भारतीय रुपया में गुरुवार को लगातार चौथे दिन गिरावट दर्ज की गई और यह 32 पैसे टूटकर 94.10 प्रति डॉलर पर पहुंच गया। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया एक महीने में दूसरी बार 94 के स्तर के नीचे आया है, जिससे बाजार में चिंता बढ़ गई है।
अंतरबैंक विदेशी मुद्रा बाजार में रुपया 94.03 पर खुला और कारोबार के दौरान 94.17 के निचले स्तर तक फिसल गया। हालांकि दिन में यह 93.98 तक संभला, लेकिन अंत में 94.10 पर बंद हुआ। इससे पहले बुधवार को भी रुपया 34 पैसे गिरकर 93.78 पर बंद हुआ था। पिछले चार सत्रों में रुपया करीब 120 पैसे यानी लगभग 1.3 प्रतिशत टूट चुका है।
बाजार विशेषज्ञों के मुताबिक, इस गिरावट के पीछे कई वैश्विक और घरेलू कारण हैं। पश्चिम एशिया में जारी तनाव और शांति वार्ता में ठहराव के कारण कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई है, जिसका सीधा असर रुपये पर पड़ा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमत 1.88 प्रतिशत बढ़कर 103.83 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई।
इसके अलावा, घरेलू शेयर बाजारों में कमजोरी और विदेशी निवेशकों की बिकवाली भी रुपये पर दबाव बना रही है। बाजार आंकड़ों के अनुसार, विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) ने बुधवार को 2,078 करोड़ रुपये के शेयर बेचे, जिससे पूंजी निकासी बढ़ी।
मिराए एसेट शेयरखान के विश्लेषक अनुज चौधरी का कहना है कि डॉलर की मजबूती और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के चलते रुपये में दबाव बना हुआ है। उनका अनुमान है कि निकट भविष्य में डॉलर-रुपया विनिमय दर 93.80 से 94.50 के बीच रह सकती है।
गौरतलब है कि 23 मार्च को रुपया पहली बार 94 के स्तर से नीचे पहुंचा था और 30 मार्च को यह 95.22 के रिकॉर्ड निचले स्तर तक गिर गया था। मौजूदा हालात बताते हैं कि वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच रुपये पर दबाव फिलहाल जारी रह सकता है।
हमारी राय में
रुपये की लगातार गिरावट यह संकेत देती है कि वैश्विक आर्थिक हालात का सीधा असर भारत की मुद्रा पर पड़ रहा है। कच्चे तेल की कीमतों और विदेशी निवेश के रुख पर नजर बनाए रखना आने वाले समय में बेहद जरूरी होगा।
