पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और Iran द्वारा Strait of Hormuz को बंद करने की खबरों के बीच वैश्विक तेल बाजार में लगातार तीसरे कारोबारी सत्र में तेजी दर्ज की गई। मंगलवार सुबह एशियाई कारोबार में ब्रेंट क्रूड वायदा 1.4% यानी करीब 1.10 डॉलर बढ़कर 78.83 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया।
रॉयटर्स के मुताबिक, सोमवार को कारोबार के दौरान ब्रेंट 82.37 डॉलर तक उछला, जो जनवरी 2025 के बाद का उच्चतम स्तर है। दिन के अंत में कीमतें 6.7% की मजबूती के साथ बंद हुई थीं। ट्रेडिंग डेस्क से जुड़े एक विश्लेषक ने बताया कि बाजार में घबराहट साफ दिख रही है और निवेशक सप्लाई बाधित होने की आशंका को लेकर सतर्क हैं।
होर्मुज स्ट्रेट क्यों है बेहद अहम?
Strait of Hormuz दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री तेल मार्गों में गिना जाता है। वैश्विक कच्चे तेल की लगभग 20% आपूर्ति इसी रास्ते से गुजरती है।
खाड़ी क्षेत्र में तैनात एक शिपिंग एजेंसी के स्थानीय सूत्रों ने बताया कि कुछ टैंकरों ने वैकल्पिक मार्गों की तलाश शुरू कर दी है और बीमा प्रीमियम भी बढ़ाए जा रहे हैं। हालांकि ईरान की ओर से आधिकारिक तौर पर जलडमरूमध्य को पूरी तरह बंद करने की पुष्टि नहीं की गई है, लेकिन समुद्री निगरानी एजेंसियां स्थिति पर नजर रखे हुए हैं।
100 से 140 डॉलर तक पहुंच सकता है तेल?
ऊर्जा बाजार के विशेषज्ञों का मानना है कि यदि तनाव लंबा खिंचता है, तो ब्रेंट क्रूड 100 से 115 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकता है।
यदि प्रमुख समुद्री मार्गों में वास्तविक रुकावट आती है, तो कीमतें 120 से 140 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचने की आशंका जताई जा रही है।
तेल उत्पादक समूह OPEC के प्रमुख सदस्य सऊदी अरब और यूएई के पास 4-5 मिलियन बैरल प्रतिदिन अतिरिक्त उत्पादन क्षमता है। लेकिन यह आपूर्ति भी बड़े पैमाने पर होर्मुज मार्ग पर निर्भर करती है, जिससे राहत सीमित हो सकती है।
भारत पर संभावित असर
भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेजी से देश का आयात बिल बढ़ सकता है।
ऊर्जा मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने संकेत दिया है कि सरकार स्थिति पर नजर रखे हुए है और सामरिक भंडार का आकलन किया जा रहा है। यदि कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं, तो पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है, जिससे महंगाई में इजाफा होगा।
परिवहन लागत बढ़ने से खाद्य और उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतें भी प्रभावित हो सकती हैं।
पृष्ठभूमि: पहले भी झेल चुका है बाजार झटका
2019 में भी खाड़ी क्षेत्र में टैंकर हमलों के बाद तेल की कीमतों में तेज उछाल देखा गया था। इसी तरह 2022 में भू-राजनीतिक संकट के दौरान ब्रेंट क्रूड 120 डॉलर प्रति बैरल के पार चला गया था।
विश्लेषकों का कहना है कि मौजूदा हालात में बाजार बेहद संवेदनशील है और किसी भी सैन्य कार्रवाई या समुद्री अवरोध की खबर कीमतों को नई ऊंचाई पर पहुंचा सकती है।
संपादकीय विश्लेषण
पश्चिम एशिया की अनिश्चितता ने एक बार फिर साबित किया है कि वैश्विक ऊर्जा बाजार भू-राजनीतिक घटनाओं से गहराई से प्रभावित होता है। होर्मुज जलडमरूमध्य में संभावित अवरोध केवल क्षेत्रीय संकट नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक चुनौती बन सकता है।
भारत जैसे आयात-निर्भर देश के लिए यह स्थिति महंगाई, चालू खाता घाटा और राजकोषीय संतुलन पर दबाव बढ़ा सकती है। ऐसे समय में ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण और सामरिक भंडार को मजबूत करना दीर्घकालिक समाधान हो सकता है।
फिलहाल बाजार की नजरें पश्चिम एशिया की घटनाओं पर टिकी हैं, जो तय करेंगी कि तेल की रफ्तार कितनी तेज होगी।