राजस्थान में 'वोटर लिस्ट' पर संग्राम—गहलोत का बड़ा दावा, "साजिश के तहत कटवाए जा रहे कांग्रेसियों के नाम", अधिकारियों को दी सीधी चेतावनी: "हिसाब देना होगा
जयपुर/नई दिल्ली, दिनांक: 16 जनवरी 2026 — राजस्थान की शांत दिख रही राजनीति में गुरुवार को अचानक एक बड़ा तूफान खड़ा हो गया। प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के दिग्गज नेता अशोक गहलोत (Ashok Gehlot) ने मतदाता सूची पुनरीक्षण (Voter List Revision) प्रक्रिया को लेकर एक बेहद गंभीर और सनसनीखेज आरोप लगाया है। गहलोत ने दावा किया है कि राज्य में एक सोची-समझी साजिश के तहत कांग्रेस समर्थक मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटाए जा रहे हैं।
गहलोत ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर एक विस्तृत पोस्ट लिखकर न केवल अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं को 'रेड अलर्ट' पर रहने को कहा है, बल्कि प्रशासनिक अधिकारियों को भी कड़े शब्दों में चेतावनी दी है कि वे सत्ता के दबाव में न आएं, वरना भविष्य में उन्हें कानून का सामना करना पड़ सकता है।
फॉर्म-7 का 'खेल': क्या है गहलोत का आरोप?
अशोक गहलोत का यह बयान ऐसे समय में आया है जब राज्य में मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision - SIR) चल रहा है और नाम कटवाने के लिए आपत्ति दर्ज कराने की अंतिम तारीख गुरुवार ही थी।
साजिश का पैटर्न: गहलोत ने आरोप लगाया कि प्रदेश भर में कई स्थानों से उन्हें ऐसी सूचनाएं मिल रही हैं कि कुछ 'अनजान व्यक्तियों' द्वारा बड़ी संख्या में फॉर्म-7 (Form-7) जमा करवाए गए हैं।
मकसद: उनका कहना है कि इन फॉर्म्स का एकमात्र उद्देश्य कांग्रेस की विचारधारा से जुड़े मतदाताओं को चिन्हित कर उनके नाम मतदाता सूची से हटाना है।
कार्यकर्ताओं को 'करो या मरो' का आदेश
पूर्व मुख्यमंत्री ने अपनी पार्टी के जमीनी सिपाहियों को तत्काल सक्रिय होने का निर्देश दिया है। उन्होंने 'एक्स' पर लिखा:
"मेरी कांग्रेस के सभी कार्यकर्ताओं एवं बूथ स्तरीय अध्यक्षों (BLAs) से अपील है कि मुस्तैदी से इस पर नजर रखें। यह सुनिश्चित करें कि किसी भी वैध मतदाता (Valid Voter) का नाम न कटने पाए। हर फॉर्म-7 की जांच करें और अगर वह फर्जी है तो उसका विरोध करें।"
गहलोत जानते हैं कि एक-एक वोट की कीमत क्या होती है, खासकर तब जब पिछले विधानसभा चुनाव में हार-जीत का अंतर कई सीटों पर बेहद कम रहा था।
नौकरशाही को चेतावनी: "बौखलाहट से समझ लें, दिन लदने वाले हैं"
अशोक गहलोत का सबसे आक्रामक रूप अधिकारियों के लिए दिखी उनकी चेतावनी में नजर आया। उन्होंने प्रशासनिक मशीनरी को संविधान का पाठ पढ़ाते हुए भविष्य के लिए आगाह किया।
गहलोत ने लिखा:
"प्रशासनिक अधिकारियों से भी आग्रह है कि संविधान के अनुरूप काम करें। इस (भाजपा की) बौखलाहट से समझ लें कि भारतीय जनता पार्टी के दिन अब लदने वाले हैं। अगर आप गैरकानूनी काम करेंगे, तो आपको भी किसी न किसी दिन कानून का सामना करना होगा।"
यह बयान सीधे तौर पर उन अधिकारियों के लिए संदेश है जो कथित तौर पर सत्ताधारी दल के इशारे पर काम कर रहे हैं। गहलोत ने इसे भाजपा की हताशा और बौखलाहट करार दिया है।
भाजपा पर सीधा निशाना: 'लोकतंत्र का हनन'
कांग्रेस नेता ने इस पूरे प्रकरण को लोकतंत्र की हत्या की कोशिश बताया है। उनका तर्क है कि जब कोई पार्टी जनसमर्थन खोने लगती है, तो वह 'बैकडोर' (Backdoor) से चुनाव जीतने के लिए मतदाता सूची में हेरफेर जैसे हथकंडे अपनाती है।
- वैध मत की रक्षा: गहलोत ने कहा कि लोकतंत्र में हर नागरिक का वोट उसका सबसे बड़ा अधिकार है। किसी जीवित और निवासी व्यक्ति का नाम केवल इसलिए काट देना क्योंकि वह किसी विशेष पार्टी का समर्थक है, अपराध है।
मतदाता सूची: राजनीति का सबसे संवेदनशील मुद्दा
राजस्थान में मतदाता सूची हमेशा से विवादों में रही है। इससे पहले भी दोनों प्रमुख दल (भाजपा और कांग्रेस) एक-दूसरे पर फर्जी वोटर्स जोड़ने या नाम कटवाने के आरोप लगाते रहे हैं। एसआईआर (SIR) अभियान के आखिरी दिन गहलोत का यह विस्फोट बताता है कि कांग्रेस इस बार कोई जोखिम नहीं लेना चाहती। 2026 के सियासी समीकरणों को साधने के लिए एक शुद्ध और निष्पक्ष वोटर लिस्ट होना अनिवार्य है।
हमारी राय (The Trending People Analysis)
मतदाता सूची किसी भी लोकतंत्र की रीढ़ होती है। अशोक गहलोत द्वारा लगाए गए आरोप बेहद गंभीर हैं और इनकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। अगर वास्तव में फॉर्म-7 का इस्तेमाल थोक के भाव में विरोधियों के नाम काटने के लिए किया जा रहा है, तो यह चुनाव आयोग (Election Commission) की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करता है।
The Trending People का विश्लेषण है कि चुनाव आयोग को तत्काल प्रभाव से उन क्षेत्रों में विशेष पर्यवेक्षक भेजने चाहिए जहां से ऐसी शिकायतें आ रही हैं। अधिकारियों को भी गहलोत की चेतावनी को गंभीरता से लेना चाहिए, क्योंकि सरकारें बदलती रहती हैं, लेकिन नियम और कानून स्थायी होते हैं। एक भी वैध मतदाता का नाम कटना लोकतंत्र की हार है। प्रशासनिक पारदर्शिता ही इस विवाद का एकमात्र समाधान है।
