बांग्लादेश में प्रेस पर 'भीड़तंत्र' का हमला—ग्लोबल टीवी को आग लगाने की धमकी, पत्रकार नाजनीन मुन्नी को हटाने का अल्टीमेटम
ढाका/नई दिल्ली — बांग्लादेश में 'आजादी' के नाम पर शुरू हुआ आंदोलन अब 'अराजकता' का रूप ले चुका है, और इसका सबसे बड़ा शिकार वहां का स्वतंत्र मीडिया (Independent Media) बन रहा है। शेख हसीना सरकार के जाने के बाद उम्मीद थी कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बहाल होगी, लेकिन हकीकत इसके उलट है। देश के प्रमुख अखबारों 'प्रोथोम आलो' (Prothom Alo) और 'द डेली स्टार' (The Daily Star) के दफ्तरों पर हुए हमलों की आग अभी ठंडी भी नहीं हुई थी कि अब एक प्रमुख निजी समाचार चैनल 'ग्लोबल टीवी' (Global TV) को जलाने की धमकी दी गई है।
ढाका के तेजगांव स्थित चैनल के दफ्तर में घुसकर दी गई इस धमकी ने पूरे पत्रकार समुदाय में सिहरन पैदा कर दी है। यह घटना साबित करती है कि बांग्लादेश में अब खबरों का संपादन न्यूज़रूम में नहीं, बल्कि सड़कों पर खड़ी उग्र भीड़ द्वारा किया जा रहा है।
क्या हुआ ग्लोबल टीवी के दफ्तर में?
घटना 21 दिसंबर की शाम करीब 8 बजे की है। ढाका के तेजगांव औद्योगिक क्षेत्र में स्थित ग्लोबल टीवी के मुख्यालय में अचानक तनाव फैल गया।
- घुसपैठ: सात से आठ युवकों का एक समूह दफ्तर में दाखिल हुआ। उन्होंने खुद को ‘एंटी-डिस्क्रिमिनेशन स्टूडेंट मूवमेंट’ (भेदभाव विरोधी छात्र आंदोलन) से जुड़ा हुआ बताया।
- धमकी: इस समूह ने चैनल के मैनेजिंग डायरेक्टर अहमद हुसैन से मुलाकात की और सीधे शब्दों में धमकी दी। उनका कहना था कि चैनल की 'हेड ऑफ न्यूज' नाजनीन मुन्नी (Nazneen Munni) को तत्काल पद से हटाया जाए।
- अल्टीमेटम: युवकों ने चेतावनी दी कि अगर मुन्नी को नहीं हटाया गया, तो ग्लोबल टीवी के दफ्तर को भी उसी तरह आग के हवाले कर दिया जाएगा, जैसा हाल ही में अन्य मीडिया संस्थानों के साथ किया गया।
क्यों निशाने पर हैं नाजनीन मुन्नी?
भीड़ की नाराजगी की वजह चैनल की एक हालिया कवरेज बताई जा रही है।
- उस्मान हादी की खबर: प्रदर्शनकारियों ने इंकलाब मंच के प्रवक्ता शरीफ उस्मान हादी की मौत की खबर दिखाए जाने के तरीके पर आपत्ति जताई। उनका आरोप था कि चैनल ने तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया।
- अवामी लीग का टैग: इसके अलावा, उन्होंने वरिष्ठ पत्रकार नाजनीन मुन्नी पर अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख हसीना की पार्टी 'अवामी लीग' का समर्थक होने का आरोप लगाया। बांग्लादेश में आजकल किसी को भी निशाना बनाने के लिए उस पर 'अवामी लीग समर्थक' का टैग लगाना सबसे आसान हथियार बन गया है।
48 घंटे का फरमान: नाजनीन मुन्नी, जो घटना के वक्त दफ्तर में नहीं थीं, ने सोशल मीडिया पर बताया कि युवकों ने मैनेजिंग डायरेक्टर से 48 घंटे के भीतर उन्हें हटाने का लिखित आश्वासन मांगा। जब एमडी ने इनकार किया, तो उन्होंने आगजनी की धमकी दोहराई। दबाव इतना ज्यादा था कि चैनल के एक स्टाफ सदस्य से जबरन एक कागज पर हस्ताक्षर कराए जाने की भी खबर है।
संगठन की सफाई: "बिना अनुमति गया था सदस्य"
मामला तूल पकड़ते ही 'एंटी-डिस्क्रिमिनेशन स्टूडेंट मूवमेंट' बैकफुट पर आ गया। 'प्रोथोम आलो' की रिपोर्ट के मुताबिक, संगठन के केंद्रीय अध्यक्ष रिफात राशिद ने स्वीकार किया कि उनकी सिटी कमेटी का एक सदस्य बिना अनुमति के ग्लोबल टीवी के दफ्तर गया था।
कार्रवाई का दावा: राशिद ने कहा, "हमारा संगठन किसी भी तरह की हिंसा या प्रेस की स्वतंत्रता पर हमले का समर्थन नहीं करता। संबंधित सदस्य को 'शो-कॉज नोटिस' (कारण बताओ नोटिस) जारी किया गया है।" हालांकि, पीड़ित पत्रकारों का कहना है कि यह केवल एक रस्मी बयान है, क्योंकि जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं की भीड़ मीडिया को लगातार डरा रही है।
पत्रकारों में खौफ: "अब चुप रहना संभव नहीं"
इस घटना के बाद ग्लोबल टीवी प्रबंधन ने सुरक्षा कारणों से नाजनीन मुन्नी को कुछ दिनों तक दफ्तर न आने और शांत रहने की सलाह दी थी। लेकिन मुन्नी ने साहस दिखाते हुए सार्वजनिक रूप से सामने आने का फैसला किया।
उन्होंने कहा:
"यह हमला केवल मेरे खिलाफ नहीं है, बल्कि यह पूरी मीडिया को डराने की एक संगठित कोशिश है। अगर हम आज चुप रहे, तो कल कोई भी सच नहीं बोल पाएगा।"
मुन्नी ने खुलासा किया कि हाल के महीनों में कई अन्य वरिष्ठ पत्रकारों को भी धमकियां मिली हैं। इनमें जामुना टीवी (Jamuna TV) की संपादक रोक्साना अंजुमन निकोल का नाम भी शामिल है। पैटर्न साफ है—जो भी पत्रकार आलोचनात्मक रिपोर्टिंग कर रहा है या सवाल पूछ रहा है, उसे एक-एक कर निशाना बनाया जा रहा है।
लोकतंत्र का चौथा स्तंभ खतरे में
बांग्लादेश में मीडिया की स्थिति भयावह हो चुकी है। मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार प्रेस की आजादी के बड़े-बड़े दावे करती है, लेकिन हकीकत में मीडियाकर्मी अपनी जान की भीख मांग रहे हैं। पुलिस और प्रशासन मूकदर्शक बने हुए हैं। जब देश के सबसे बड़े अखबारों के दफ्तरों में तोड़फोड़ होती है और टीवी चैनलों को जलाने की धमकियां मिलती हैं, तो यह सवाल उठना लाजमी है कि देश में कानून का राज है या भीड़तंत्र का?
हमारी राय
किसी भी लोकतंत्र में मीडिया की आवाज को दबाना तानाशाही की सबसे पहली निशानी होती है। बांग्लादेश में जो हो रहा है, वह 'प्रेस सेंसरशिप' का सबसे क्रूर रूप है—जिसे सरकार नहीं, बल्कि सड़क पर उतरी भीड़ लागू कर रही है। ग्लोबल टीवी और नाजनीन मुन्नी के साथ जो हुआ, वह निंदनीय है।
The Trending People का मानना है कि यूनुस सरकार को तत्काल इस 'मॉब जस्टिस' (Mob Justice) पर लगाम लगानी होगी। अगर पत्रकारों को काम करने के लिए अपनी जान जोखिम में डालनी पड़ेगी, तो समाज तक सच कभी नहीं पहुंच पाएगा। 'एंटी-डिस्क्रिमिनेशन' का नारा देने वाले आंदोलन को यह समझना होगा कि विचारों की लड़ाई विचारों से लड़ी जाती है, पेट्रोल बम या आगजनी से नहीं। अगर मीडिया सुरक्षित नहीं है, तो बांग्लादेश का लोकतंत्र भी सुरक्षित नहीं है।
