सुप्रीम कोर्ट का 'पारदर्शी' डंडा—तमिलनाडु में SIR प्रक्रिया हुई आसान, अब सरकारी दफ्तरों में चस्पा होगी 'विसंगति सूची', जनता को मिली बड़ी राहतफाइल फोटो
नई दिल्ली/चेन्नई, [दिनांक: 28 जनवरी 2026 — तमिलनाडु में चल रही मतदाता सूची की स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया को लेकर मचे घमासान के बीच सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा और जनहितैषी फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने आम जनता की परेशानियों का संज्ञान लेते हुए प्रशासन को सख्त निर्देश दिए हैं कि पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी और सुगम बनाया जाए। कोर्ट का यह आदेश उन लाखों लोगों के लिए संजीवनी बनकर आया है जिन्हें डर था कि तकनीकी खामियों के कारण उनका नाम वोटर लिस्ट से कट सकता है। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि अब 'लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी लिस्ट' (तार्किक विसंगति सूची) को फाइलों में दबाकर नहीं रखा जाएगा, बल्कि उसे सरकारी दफ्तरों में सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करना अनिवार्य होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने अधिकारियों को दो टूक कहा है कि जिन लोगों के नामों में विसंगति है, उसे छिपाया न जाए। पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए अब यह सूची ग्राम पंचायत भवनों, सब-डिवीजन के तालुका कार्यालयों और शहरी क्षेत्रों में वार्ड कार्यालयों के नोटिस बोर्ड पर चस्पा करनी होगी। सबसे महत्वपूर्ण निर्देश यह है कि लिस्ट में केवल नाम नहीं, बल्कि विसंगति का संक्षिप्त और स्पष्ट कारण (Reason for Discrepancy) भी लिखा होना चाहिए। इससे प्रभावित व्यक्ति को भटकना नहीं पड़ेगा और उसे सटीक पता होगा कि उसके दस्तावेज में कमी कहां है—चाहे वह फोटो की हो, पते की हो या उम्र की।
लोगों की सुविधा के लिए कोर्ट ने समय सीमा भी निर्धारित कर दी है। जिस दिन सूची नोटिस बोर्ड पर प्रदर्शित की जाएगी, उसके अगले 10 दिनों के भीतर प्रभावित लोग अपने दस्तावेज जमा कर अपनी त्रुटियों को सुधार सकते हैं। कोर्ट ने मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए यह भी छूट दी है कि यदि कोई व्यक्ति बुजुर्ग, बीमार या बाहर होने के कारण खुद आने में असमर्थ है, तो उसे व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने की बाध्यता नहीं होगी। वह अपने अधिकृत प्रतिनिधि (Authorized Representative) के माध्यम से भी दस्तावेज जमा करवा सकता है। इसके अलावा, किसी भी तरह की आपत्ति सीधे सब-डिवीजन स्तर के कार्यालयों में दाखिल की जा सकेगी, जिससे स्थानीय स्तर पर ही समस्याओं का निपटारा संभव हो सकेगा।
हमारी राय (The Trending People Analysis)
सुप्रीम कोर्ट का यह हस्तक्षेप लोकतंत्र की मजबूती के लिए एक अनिवार्य कदम है। मतदाता सूची में नाम होना नागरिक का सबसे बड़ा अधिकार है और इसे तकनीकी जटिलताओं की भेंट नहीं चढ़ने दिया जा सकता। विसंगति सूची को सार्वजनिक करना और कारण बताना प्रशासन की जवाबदेही तय करेगा।
The Trending People का विश्लेषण है कि यह फैसला न केवल तमिलनाडु बल्कि पूरे देश के लिए एक नजीर (Precedent) बनना चाहिए। अक्सर अधिकारी गुपचुप तरीके से नाम काट देते हैं और वोटर को मतदान के दिन पता चलता है। 10 दिन का समय और प्रतिनिधि के जरिए दस्तावेज जमा करने की छूट एक व्यावहारिक समाधान है। अब जिम्मेदारी प्रशासन की है कि वे कोर्ट के आदेश का अक्षरशः पालन करें और जनता को जागरूक करें ताकि कोई भी पात्र मतदाता अपने अधिकार से वंचित न रह जाए।
