यह 'मोदी सिद्धांत' की जीत है"—एमजे अकबर का बड़ा दावा, भारत-EU समझौते ने तोड़ा अमेरिका का घमंड, 50% टैरिफ का दबाव हुआ फेल
नई दिल्ली/वाशिंगटन, दिनांक: 4 फरवरी 2026 — भारत और अमेरिका के बीच हाल ही में घोषित ऐतिहासिक व्यापार समझौते को लेकर कूटनीतिक हलकों में चर्चाओं का बाजार गर्म है। इस समझौते को केवल एक आर्थिक दस्तावेज के रूप में नहीं, बल्कि भारत की बदलती वैश्विक हैसियत और रणनीतिक स्वायत्तता की जीत के रूप में देखा जा रहा है। पूर्व विदेश राज्य मंत्री और वरिष्ठ पत्रकार एमजे अकबर (MJ Akbar) ने इस घटनाक्रम पर एक बेहद सटीक और गहरा विश्लेषण पेश किया है। उन्होंने दावा किया है कि भारत-अमेरिका व्यापार समझौता वास्तव में 27 जनवरी को घोषित भारत-यूरोपीय संघ (EU) व्यापार समझौते का 'पहला फल' है। अकबर ने यूरोपीय संघ के साथ हुई डील को 'मदर ऑफ ऑल ट्रेड डील्स' की संज्ञा देते हुए कहा कि इसी मास्टरस्ट्रोक ने वाशिंगटन को अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर कर दिया।
एमजे अकबर का मानना है कि वैश्विक कूटनीति में समय और विकल्पों का खेल सबसे अहम होता है। अमेरिका ने यह संदेश बहुत स्पष्ट रूप से समझ लिया कि भारत ने यूरोपीय संघ के साथ हुए व्यापक समझौते के माध्यम से अब अमेरिकी बाजार के अलावा एक और विशाल और मजबूत विकल्प तैयार कर लिया है। जब 2025 में अमेरिका ने भारत पर दबाव बनाने के लिए 50 प्रतिशत टैरिफ लगाने की धमकी दी थी, तो उसका उद्देश्य भारत को आर्थिक रूप से घेरना था। लेकिन भारत ने झुकने के बजाय यूरोप की ओर हाथ बढ़ाया। अकबर ने विश्लेषण करते हुए कहा कि अमेरिका की दबाव बनाने की कोशिश पूरी तरह विफल रही क्योंकि भारत के रत्न, आभूषण, समुद्री उत्पाद और वस्त्र—जो अमेरिका के लिए प्रमुख निर्यात थे—अब यूरोपीय बाजार में आसानी से और शुल्क-मुक्त निर्यात किए जा सकते हैं। इस वैकल्पिक मार्ग ने अमेरिका की सौदेबाजी की ताकत को काफी कम कर दिया।
अकबर ने इस पूरे घटनाक्रम को 'मोदी सिद्धांत' (Modi Doctrine) की एक महत्वपूर्ण जीत बताया है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति को परिभाषित करते हुए कहा कि पीएम मोदी 'सहयोगात्मक राष्ट्रवाद' (Collaborative Nationalism) में विश्वास करते हैं। यह एक ऐसा विचार है जिसमें 'इंडिया फर्स्ट' की नीति सर्वोपरि है, लेकिन इसमें दुनिया के साथ सहयोग के दरवाजे भी खुले रहते हैं। अकबर का मानना है कि यदि दुनिया भारत के साथ सहयोग को अपने लिए लाभदायक समझेगी, तो संबंध हमेशा मजबूत और स्थिर बने रहेंगे। अमेरिका ने अंततः भारत की आत्मसम्मान और सम्मान के प्रति अटूट प्रतिबद्धता की ताकत को देख लिया है। उन्होंने दिल्ली के कुछ आलोचकों पर भी निशाना साधा जो सरकार की सख्त विदेश नीति पर सवाल उठा रहे थे। अकबर ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी ने किसी भी कीमत पर, चाहे वह टैरिफ का डर हो या प्रतिबंधों का, भारत की स्वायत्तता और आत्म-सम्मान से समझौता नहीं किया।
यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार को भारत के साथ व्यापार समझौते की औपचारिक घोषणा की है। ट्रंप ने अपनी चिर-परिचित शैली में कहा कि भारत ने रूस से तेल खरीदना बंद कर दिया है और अब वह अमेरिका से ऊर्जा, तकनीक और कृषि सहित कई क्षेत्रों में 500 अरब डॉलर से अधिक की खरीद करेगा। इस समझौते के तहत अमेरिकी टैरिफ को 25 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत कर दिया गया है, जो भारतीय निर्यातकों के लिए बड़ी राहत है। बदले में, भारत भी अमेरिकी उत्पादों पर टैरिफ और गैर-टैरिफ बाधाओं को 'शून्य' करने की दिशा में कदम बढ़ाएगा। यह 'लेन-देन' की कूटनीति दोनों देशों के लिए फायदे का सौदा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस समझौते की पुष्टि करते हुए कहा कि 'मेड इन इंडिया' उत्पादों पर 18 प्रतिशत टैरिफ लागू होगा। उन्होंने विश्वास जताया कि दो बड़े लोकतांत्रिक देशों के सहयोग से दोनों देशों के नागरिकों को लाभ मिलेगा और यह साझेदारी नए स्तर पर जाएगी।
एमजे अकबर का यह विश्लेषण इस बात को रेखांकित करता है कि भारत-अमेरिका समझौता शून्य में नहीं हुआ है। यह भारत-ईयू समझौते के तुरंत बाद आया है, जिसे 27 जनवरी को भारत और यूरोपीय संघ के नेताओं की मौजूदगी में औपचारिक रूप दिया गया था। दोनों पक्षों ने 2030 तक के व्यापक रणनीतिक एजेंडे पर भी सहमति व्यक्त की है। अकबर का कहना है कि इस नए समझौते से भारत और अमेरिका के संबंधों का भविष्य 'स्थिर' और 'समान स्तर' पर होगा। अब भारत एक याचक नहीं, बल्कि एक बराबर का भागीदार है जो अपनी शर्तों पर व्यापार करता है। यह साझेदारी की वास्तविक क्षमता को आगे बढ़ाएगा और दुनिया को यह संदेश देगा कि भारत को अब डराकर नहीं, बल्कि साथ लेकर ही चला जा सकता है।
मोबाइल उद्योग की प्रतिक्रिया: विनिर्माण के लिए 'बूस्टर डोज'
व्यापार समझौते के ऐलान के बाद भारतीय मोबाइल उद्योग ने भी राहत की सांस ली है। मोबाइल उद्योग के शीर्ष निकाय आइसीईए (ICEA) ने मंगलवार को कहा कि भारत से अमेरिका को होने वाले निर्यात पर तय की गई 18 प्रतिशत की शुल्क दर एक वैश्विक विनिर्माण और निर्यात केंद्र के रूप में भारत के आकर्षण को बनाए रखेगी। आइसीईए के चेयरमैन पंकज महेंद्रू ने एक बयान में इसे भारत के लिए एक सकारात्मक परिणाम बताया। उनका मानना है कि इस नई शुल्क दर के साथ भारत अपने प्रमुख विनिर्माण प्रतिस्पर्धियों के मुकाबले बेहतर स्थिति में है और एक ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में अपनी साख मजबूत कर रहा है। महेंद्रू ने कहा कि हालांकि वे सौदे के विस्तृत विवरण का इंतजार कर रहे हैं, लेकिन यह दिशा स्पष्ट रूप से विनिर्माण को बढ़ाने और अमेरिका के नेतृत्व वाली वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं, विशेष रूप से इलेक्ट्रॉनिक्स में गहराई से जुड़ने की भारत की रणनीति का समर्थन करती है।
सूत्रों के अनुसार, मोबाइल फोन और सेमीकंडक्टर सहित कई प्रमुख इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पाद इस नई व्यवस्था में भी शुल्क से मुक्त बने हुए हैं, जो इस सेक्टर के लिए बड़ी जीत है। भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर की वृद्धि दर प्रभावशाली रही है। वित्त वर्ष 2024-25 में भारत का इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन लगभग 19 प्रतिशत बढ़कर 11.3 लाख करोड़ रुपये हो गया, जबकि निर्यात 37.5 प्रतिशत की भारी उछाल के साथ 3.3 लाख करोड़ रुपये रहा। यह समझौता इस रफ्तार को और तेज करने में उत्प्रेरक का काम करेगा।
The Trending People Analysis
एमजे अकबर का विश्लेषण भारत की कूटनीतिक परिपक्वता की कहानी बयां करता है। एक समय था जब भारत टैरिफ की धमकियों से घबरा जाता था, लेकिन आज भारत ने विकल्पों (EU Deal) का इस्तेमाल कर महाशक्तियों को मेज पर आने के लिए मजबूर कर दिया है।
The Trending People का विश्लेषण है कि 'सहयोगात्मक राष्ट्रवाद' केवल एक शब्द नहीं, बल्कि भारत की नई पहचान है। अमेरिका का टैरिफ कम करना और भारत का रूस से तेल आयात घटाना (यदि सच है) एक रणनीतिक संतुलन है। यह दर्शाता है कि भारत अपने आर्थिक हितों के लिए किसी भी गुट के साथ जा सकता है, लेकिन अपनी संप्रभुता को गिरवी रखकर नहीं। यह डील 2026 की भू-राजनीति में भारत की धमक को और मजबूत करती है।
