कचरे के ढेर में खोता बचपन—50% बाल मजदूर नशे की गिरफ्त में, यौन शोषण का शिकार होता 'भविष्य'; क्या हम ले पाएंगे एक मासूम की जिम्मेदारी?
नई दिल्ली/मुंबई, दिनांक: 3 फरवरी 2026 — बचपन, इंसान की जिंदगी का वह सबसे हसीन और सुनहरा पन्ना होता है, जिस पर न किसी बात की चिंता की लकीरें होती हैं और न ही जिम्मेदारियों का बोझ। यह वह समय होता है जब हर पल अपनी मस्तियों में खोए रहना, बेफिक्र होकर खेलना-कूदना और किताबों की दुनिया में नए सपने बुनना ही जीवन का एकमात्र उद्देश्य होता है। लेकिन विडंबना यह है कि हमारे समाज में सभी का बचपन ऐसा हो, यह संभव नहीं है। भारत के चमकते शहरों की चकाचौंध और विकास के दावों के बीच एक अंधेरी गली ऐसी भी है, जहां बचपन खिलौनों से नहीं, बल्कि औजारों और झूठे बर्तनों से खेलता है। हम बात कर रहे हैं 'बाल मजदूरी' (Child Labour) की, एक ऐसी सामाजिक व्याधि जिससे हम सभी वाकिफ तो हैं, लेकिन अक्सर अपनी आंखें मूंद लेते हैं।
कानून और संविधान के मुताबिक, कोई भी ऐसा बच्चा जिसकी उम्र 14 वर्ष से कम हो और वह अपनी या अपने परिवार की जीविका के लिए काम करने को मजबूर हो, बाल मजदूर कहलाता है। लेकिन यह केवल एक कानूनी परिभाषा नहीं है, बल्कि यह गरीबी, लाचारी और कई बार माता-पिता की प्रताड़ना का वह कड़वा सच है जिसके चलते ये बच्चे बाल मजदूरी के दलदल में धंसते चले जाते हैं। बड़े महानगरों के फाइव स्टार होटलों के बाहर से लेकर छोटे कस्बों के ढाबों और गैराजों तक, आपको हर गली-नुक्कड़ पर कई 'राजू', 'मुन्नी', 'छोटू' या 'चवन्नी' मिल जाएंगे। ये वे बच्चे हैं जिन्होंने अपने हालात के आगे घुटने टेक दिए हैं और कलम पकड़ने की उम्र में मजदूरी का बोझ उठा रहे हैं।
यह समस्या सिर्फ काम करने या पसीना बहाने तक सीमित नहीं है। इसके पीछे एक और भी घिनौना और डरावना सच छिपा है, जिसका सामना इन मासूमों को रोज करना पड़ता है। जमीनी हकीकत और कई एनजीओ (NGO) की रिपोर्ट्स बताती हैं कि बाल मजदूरी के साथ-साथ इन बच्चों को कई तरह के कुकृत्यों का शिकार होना पड़ता है। आंकड़ों पर नजर डालें तो स्थिति रूह कांपने वाली है। एनजीओ के सर्वेक्षणों के अनुसार, लगभग 50.2 प्रतिशत बाल मजदूर ऐसे हैं जो सप्ताह के सातों दिन काम करते हैं, उन्हें एक दिन की भी छुट्टी नसीब नहीं होती। इससे भी ज्यादा भयावह आंकड़ा यह है कि इनमें से 53.22 प्रतिशत बच्चे यौन प्रताड़ना (Sexual Abuse) के शिकार हो रहे हैं। काम की जगहों पर या रास्तों में उनका शारीरिक शोषण किया जाता है, जिसका उनके कोमल मन पर इतना गहरा घाव लगता है जो शायद ताउम्र न भरे।
शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना से बचने के लिए या भूख को मारने के लिए, इनमें से हर दूसरा बच्चा किसी न किसी नशे के चक्कर में पड़ जाता है। जब इन बच्चों से बात की गई तो पता चला कि लगभग 50 प्रतिशत बच्चे नशे की लत (Drug Addiction) में पड़कर अपना जीवन बर्बाद कर रहे हैं। वे रबर सूंघने से लेकर सस्ती शराब तक का नशा करते हैं ताकि उन्हें अपनी बदतर जिंदगी का अहसास न हो। यह एक ऐसा दुष्चक्र है जहां गरीबी उन्हें काम पर लाती है, काम पर शोषण होता है, और शोषण से बचने के लिए वे नशे का सहारा लेते हैं, जो अंततः उन्हें अपराध की दुनिया में धकेल देता है।
सरकार ने शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE) के तहत आठवीं कक्षा तक की शिक्षा को अनिवार्य और निशुल्क कर दिया है, मिड-डे मील जैसी योजनाएं भी चलाई हैं। लेकिन साहब, लोगों की गरीबी और बेबसी के आगे ये तमाम सरकारी योजनाएं भी निष्फल साबित होती दिखाई देती हैं। कई बार माता-पिता सिर्फ इस वजह से अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेजते क्योंकि उनके स्कूल जाने से परिवार की आमदनी का एक स्रोत बंद हो जाएगा और उनका चूल्हा नहीं जल पाएगा। यह 'पेट की आग' है जो शिक्षा के महत्व को जलाकर राख कर देती है। और जब यही बच्चे, जो नशा नहीं करना चाहते, दो वक्त की रोटी इज्जत से कमाना चाहते हैं, तब समाज उन्हें 'बाल मजदूर' का हवाला देकर काम नहीं देता। आखिर ये बच्चे जाएं तो जाएं कहां? कानून ने इसे अपराध घोषित कर दिया, लेकिन क्या कभी किसी ने इन बच्चों की मजबूरी को गंभीरता से सुना?

यह समस्या केवल भारत की नहीं, बल्कि एक वैश्विक त्रासदी है। लेकिन विश्वगुरु बनने की राह पर अग्रसर भारत के लिए यह एक बड़ा प्रश्नचिह्न है। क्या हम अपनी आने वाली पीढ़ी को इस तरह गर्त में जाने देंगे? देश के सुरक्षित भविष्य के लिए अब वक्त आ गया है कि यह जिम्मेदारी केवल सरकार पर न छोड़ी जाए। यह जिम्मेदारी उन सभी पढ़े-लिखे, समझदार और विद्वान नागरिकों को लेनी होगी जो बदलाव ला सकते हैं। विशेषकर उन लोगों को जिनके घर में मां लक्ष्मी ने धन की वर्षा कर रखी है, उन्हें आगे आना होगा।
हमारी राय
बाल मजदूरी कोई आंकड़ा नहीं, बल्कि मानवता पर लगा एक धब्बा है। जब हम किसी छोटू को चाय लाते देखते हैं, तो हम केवल एक सेवा ले रहे होते हैं, लेकिन असल में हम एक बचपन का अंतिम संस्कार देख रहे होते हैं। यौन शोषण और नशे के आंकड़े यह बताते हैं कि हम एक बीमार समाज का निर्माण कर रहे हैं।
The Trending People का विश्लेषण है कि सिर्फ कानून बनाने से बाल मजदूरी नहीं रुकेगी। इसके लिए 'सामाजिक गोद' (Social Adoption) की जरूरत है। अगर हर सक्षम व्यक्ति या परिवार सिर्फ एक वंचित बच्चे की शिक्षा या कौशल विकास (Skill Development) की जिम्मेदारी ले ले, तो तस्वीर बदल सकती है। हमें बाल श्रम का बहिष्कार करना होगा और बाल शिक्षा को प्रोत्साहित करना होगा। यह सवाल कड़वा है, लेकिन जरूरी है—क्या आप लेंगे ऐसे किसी एक मासूम की जिम्मेदारी? क्योंकि अगर आज हमने इनकी उंगली नहीं थामी, तो कल ये अपराध की दुनिया का हथियार बन जाएंगे।




