सुप्रीम कोर्ट में सीजेआई की 'खरी-खरी'—"ट्रेड यूनियनों ने बंद कराए कारखाने, अब हर घर में मुकदमा चाहते हो क्या?", घरेलू कामगारों की याचिका पर सख्त टिप्पणी
नई दिल्ली, दिनांक: 29 जनवरी 2026 — देश की सर्वोच्च अदालत में गुरुवार को एक ऐसी सुनवाई हुई, जिसने श्रमिक अधिकारों और औद्योगिक विकास के बीच चल रही बहस को एक नई और तल्ख दिशा दे दी है। सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत ने ट्रेड यूनियनों की कार्यशैली पर कड़ा प्रहार करते हुए उन्हें देश में औद्योगिक विकास की रफ्तार रोकने और पारंपरिक उद्योगों के पतन के लिए काफी हद तक जिम्मेदार ठहराया है। घरेलू कामगारों (Domestic Workers) के लिए न्यूनतम वेतन और कड़े नियमों की मांग वाली एक याचिका पर सुनवाई करते हुए सीजेआई ने दो टूक कहा कि अगर सुधारों के नाम पर अत्यधिक सख्ती बरती गई, तो देश का हर घर मुकदमेबाजी का अखाड़ा बन जाएगा और गरीब कामगारों की रोजी-रोटी ही छिन जाएगी।
सीजेआई सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने सुनवाई के दौरान बेहद स्पष्ट और कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया। सीजेआई ने कहा कि देश के पारंपरिक उद्योगों के बंद होने के पीछे तथाकथित 'झंडे वाली यूनियनों' का बड़ा हाथ रहा है। उन्होंने सवाल उठाया कि यह सच्चाई सामने आनी चाहिए कि देश में कितनी औद्योगिक इकाइयां सिर्फ ट्रेड यूनियनों की हठधर्मिता और अड़ियल रवैये के कारण बंद हो गईं। उनका कहना था कि ये लोग खुद काम नहीं करना चाहते और दूसरों को भी रोकने की कोशिश करते हैं। ट्रेड यूनियन के नेता देश में औद्योगिक विकास रोकने के लिए काफी हद तक जिम्मेदार हैं, और उनकी वजह से नौकरियां पैदा होने के बजाय खत्म हो रही हैं।
याचिका, जो 'पेन थोजिलारगल संगम' और अन्य यूनियनों द्वारा दायर की गई थी, में मांग की गई थी कि घर में काम करने वाले नौकरों और मेड्स के लिए न्यूनतम वेतन (Minimum Wages) फिक्स किया जाए और उनके काम के घंटे तय किए जाएं। इस पर सीजेआई ने गहरी चिंता जताते हुए कहा कि अगर कोर्ट ने ऐसी मांगें मान लीं, तो हर घर में कानूनी लड़ाई शुरू हो जाएगी। उन्होंने अर्थशास्त्र का तर्क देते हुए कहा कि यदि न्यूनतम वेतन फिक्स कर दिया गया, तो डिमांड और सप्लाई का पूरा गणित बिगड़ जाएगा। लोग डर के मारे घर में काम करने के लिए नौकर रखना ही बंद कर देंगे। इसका सीधा और बुरा असर उन गरीब कामगारों पर पड़ेगा जिनके सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो जाएगा।
सुनवाई के दौरान जब सीनियर एडवोकेट राजू रामचंद्रन ने दलील दी कि कामगारों के शोषण को रोकने के लिए 'सामूहिक सौदेबाजी' (Collective Bargaining) जरूरी है, तो कोर्ट ने एक चौंकाने वाला खुलासा किया। सीजेआई ने कहा कि असली शोषण तो रोजगार एजेंसियां (Placement Agencies) कर रही हैं, जिनका बड़े शहरों में वर्चस्व हो गया है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का ही एक उदाहरण देते हुए बताया कि जब कोर्ट ने एक एजेंसी के जरिए कर्मचारियों को रखा, तो प्रति कर्मचारी 40,000 रुपये दिए जा रहे थे। लेकिन बाद में पता चला कि कर्मचारी के हाथ में सिर्फ 19,000 रुपये ही आ रहे थे और बाकी पैसा एजेंसी बिचौलिये के रूप में खा रही थी। यह बताता है कि समस्या वेतन की नहीं, बल्कि सिस्टम की है।
याचिकाकर्ताओं ने सिंगापुर मॉडल का हवाला देते हुए कहा कि वहां घरेलू कामगारों का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य है और उन्हें साप्ताहिक छुट्टी मिलती है। इस पर सीजेआई ने भारतीय सामाजिक ढांचे की वास्तविकता को रखा। उन्होंने कहा कि सिंगापुर मॉडल यहां नहीं चल सकता। भारत में लाखों परिवार घरेलू सहायकों को अपने परिवार के सदस्य की तरह रखते हैं। उनके बीच एक 'भरोसे' (Trust) का रिश्ता होता है। अगर एजेंसियों और कड़े कानूनों को इस रिश्ते के बीच लाया गया, तो यह मानवीय बंधन खत्म हो जाएगा और इसके गंभीर सामाजिक परिणाम होंगे। कोर्ट ने कहा कि शोषण होता है, इससे इनकार नहीं है, लेकिन उससे निपटने के लिए लोगों को व्यक्तिगत अधिकारों के प्रति जागरूक करना और उन्हें स्किल्ड (Skilled) बनाना ज्यादा जरूरी है। सुधारों की अत्यधिक चिंता कभी-कभी उल्टे परिणाम देती है।
अंततः, सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया। पीठ ने स्पष्ट किया कि जो राहतें मांगी गई हैं, वे कानून बनाने के अधिकार क्षेत्र (Legislative Domain) में आती हैं, जो संसद और विधानसभाओं का काम है, कोर्ट का नहीं। हालांकि, कोर्ट ने मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए राज्यों से आग्रह किया कि वे घरेलू कामगारों की समस्याओं पर गंभीरता से विचार करें और उनके कल्याण के लिए उचित कदम उठाएं।
हमारी राय (The Trending People Analysis)
सीजेआई सूर्यकांत की टिप्पणी कड़वी जरूर है, लेकिन यह एक जमीनी हकीकत को बयां करती है। भारत जैसे देश में, जहां अनौपचारिक क्षेत्र (Informal Sector) रोजगार का सबसे बड़ा स्रोत है, वहां कड़े नियम अक्सर रोजगार के अवसरों को ही खत्म कर देते हैं।
The Trending People का विश्लेषण है कि ट्रेड यूनियनों को अपनी भूमिका पर आत्ममंथन करना चाहिए। अधिकारों की लड़ाई जरूरी है, लेकिन अगर वह उद्योगों के अस्तित्व को ही मिटा दे, तो यह किसके हित में है? घरेलू कामगारों के लिए सामाजिक सुरक्षा और सम्मान जरूरी है, लेकिन इसे 'पुलिसिंग' के जरिए नहीं, बल्कि सामाजिक जागरूकता और कौशल विकास के जरिए हासिल किया जाना चाहिए। कोर्ट का फैसला यह संदेश देता है कि हर समस्या का समाधान 'मुकदमेबाजी' नहीं हो सकता।