली और इस ताजा बढ़ोतरी को मिला दें, तो घरेलू एलपीजी सिलेंडर की कीमतें अब तक कुल 89 रुपये बढ़ चुकी हैं। वर्तमान में देश की राजधानी दिल्ली में 14.2 किलो वाले सामान्य घरेलू एलपीजी सिलेंडर की कीमत 942 रुपये पहुँच गई है। वहीं, उज्ज्वला योजना (PMUY) के लाभार्थियों को केंद्र सरकार की ओर से प्रति सिलेंडर 300 रुपये की अतिरिक्त डायरेक्ट सब्सिडी मिलती है। इस सब्सिडी के कटने के बाद, उन्हें एक रिफिल के लिए 642 रुपये चुकाने पड़ते हैं। लेकिन अब वे इस 300 रुपये की छूट का लाभ साल भर में केवल 4 सिलेंडरों पर ही उठा पाएंगे।
सरकार का पक्ष: "हम पहले से ही दे रहे हैं भारी अप्रत्यक्ष सब्सिडी"
जब इस अचानक की गई कटौती को लेकर सवाल उठे, तो केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्रालय ने इस कदम का बचाव किया। 'द हिंदू' की रिपोर्ट के अनुसार, केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव प्रवीण खानूजा ने सरकार का पक्ष रखते हुए अंतरराष्ट्रीय बाजार की मजबूरी का हवाला दिया।
खानूजा ने स्पष्ट करते हुए कहा, "चाहे मैं पीएमयूवाई (PMUY) का ग्राहक हूं या नहीं, मुझे एक सिलेंडर 942 रुपये में मिल रहा है। जबकि अगर हम मौजूदा अंतरराष्ट्रीय कीमतों के हिसाब से देखें, तो इसकी वास्तविक कीमत लगभग 1,600 रुपये होनी चाहिए थी। सरकार पहले से ही लगभग 650 रुपये का बोझ खुद उठा रही है, जो आम जनता के लिए एक तरह की अप्रत्यक्ष सब्सिडी है।"
उन्होंने उज्ज्वला लाभार्थियों का जिक्र करते हुए आगे कहा, "इसके अलावा पीएमयूवाई ग्राहकों को 300 रुपये और अलग से मिलते हैं, इसलिए तकनीकी रूप से उन्हें हर सिलेंडर पर लगभग 1,000 रुपये की भारी सब्सिडी मिल रही है। वैश्विक संकट के बीच अर्थव्यवस्था को संतुलित रखने के लिए यह कदम उठाना आवश्यक था।"
उज्ज्वला योजना: राजनीतिक गेमचेंजर से लेकर आज तक का सफर
गौरतलब है कि प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना की शुरुआत 1 मई 2016 को देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश के बलिया जिले से की गई थी। इस योजना को भारतीय जनता पार्टी (BJP) सरकार की सबसे सफल गरीब-कल्याणकारी योजनाओं में गिना जाता है। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि इस योजना का सीधा फायदा बीजेपी को 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में मिला था, जहांं पार्टी ने डेढ़ दशक बाद पूर्ण बहुमत की प्रचंड सरकार बनाई थी।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इस योजना के शुरू होने के बाद से मई 2026 के आखिर तक देशभर के गरीब घरों में लगभग 10.55 करोड़ एलपीजी कनेक्शन बांटे जा चुके हैं। लेकिन रिफिलिंग (दोबारा सिलेंडर भरवाने) की दर हमेशा से इस योजना की एक कमजोर कड़ी रही है।
विशेषज्ञों और आम लोगों की प्रतिक्रिया: "फिर जलेगा लकड़ी का चूल्हा"
आर्थिक और सामाजिक विशेषज्ञों ने सरकार के इस फैसले पर गहरी चिंता व्यक्त की है। ग्रामीण विकास पर काम करने वाले अर्थशास्त्रियों का मानना है कि 9 से घटाकर 4 सिलेंडर करने का सीधा मतलब यह है कि एक गरीब परिवार को साल के 8 महीने बिना सब्सिडी वाला महंगा सिलेंडर (942 रुपये) खरीदना पड़ेगा।
बढ़ती महंगाई के बीच दिहाड़ी मजदूरों और गरीब परिवारों के लिए लगभग हजार रुपये का गैस सिलेंडर खरीदना बहुत मुश्किल है। विशेषज्ञों को डर है कि इस फैसले से ग्रामीण महिलाएं एक बार फिर लकड़ी, उपले और कोयले वाले पारंपरिक चूल्हों की तरफ लौटने को मजबूर हो जाएंगी, जो उनके स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों के लिए बेहद हानिकारक है। विपक्षी दलों ने भी इस मुद्दे पर सरकार को घेरना शुरू कर दिया है और इसे "गरीबों के पेट पर लात मारने वाला फैसला" करार दिया है।
हमारी राय में
hindi.thetrendingpeople.com के संपादकीय डेस्क की स्पष्ट राय में, पश्चिम एशिया के संकट और वैश्विक अर्थव्यवस्था के दबाव से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन इसका सारा बोझ देश के सबसे गरीब और वंचित वर्ग पर डालना कतई उचित नहीं है। उज्ज्वला योजना केवल एक 'ईंधन योजना' नहीं थी, यह महिलाओं के स्वास्थ्य और सशक्तिकरण से जुड़ा एक क्रांतिकारी कदम था। बिना किसी औपचारिक घोषणा के चुपचाप सब्सिडी वाले सिलेंडरों की संख्या 9 से 4 कर देना, पारदर्शिता के सरकारी दावों पर भी सवाल खड़े करता है। पेट्रोलियम मंत्रालय की "1600 रुपये की अंतरराष्ट्रीय कीमत" वाली दलील तकनीकी रूप से सही हो सकती है, लेकिन एक गरीब महिला की रसोई का बजट अंतरराष्ट्रीय आंकड़ों से नहीं, बल्कि उसकी रोज की दिहाड़ी से चलता है। सरकार को इस फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए, अन्यथा ग्रामीण भारत की रसोईयां एक बार फिर उस दमघोंटू धुएं से भर जाएंगी, जिससे निकालने का वादा खुद इस सरकार ने किया था।
