चिंताजनक पुनरावृत्ति: इसरो का असफल पीएसएलवी-सी62 मिशन
इसरो को गुणवत्ता सुनिश्चित करने वाले नियमों और प्रक्रियाओं को फिर से बनाना शुरू करना चाहिए
पृष्ठभूमि
12 जनवरी की सुबह श्रीहरिकोटा से जब पीएसएलवी-सी62 ने उड़ान भरी, तो शुरुआती क्षणों में सब कुछ सामान्य प्रतीत हुआ। लेकिन तीसरे चरण के चालू होते ही लाइव प्रसारण में रॉकेट की स्थिति और प्रक्षेप-पथ दिखना बंद हो गया। कुछ ही देर में यह स्पष्ट हो गया कि मिशन विफल हो चुका है। यह असफलता इसलिए ज्यादा गंभीर है क्योंकि इससे पहले मई 2025 में पीएसएलवी-सी61 भी तीसरे चरण में ही असफल हुआ था।
दशकों तक पीएसएलवी को भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम की सबसे भरोसेमंद रीढ़ माना जाता रहा है। यही यान भारत की वाणिज्यिक लॉन्च सेवाओं का चेहरा बना और इसने देश को वैश्विक अंतरिक्ष मानचित्र पर साख दिलाई। ऐसे में लगातार दो असफलताएं केवल तकनीकी झटका नहीं, बल्कि संस्थागत आत्ममंथन की मांग करती हैं।
मुख्य बिंदु
तकनीकी परिपक्वता के बाद भी असफलता
पीएसएलवी कोई नया या प्रयोगात्मक प्रक्षेपण यान नहीं है। यह तकनीक वर्षों के परीक्षण, सुधार और सफल उड़ानों के बाद परिपक्व मानी जाती है। ऐसे में तीसरे चरण में दो बार गड़बड़ी होना यह संकेत देता है कि समस्या महज संयोग या दुर्लभ तकनीकी दोष तक सीमित नहीं हो सकती।
सी61 मिशन के दौरान तीसरे चरण में ‘चैंबर प्रेशर’ में गिरावट आई थी। इसके बाद गठित फेलियर एनालिसिस कमेटी की रिपोर्ट को सार्वजनिक न करके प्रधानमंत्री कार्यालय तक सीमित रखा गया। इसरो ने केवल “संरचनात्मक मजबूती” का भरोसा दिलाया और अगली उड़ान को मंजूरी दे दी।
सी62 में सामने आई ‘रोल रेट डिस्टर्बेंस’ की समस्या के लक्षण भी पहले मिशन से पहले दिखी घटनाओं से मिलते-जुलते बताए जा रहे हैं। यह समानता गुणवत्ता आश्वासन और परीक्षण प्रक्रियाओं पर सवाल खड़े करती है।
पारदर्शिता और जवाबदेही का सवाल
अंतरिक्ष कार्यक्रमों में विफलता असामान्य नहीं है। नासा और स्पेसएक्स जैसे संस्थान भी असफलताओं से गुजरे हैं। फर्क पारदर्शिता और उससे सीखने की प्रक्रिया में होता है। जब असफलता के कारणों को पूरी तरह सार्वजनिक नहीं किया जाता, तो न केवल तकनीकी समुदाय बल्कि नीति-निर्माताओं और जनता का भरोसा भी प्रभावित होता है।
इसरो की साख अब तक उसकी ईमानदार स्वीकारोक्ति और सुधार की क्षमता से बनी रही है। ऐसे में रिपोर्ट को गोपनीय रखना, भले ही प्रशासनिक कारणों से हो, दीर्घकाल में संस्थान की विश्वसनीयता को कमजोर कर सकता है।
वाणिज्यिक और रणनीतिक असर
पीएसएलवी आज केवल एक वैज्ञानिक प्रक्षेपण यान नहीं है, बल्कि एक वाणिज्यिक उत्पाद भी है। न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड के तहत इसे वैश्विक प्रक्षेपण बाजार में पेश किया गया है। लगातार असफलताओं का सीधा असर अंतरराष्ट्रीय बीमा कंपनियों के जोखिम आकलन पर पड़ेगा।
बीमा प्रीमियम बढ़ने का मतलब यह होगा कि पीएसएलवी से उपग्रह प्रक्षेपण अधिक महंगा हो जाएगा, जिससे इसकी प्रतिस्पर्धात्मकता घट सकती है। ऐसे समय में, जब भारत खुद को अंतरिक्ष सेवाओं का वैश्विक प्रदाता बनाने की दिशा में आगे बढ़ा रहा है, यह स्थिति रणनीतिक रूप से असहज करने वाली है।
आगे की राह: सुधार की जरूरत
यह समय बचाव में तर्क देने का नहीं, बल्कि गुणवत्ता आश्वासन ढांचे की गहराई से समीक्षा करने का है। उत्पादन, परीक्षण और उड़ान-पूर्व सत्यापन की प्रक्रियाओं को नए सिरे से परखना जरूरी है। साथ ही, असफलताओं से जुड़े निष्कर्षों को वैज्ञानिक समुदाय के साथ साझा करना विश्वास बहाली की दिशा में अहम कदम होगा।
निष्कर्ष
पीएसएलवी-सी62 की असफलता इसरो के लिए चेतावनी है कि स्थापित प्रणालियां भी समय के साथ ढीली पड़ सकती हैं। यह भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम की उपलब्धियों को कम नहीं करती, लेकिन यह याद जरूर दिलाती है कि विश्वसनीयता निरंतर अनुशासन और पारदर्शिता से ही बनी रहती है।
अगर इसरो इस चुनौती को आत्ममंथन और सुधार के अवसर के रूप में लेता है, तो पीएसएलवी फिर से वही ‘बोझ उठाने वाला घोड़ा’ बन सकता है जिस पर भारत को दशकों से गर्व रहा है।
हमारी राय
अंतरिक्ष क्षेत्र में असफलता अंत नहीं, बल्कि सीखने की प्रक्रिया का हिस्सा होती है। लेकिन बार-बार होने वाली समान गड़बड़ियां इस बात का संकेत हैं कि गुणवत्ता आश्वासन को प्राथमिकता के केंद्र में लाना होगा। इसरो की ताकत उसकी वैज्ञानिक क्षमता के साथ-साथ उसका संस्थागत आत्मविश्वास है, जिसे पारदर्शिता और सुधार से ही बनाए रखा जा सकता है।
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