UN की रिपोर्ट में इजरायल पर 'नरसंहार' का सीधा आरोप: "गाजा की नस्ल खत्म करने के लिए जानबूझकर बच्चों को मार रही इजरायली सेना"
PTI via The Wire
नई दिल्ली (अंतरराष्ट्रीय डेस्क विशेष): पश्चिम एशिया में शांति की सभी उम्मीदों को दरकिनार करते हुए, गाजा पट्टी (Gaza Strip) में चल रहे भीषण मानवीय संकट पर संयुक्त राष्ट्र (UN) की एक नई और बेहद परेशान करने वाली रिपोर्ट सामने आई है। इस रिपोर्ट ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में भूचाल ला दिया है। संयुक्त राष्ट्र के एक स्वतंत्र जांच आयोग ने इजरायल (Israel) पर सीधे तौर पर 'नरसंहार' (Genocide) और 'मानवता के खिलाफ अपराध' (Crimes Against Humanity) के गंभीर आरोप लगाए हैं।
सबसे दर्दनाक पहलू यह है कि रिपोर्ट के अनुसार, इजरायल अपनी कथित नरसंहार की मंशा को पूरा करने के लिए 'जानबूझकर और एक सुनियोजित रणनीति के तहत' गाजा के फिलिस्तीनी बच्चों (Palestinian Children) को निशाना बना रहा है।
"बचपन का मूल तत्व नष्ट हो गया है" - UN जांच आयोग की रिपोर्ट
संयुक्त राष्ट्र के ‘ऑक्यूपाइड फिलिस्तीनी टेरिटरी’ (Occupied Palestinian Territory) और इजरायल पर बने स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय जांच आयोग ने मंगलवार (23 जून 2026) को 94 पन्नों की अपनी एक विस्तृत रिपोर्ट जारी की। इस रिपोर्ट का शीर्षक है— 'बचपन का मूल तत्व नष्ट हो गया है' (The essence of childhood has been destroyed)। इसमें 7 अक्टूबर 2023 से 31 मार्च 2026 के बीच गाजा में फिलिस्तीनी बच्चों के खिलाफ हुए अमानवीय उल्लंघनों की गहरी जांच की गई है।
रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि आयोग को यह मानने के पर्याप्त और ठोस आधार मिले हैं कि “इजरायली सुरक्षा बलों ने बच्चों को निशाना बनाते हुए जानबूझकर घातक बल का प्रयोग किया है। यह अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून और मानवीय कानून का सीधा उल्लंघन है।” आयोग ने इसे 'जानबूझकर हत्या के युद्ध अपराध' (War Crimes of Wilful Killing) की श्रेणी में रखा है।
20 हजार से ज्यादा बच्चों की मौत, 21 हजार अपाहिज
इस रिपोर्ट में दिए गए मौत के आंकड़े किसी भी सभ्य समाज की रूह कंपाने के लिए काफी हैं। युद्ध के शुरुआती दो सालों (अक्टूबर 2023 से अक्टूबर 2025 तक) में गाजा में कम से कम 20,179 बच्चे मारे गए और 44,143 घायल हुए। यह कुल मौतों का लगभग 30% यानी एक-तिहाई हिस्सा है।
आयोग का यह भी दावा है कि वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है, क्योंकि हजारों मासूमों के शव अब भी गाजा के मलबे के नीचे दबे हुए हैं। सबसे भयावह आंकड़ा 5 साल से कम उम्र के बच्चों का है। इस अवधि में कम से कम 5,031 छोटे बच्चे मारे गए, जिनमें 1,000 से ज्यादा शिशु (Infants) और 420 नवजात बच्चे शामिल थे।
इसके अलावा, स्नाइपर फायर, ड्रोन हमलों और भारी गोलाबारी के चलते 21,000 से ज्यादा बच्चे हमेशा के लिए शारीरिक रूप से अक्षम (Disabled) हो गए हैं, जिससे गाजा दुनिया में अंग गंवाने वाले बच्चों की सबसे बड़ी आबादी वाला क्षेत्र बन गया है।
क्या यह गाजा से फिलिस्तीनियों को खत्म करने की साजिश है?
आयोग के अध्यक्ष श्रीनिवासन मुरलीधर (Srinivasan Muralidhar) ने रिपोर्ट जारी करते हुए कहा, "सबूत बताते हैं कि इजरायली सुरक्षा बलों ने फिलिस्तीनी बच्चों को जानबूझकर निशाना बनाया और मारा है।"
रिपोर्ट एक बेहद खतरनाक 'स्पष्ट पैटर्न' की ओर इशारा करती है। जांचकर्ताओं का तर्क है कि बच्चों को निशाना बनाना केवल युद्ध का 'कोलैटरल डैमेज' (संपार्श्विक क्षति) नहीं है, बल्कि यह गाजा में फिलिस्तीनी समुदाय की 'जैविक निरंतरता' (Biological Continuity) और उनके भविष्य के अस्तित्व को नष्ट करने की एक सोची-समझी रणनीति है।
रिपोर्ट कहती है, "बच्चे केवल आबादी का हिस्सा नहीं हैं; उनका अस्तित्व फिलिस्तीनी समुदाय की निरंतरता के लिए जरूरी है। बच्चों को मारना इजरायली अधिकारियों की नरसंहारकारी मंशा (Genocidal Intent) को साबित करने के लिए अहम है।"
'सैंडबॉक्स' से लेकर जेल तक: बच्चों पर यौन और मानसिक क्रूरता
रिपोर्ट का एक बड़ा हिस्सा इजरायली हिरासत केंद्रों (Detention Centers) में बंद फिलिस्तीनी बच्चों की दुर्दशा पर भी केंद्रित है। जांचकर्ताओं ने बच्चों के साथ गंभीर दुर्व्यवहार के एक पैटर्न का दस्तावेजीकरण किया है।
इसमें बच्चों को जबरन कपड़े उतरवाना, उन्हें वयस्कों के साथ जेल में रखना, लंबे समय तक आंखों पर पट्टी बांधकर रखना, नींद से वंचित करना और भोजन-पानी न देना शामिल है। सबसे संगीन आरोप बच्चों के खिलाफ यौन और लैंगिक आधारित हिंसा (Sexual Violence) का है, जिसे आयोग ने सीधे तौर पर 'युद्ध अपराध' माना है।
इसके अलावा, अक्टूबर 2025 में हुए युद्धविराम (Ceasefire) के बाद भी बच्चों की मौतें नहीं रुकीं। रिपोर्ट के अनुसार, युद्धविराम के बाद 100 से अधिक बच्चे मारे गए, जिनमें से कई की जान 'येलो लाइन' (मिलिट्री डिमार्केशन जोन) पार करने पर स्नाइपर की गोलियों से गई।
इजरायल का कड़ा पलटवार: "यह एक अपमानजनक प्रोपेगैंडा है"
संयुक्त राष्ट्र के इन अति-गंभीर निष्कर्षों पर इजरायल ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र में इजरायल के स्थायी मिशन ने इस पूरी रिपोर्ट को सिरे से खारिज करते हुए इसे 'एक अपमानजनक प्रोपेगैंडा' (Outrageous Propaganda) करार दिया है।
इजरायल ने आयोग पर निशाना साधते हुए कहा, "यह बुनियादी तौर पर एक दोषपूर्ण तंत्र है जिसका एकमात्र मकसद सच का पता लगाने के बजाय इजरायल को अंतरराष्ट्रीय मंच पर अलग-थलग करना और बदनाम करना है।"
इजरायली मिशन ने संयुक्त राष्ट्र पर पक्षपात का आरोप लगाते हुए कहा कि इस रिपोर्ट में 7 अक्टूबर के हमले के दौरान हमास (Hamas) द्वारा बेरहमी से मारे गए, अपहरण किए गए और निशाना बनाए गए इजरायली बच्चों को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया गया है। साथ ही, इजरायल ने यह भी तर्क दिया कि आयोग ने इस जमीनी हकीकत को भी अनदेखा किया है कि हमास गाजा के स्कूलों और अस्पतालों में छिपकर मासूम फिलिस्तीनी बच्चों का 'मानव ढाल' (Human Shields) के रूप में इस्तेमाल करता है।
वैश्विक मीडिया की नजर और आगे का रास्ता
'अमर उजाला' और अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसियों की रिपोर्टिंग के अनुसार, संयुक्त राष्ट्र की इस रिपोर्ट ने अमेरिका और इजरायल के अन्य सहयोगी देशों पर भारी दबाव डाल दिया है। आयोग ने दुनिया के देशों से साफ शब्दों में आग्रह किया है कि वे इजरायल को हथियारों की सप्लाई तुरंत रोकें और अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) के जरिए युद्ध अपराधों की जवाबदेही तय करें।
हमारी राय में
hindi.thetrendingpeople.com के अंतरराष्ट्रीय संपादकीय डेस्क की राय में, संयुक्त राष्ट्र की यह रिपोर्ट गाजा युद्ध के अब तक के इतिहास का सबसे काला पन्ना है। युद्ध में सैनिकों का मरना एक दुखद वास्तविकता है, लेकिन जब युद्ध का उद्देश्य ही किसी समुदाय के 'भविष्य' (बच्चों) को खत्म करना बन जाए, तो वह युद्ध नहीं, बल्कि सभ्यता का पतन कहलाता है। 20,000 बच्चों की मौत और 21,000 बच्चों का अपाहिज होना केवल आंकड़े नहीं हैं, ये वो चीखें हैं जिन्हें दुनिया की राजनीति अनसुना कर रही है। इजरायल का यह तर्क कि हमास बच्चों को ढाल बनाता है, किसी भी लोकतांत्रिक देश को यह लाइसेंस नहीं देता कि वह ढाल को ही छलनी कर दे। दूसरी ओर, अंतरराष्ट्रीय समुदाय (विशेषकर अमेरिका) का दोहरा रवैया भी इस नरसंहार को ऑक्सीजन दे रहा है। जब तक अंतरराष्ट्रीय कानून सभी देशों पर समान रूप से लागू नहीं होंगे और हथियारों की आपूर्ति पर रोक नहीं लगेगी, तब तक गाजा के मलबे से बच्चों के शव निकलते रहेंगे। जैसा कि आयोग ने कहा, "भले ही कल गाजा में बंदूकें शांत हो जाएं, लेकिन उन बच्चों का बचपन अब कभी नहीं लौटेगा।"
