जब उंगलियों की थाप से रुक जाता था वक्त—उस्ताद अल्ला रक्खा की पुण्यतिथि पर विशेष, वो 'तपस्वी' जिसने कड़कड़ाती ठंड में पसीने से तर होकर साधा था 'सुर और ताल'
मुंबई/नई दिल्ली, दिनांक: 3 फरवरी 2026 — भारतीय शास्त्रीय संगीत के आकाश में कुछ सितारे ऐसे होते हैं जिनकी चमक समय के साथ और भी प्रखर होती जाती है। आज की तारीख, 3 फरवरी, संगीत जगत के लिए एक भावुक दिन है। यह उस महान शख्सियत की पुण्यतिथि है, जिसने तबले (Tabla) को केवल एक संगत वाद्ययंत्र (Accompaniment Instrument) के दर्जे से ऊपर उठाकर सोलो परफॉर्मेंस का गौरव दिलाया। हम बात कर रहे हैं उस्ताद अल्ला रक्खा खां (Ustad Alla Rakha Khan) की, जिन्हें दुनिया प्यार से 'अब्बाजी' कहती थी। उनकी कलाकारी में वह जादू था जो श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देता था और उनकी उंगलियों में वह रफ्तार थी जो बिजली को भी मात दे दे। उस्ताद ने तबला वादन को न केवल भारत में, बल्कि पूरी दुनिया में एक नई और सम्मानजनक ऊंचाई प्रदान की।
अल्ला रक्खा का जन्म 29 अप्रैल 1919 को जम्मू के घगवाल गांव में हुआ था, जो लाहौर से करीब 80 किलोमीटर दूर है। संगीत के प्रति उनका आकर्षण किसी दैवीय घटना से कम नहीं था। बचपन में जब वे गुरदासपुर में अपने चाचा के साथ रह रहे थे, तब मात्र 12 साल की उम्र में तबले की ध्वनि ने उन्हें इस कदर मोहित कर लिया कि उन्होंने अपना पूरा जीवन इसी लय को समर्पित कर दिया। उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति उन्हें घर से दूर ले गई और वे पंजाब घराने के महान तबला वादक मियां कादर बख्श के शागिर्द बन गए। संगीत की भूख उन्हें यहीं नहीं रोकी, उन्होंने पटियाला घराने के उस्ताद आशिक अली खान से राग विद्या और ख्याल गायकी की बारीकियां भी सीखीं, जिसने उनकी लयकारी में एक सुरीलापन जोड़ दिया।
उनकी सफलता के पीछे कोई शॉर्टकट नहीं, बल्कि एक कठिन तपस्या छिपी थी। अपनी कलाकारी को निखारने के लिए उन्होंने जिस अनुशासन का पालन किया, वह आज की पीढ़ी के लिए एक मिसाल है। एक पुराने इंटरव्यू में उन्होंने अपने कड़े रियाज (Practice) का जिक्र किया था। उनके गुरु मियां कादर बख्श उन्हें कड़ाके की ठंड में भी कम और झिल्लड़ (पतले) कपड़े पहनकर रियाज करने का आदेश देते थे। गुरु का सख्त निर्देश था कि जब तक शरीर पसीने से तर-बतर न हो जाए, तब तक रियाज नहीं रोकनी चाहिए। गुरु की आज्ञा को पत्थर की लकीर मानकर अल्ला रक्खा 5 से 7 घंटे लगातार तबला बजाते रहते थे। ठंड में ठिठुरते हुए भी पसीना बहाना उनकी लगन और समर्पण का प्रतीक था। इसी तप ने उनकी हथेलियों को वह ताकत दी जिससे निकली आवाज दुनिया भर में गूंजी।
अल्ला रक्खा ने अपने पेशेवर संगीत करियर की शुरुआत लाहौर में एक संगतकार के रूप में की थी। साल 1940 में वे अखिल भारतीय रेडियो (All India Radio) से जुड़े, जो उस समय किसी भी कलाकार के लिए बड़ी उपलब्धि थी। उन्होंने 1943 से 1948 के बीच कुछ हिंदी फिल्मों के लिए संगीत भी दिया, लेकिन उनकी असली मंजिल शास्त्रीय संगीत ही थी। उन्हें वैश्विक पहचान 1960 के दशक में मिली, जब वे सितार वादक पंडित रविशंकर (Pandit Ravi Shankar) के मुख्य संगतकार बने। यह जोड़ी भारतीय संगीत के इतिहास की सबसे प्रतिष्ठित जोड़ियों में से एक बन गई। पश्चिमी देशों में रविशंकर के साथ उनकी प्रस्तुतियों ने तबला वादन को वैश्विक स्तर पर लोकप्रिय बनाया। मोंटेरे पॉप फेस्टिवल (1967) और वुडस्टॉक फेस्टिवल (1969) में उनके प्रदर्शन ने पश्चिमी दर्शकों को हतप्रभ कर दिया। उनकी ताल की सटीकता, संवेदनशीलता और मंच पर तात्कालिक रचनात्मकता (Improvisation) ने उन्हें एक लीजेंड बना दिया।
उस्ताद अल्ला रक्खा की एक और बड़ी उपलब्धि यह थी कि उन्होंने हिंदुस्तानी और कर्नाटक संगीत के बीच की दूरी को कम करने का काम किया। उन्होंने दोनों परंपराओं के कलाकारों के साथ जुगलबंदी की और संगीत को एक सूत्र में पिरोया। 3 फरवरी 2000 को जब उनका निधन हुआ, तो देश ने एक अनमोल रत्न खो दिया। उनके निधन पर तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने शोक संदेश में कहा था कि देश ने एक ऐसे कुशल उस्ताद को खो दिया, जिनकी तबला वादन कला ने पूरी दुनिया में धूम मचा दी थी। वहीं, तत्कालीन राष्ट्रपति के.आर. नारायणन ने अपनी श्रद्धांजलि में कहा था कि उनके निधन से एक अद्वितीय स्पंदन थम गया है। उनकी कलाइयों और उंगलियों ने तबले से ऐसी जादुई ध्वनि उत्पन्न की, जिसने भारत की अनूठी संगीत संस्कृति की लय और ताल को कायम रखा।
उस्ताद अल्ला रक्खा का जीवन यह सिखाता है कि महानता सुविधाओं में नहीं, बल्कि संघर्ष में जन्म लेती है। आज जब हम उनके पुत्र उस्ताद जाकिर हुसैन को तबले पर जादू बिखेरते देखते हैं, तो हमें याद रखना चाहिए कि इस विरासत की नींव 'अब्बाजी' ने अपनी कड़ी तपस्या से रखी थी।
The Trending People का विश्लेषण है कि उस्ताद अल्ला रक्खा ने तबले को 'सपोर्टिंग रोल' से निकालकर 'लीड रोल' में खड़ा किया। उन्होंने दुनिया को बताया कि तबला सिर्फ ताल देने के लिए नहीं है, बल्कि यह बात भी कर सकता है। उनका रियाज और समर्पण आने वाली कई पीढ़ियों के संगीत साधकों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा। आज उनकी पुण्यतिथि पर हम उस 'लय के देवता' को नमन करते हैं।