वैश्विक ऊर्जा संकट: ईरान युद्ध से कच्चे तेल में लगी आग, आम आदमी बेहाल, अमेरिकी कंपनियों को 60 अरब डॉलर का बंपर मुनाफा
नई दिल्ली (The Trending People): पूरी दुनिया इस वक्त एक बेहद गंभीर और गहरे ऊर्जा संकट के मुहाने पर खड़ी है। 28 फरवरी से ईरान के आसपास शुरू हुए सैन्य संघर्ष ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल (Crude Oil) की आपूर्ति श्रृंखला को बुरी तरह से पंगु बना दिया है। इस युद्ध का सीधा असर दुनिया भर के आम नागरिकों की जेब पर पड़ रहा है, जबकि दूसरी ओर कुछ बड़े देशों की तेल कंपनियों के खजाने भर रहे हैं।
घटना की पृष्ठभूमि व कारण: हॉर्मुज जलडमरूमध्य में रुकावट
इस वैश्विक ऊर्जा संकट का मुख्य केंद्र हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) है। यह समुद्री मार्ग वैश्विक तेल व्यापार की 'शह रग' माना जाता है। हालिया ईरानी विवाद और युद्ध की स्थिति के कारण इस अहम मार्ग से तेल की सप्लाई में भारी रुकावट आई है। चूंकि दुनिया के कई प्रमुख देशों के लिए कच्चे तेल की आपूर्ति इसी रास्ते से होती है, इसलिए सप्लाई चेन टूटते ही हाहाकार मच गया है।
महंगाई की मार: पेट्रोल-डीजल से लेकर राशन तक सब महंगा
तेल आपूर्ति में इस भारी रुकावट का सीधा असर पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों पर पड़ रहा है। ईंधन की कीमतों में उछाल के कारण माल ढुलाई (Transportation Cost) महंगी हो गई है। नतीजतन, हर आम व्यक्ति के लिए रोजमर्रा की जरूरत का सामान, सब्जियां, और राशन की कीमतें आसमान छूने लगी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जल्द ही युद्ध विराम नहीं हुआ, तो वैश्विक महंगाई दर (Inflation) खतरनाक स्तर को पार कर जाएगी।
अमेरिका की तेल कंपनियों के लिए 'आपदा में अवसर'
इस वैश्विक संकट का असर अलग-अलग देशों पर अलग-अलग तरीके से देखने को मिल रहा है। जहां एक तरफ अधिकांश देश और आम नागरिक इस संकट से त्राहि-त्राहि कर रहे हैं, वहीं अमेरिकी तेल उत्पादक कंपनियों के लिए यह युद्ध एक 'लॉटरी' साबित हो रहा है। ईरान विवाद ने वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला को भले ही झकझोर दिया हो, लेकिन अमेरिकी कंपनियां इस कमी को पूरा करते हुए स्थिति का भरपूर फायदा उठा रही हैं। बाजार में तेल की कीमतें बढ़ने से उनका राजस्व रॉकेट की रफ्तार से बढ़ रहा है।
विशेषज्ञों और वित्तीय संस्थाओं की प्रतिक्रिया
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में युद्ध शुरू होने के बाद से अब तक लगभग 47 प्रतिशत का ऐतिहासिक उछाल देखा गया है। पिछले सप्ताह ही अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क ‘ब्रेंट क्रूड’ ने 100 डॉलर प्रति बैरल का मनोवैज्ञानिक स्तर पार कर लिया है। वहीं, अमेरिकी मानक ‘वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट’ (WTI) भी 98.71 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच गया है।
- जेफरीज (Jefferies) की रिपोर्ट: ‘फाइनेंशियल टाइम्स’ में प्रकाशित निवेश बैंक ‘जेफरीज’ के अनुमान के मुताबिक, केवल मार्च महीने में ही अमेरिकी तेल उत्पादकों को इस मूल्य वृद्धि के कारण लगभग 5 अरब डॉलर का अतिरिक्त कैश फ्लो मिल सकता है।
- रिस्टैड एनर्जी (Rystad Energy) का अनुमान: प्रमुख रिसर्च फर्म ‘रिस्टैड एनर्जी’ के अनुसार, साल 2026 में अगर कच्चे तेल का औसत मूल्य 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बना रहता है, तो अमेरिकी उत्पादकों के खजाने में लगभग 63.4 अरब डॉलर की अतिरिक्त नकदी आ सकती है।
कुल मिलाकर, यह संकट अमेरिकी तेल क्षेत्र के लिए 60 अरब डॉलर से अधिक का अप्रत्याशित लाभ लेकर आया है।
हमारी राय: अंतरराष्ट्रीय राजनीति और युद्ध का खामियाजा हमेशा आम जनता को भुगतना पड़ता है। ईरान और हॉर्मुज जलडमरूमध्य का यह संकट स्पष्ट रूप से दिखाता है कि कैसे एक क्षेत्र की अशांति पूरी दुनिया की रसोई का बजट बिगाड़ सकती है। जहां विकासशील देशों की अर्थव्यवस्थाएं इस महंगे तेल के बोझ तले दब रही हैं, वहीं कुछ देशों की कंपनियों का मुनाफा मानवता और कूटनीति पर सवाल खड़े करता है। संयुक्त राष्ट्र और वैश्विक शक्तियों को तत्काल इस युद्ध को रोकने के लिए कड़े कूटनीतिक कदम उठाने चाहिए, ताकि आम आदमी को महंगाई की इस भयंकर मार से बचाया जा सके।
