Madman Diplomacy Explained: ट्रंप की धमकियों से क्यों कांपती रही दुनिया, और कैसे यह रणनीति अपने ही जनक को नुकसान पहुंचाती है
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की विदेश नीति एक लंबे समय से वैश्विक राजनीति में बहस का विषय रही है। कभी अचानक परमाणु हमले की धमकी, कभी सहयोगी देशों पर टैरिफ की तलवार, तो कभी अगले ही दिन यू-टर्न। ट्रंप की भाषा अक्सर आक्रामक, असंवेदनशील और बुली करने वाली रही है। यही कारण है कि मित्र देश तक असहज हो गए और विरोधी देश भ्रम में पड़े रहे।
अंतरराष्ट्रीय संबंधों की भाषा में इस तरह की रणनीति को “मैडमैन डिप्लोमेसी” कहा जाता है। यह कोई गाली नहीं, बल्कि एक सोची-समझी, लेकिन बेहद जोखिम भरी कूटनीतिक रणनीति है, जिसने इतिहास में कई बार दुनिया को युद्ध के मुहाने तक पहुंचाया है।
मैडमैन डिप्लोमेसी क्या होती है?
मैडमैन डिप्लोमेसी का मूल सिद्धांत बेहद सरल लेकिन खतरनाक है। इसमें नेता अपने विरोधियों को यह यकीन दिलाने की कोशिश करता है कि वह पूरी तरह अनिश्चित, आवेगी और किसी भी हद तक जाने वाला व्यक्ति है। यहां तक कि अगर उकसाया गया तो वह आत्मघाती या परमाणु स्तर तक का कदम भी उठा सकता है।
इस रणनीति का मकसद डर पैदा करना होता है, ताकि सामने वाला बिना लड़े ही झुक जाए। इसमें नेता जानबूझकर खुद को अस्थिर, नियम तोड़ने वाला और अप्रत्याशित दिखाता है। समस्या तब शुरू होती है जब यह “अभिनय” धीरे-धीरे भरोसे को खत्म करने लगता है।
इस कूटनीति की शुरुआत कब और किसने की?
मैडमैन डिप्लोमेसी की जड़ें 1969 में वियतनाम युद्ध के दौर में मिलती हैं। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने इसे रणनीतिक रूप से अपनाया था। उनका उद्देश्य उत्तर वियतनाम को यह भ्रम देना था कि अमेरिका किसी भी वक्त परमाणु हमला कर सकता है।
निक्सन ने अपने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हेनरी किसिंजर को निर्देश दिया था कि दुश्मन को यह संदेश जाए कि “निक्सन अनप्रेडिक्टेबल हैं।” इसी सोच के तहत परमाणु हथियारों से लैस B-52 बॉम्बर्स को उड़ाया गया, ताकि सोवियत संघ और उत्तर वियतनाम तक डर का संदेश पहुंचे।
इस रणनीति को बाद में निक्सन के सहयोगियों ने “मैडमैन थ्योरी” नाम दिया।
ट्रंप ने इसे कैसे अपनाया?
डोनाल्ड ट्रंप ने मैडमैन डिप्लोमेसी को किसी थ्योरी की तरह नहीं, बल्कि एक परफॉर्मेंस की तरह अपनाया।
नॉर्थ कोरिया को खुली परमाणु धमकी, नाटो को चेतावनी कि अमेरिका सुरक्षा गारंटी छोड़ सकता है, चीन पर अचानक भारी टैरिफ, और ईरान के जनरल क़ासिम सुलेमानी की अचानक हत्या—ये सभी कदम इसी रणनीति के उदाहरण माने जाते हैं।
ट्रंप खुद कई बार कह चुके हैं कि “अनपेक्षित होना मेरी सबसे बड़ी ताकत है।” लेकिन यही अनपेक्षित व्यवहार धीरे-धीरे अमेरिका के पारंपरिक सहयोगियों के लिए चिंता का कारण बन गया।
मैडमैन डिप्लोमेसी के नतीजे: कहां काम आई, कहां फेल हुई
कुछ मामलों में यह रणनीति सफल भी रही।
नॉर्थ कोरिया के मामले में इस आक्रामक रुख ने किम जोंग-उन को बातचीत की मेज तक लाने में भूमिका निभाई। नाटो से अलग होने की धमकी के बाद कई यूरोपीय देशों ने रक्षा खर्च बढ़ाया।
लेकिन चीन पर टैरिफ का दबाव उल्टा पड़ गया। चीन झुका नहीं, बल्कि व्यापार युद्ध लंबा खिंच गया। ईरान के साथ परमाणु समझौता टूट गया और पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ा। ग्रीनलैंड को लेकर दिए गए बयानों ने यूरोप को नाराज़ कर दिया और अमेरिका पर भरोसा कमजोर हुआ।
किन नेताओं को मैडमैन रणनीति से जोड़ा जाता है?
इतिहास में कई नेताओं को इस रणनीति से जोड़ा गया है।
रिचर्ड निक्सन ने इसे योजनाबद्ध तरीके से अपनाया।
डोनाल्ड ट्रंप ने भाषणों, ट्वीट्स और सार्वजनिक धमकियों के जरिए इसे खुला मंच दिया।
किम जोंग-उन मिसाइल परीक्षणों और अजीब बयानों से अनिश्चितता बनाए रखते हैं।
सद्दाम हुसैन और मुअम्मर गद्दाफी की सनकी छवि आखिरकार उनके खिलाफ ही गई।
कुछ हद तक व्लादिमीर पुतिन को भी इससे जोड़ा जाता है, हालांकि उनके कदम बेहद गणनात्मक माने जाते हैं।
निक्सन और ट्रंप की मैडमैन डिप्लोमेसी में फर्क
निक्सन ने इस रणनीति को पर्दे के पीछे खेला।
ट्रंप ने इसे टीवी रियलिटी शो बना दिया।
निक्सन की रणनीति सीमित और नियंत्रित थी, जबकि ट्रंप का व्यवहार सार्वजनिक और लगातार रहा। यही वजह है कि ट्रंप के मामले में सहयोगी देशों ने उन पर भरोसा करना धीरे-धीरे छोड़ दिया।
व्यक्तिगत जीवन में ट्रंप और निक्सन कितने अलग थे
डोनाल्ड ट्रंप सार्वजनिक और निजी जीवन में लगभग एक जैसे रहे। वे हमेशा परफॉर्मर रहे, नियमों से चिढ़ते हैं, आलोचना से ज्यादा प्रभावित नहीं होते और खुद को हमेशा विजेता के रूप में पेश करते हैं।
इसके उलट रिचर्ड निक्सन बेहद अंतर्मुखी, संदेहग्रस्त और भावनात्मक रूप से असुरक्षित व्यक्ति थे। वे घंटों फाइलें पढ़ते, विदेश नीति में माइक्रो-मैनेजमेंट करते और निजी जीवन में तनाव व भय से जूझते रहते थे।
हमारी राय (The Trending People Analysis)
मैडमैन डिप्लोमेसी अल्पकालिक डर तो पैदा कर सकती है, लेकिन यह स्थायी समाधान नहीं देती। इतिहास गवाह है कि यह रणनीति अंततः अपने ही जनक को नुकसान पहुंचाती है। निक्सन के साथ यही हुआ और ट्रंप के मामले में भी यही संकेत मिले।
जब सहयोगी देश भरोसा खो देते हैं और विरोधी आपको गंभीरता से लेना छोड़ देते हैं, तब यह रणनीति अपनी धार खो देती है। आज की वैश्विक राजनीति में स्थिरता, भरोसा और संवाद की अहमियत डर और धमकी से कहीं ज्यादा है।

