केरल का मलयालम भाषा विधेयक 2025: गलतफहमी, राजनीति और भाषाई अधिकार
मलयालम को बढ़ावा देने की कोशिश पर अंतर-राज्य विवाद
भारत में भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि पहचान, संस्कृति और राजनीति का भी अहम आधार रही है। राज्यों का भाषाई पुनर्गठन इसी सोच से हुआ था कि प्रशासन और शिक्षा आम लोगों की मातृभाषा में अधिक प्रभावी हो सकती है। हालांकि, समय के साथ प्रवासन, शहरीकरण और आर्थिक अवसरों ने राज्यों को बहुभाषी समाज में बदल दिया है।
इसी संदर्भ में केरल विधानसभा द्वारा पारित मलयालम भाषा विधेयक, 2025 को देखा जाना चाहिए। इस विधेयक का उद्देश्य मलयालम भाषा को राज्य की आधिकारिक भाषा के रूप में सशक्त बनाना और शिक्षा, प्रशासन, न्यायपालिका से लेकर आईटी जैसे क्षेत्रों में इसके इस्तेमाल को बढ़ावा देना है। लेकिन इस पहल पर कर्नाटक के कुछ नेताओं की ओर से आपत्ति जताई गई है, खासकर तमिल और कन्नड़ भाषी अल्पसंख्यकों पर इसके संभावित प्रभाव को लेकर।
विधेयक के उद्देश्य और प्रावधान
विधेयक स्पष्ट रूप से कहता है कि यह “भारत के संविधान के प्रावधानों के तहत” मलयालम को केरल की आधिकारिक भाषा के रूप में अपनाने और उसके समग्र विकास के लिए है। इसमें स्कूली शिक्षा में मलयालम को पहली भाषा के रूप में बढ़ावा देने, सरकारी कामकाज में इसके इस्तेमाल और तकनीकी व न्यायिक क्षेत्रों में भाषा के विस्तार की बात की गई है।
साथ ही, यह विधेयक भाषाई अल्पसंख्यकों के अधिकारों को भी मान्यता देता है। अधिसूचित क्षेत्रों में तमिल और कन्नड़ भाषी नागरिक राज्य सचिवालय, विभागाध्यक्षों और स्थानीय कार्यालयों से अपनी भाषाओं में पत्राचार कर सकते हैं और जवाब भी उन्हीं भाषाओं में दिए जाने का प्रावधान है। शिक्षा के क्षेत्र में भी गैर-मलयालम मातृभाषा वाले विद्यार्थियों को राष्ट्रीय शिक्षा पाठ्यचर्या के अनुरूप अन्य भाषाओं में पढ़ने की सुविधा दी गई है।
इसके अतिरिक्त, केरल में पढ़ रहे अन्य राज्यों या विदेशी छात्रों को नौवीं, दसवीं और उच्च माध्यमिक स्तर पर मलयालम की परीक्षा से छूट का प्रावधान पहले से मौजूद है। यह दिखाता है कि विधेयक किसी एक भाषा को थोपने के बजाय व्यावहारिक संतुलन बनाने की कोशिश करता है।
कर्नाटक का विरोध: चिंता या गलतफहमी
कर्नाटक के कुछ नेताओं ने आशंका जताई है कि यह विधेयक केरल में रहने वाले कन्नड़ और तमिल भाषी अल्पसंख्यकों के अधिकारों को कमजोर कर सकता है। लेकिन विधेयक के प्रावधानों को ध्यान से देखने पर यह चिंता काफी हद तक गलतफहमी पर आधारित लगती है।
भारत का संविधान अल्पसंख्यकों को अपनी भाषा, लिपि और संस्कृति के संरक्षण का अधिकार देता है। केरल का यह कानून इन अधिकारों से टकराता नहीं दिखता। इसके उलट, यह आधिकारिक तौर पर यह स्वीकार करता है कि राज्य में बहुभाषी समुदाय रहते हैं और उनके लिए प्रशासनिक सुविधा बनाए रखना जरूरी है।
केंद्र–राज्य और भाषा की राजनीति
दिलचस्प बात यह है कि इस विधेयक का एक पुराना संस्करण 2015 में पारित होने के बावजूद लगभग एक दशक तक केंद्र की मंजूरी के इंतजार में रहा। सुप्रीम कोर्ट के इस निर्देश के बाद कि विधेयकों को अनिश्चितकाल तक लंबित नहीं रखा जा सकता, केंद्र ने इसे वापस भेजा, जिसके बाद राज्य ने नया संस्करण पारित किया।
आधिकारिक रूप से केंद्र सरकार की नीति सभी भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देने की रही है। ऐसे में, जब कोई राज्य अपनी भाषा को मजबूत करने की कोशिश करता है और साथ ही अल्पसंख्यक भाषाओं की सुरक्षा के उपाय भी करता है, तो उस पर आपत्ति का आधार कमजोर पड़ता है।
बहुभाषी भारत की वास्तविकता
केरल और कर्नाटक, दोनों ही बहुभाषी राज्य हैं। भाषाई पुनर्गठन कभी भी पूरी तरह सटीक नहीं रहा और प्रवासन ने इन सीमाओं को और धुंधला कर दिया है। ऐसे में भाषा नीति को किसी एक भाषा के वर्चस्व या हिंदी-केंद्रित सांस्कृतिक एजेंडे के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
वास्तविक चुनौती यह है कि सभी भाषाओं को प्रशासन और सार्वजनिक जीवन में सम्मानजनक स्थान मिले, बिना समुदायों के बीच तनाव पैदा किए। इसके लिए संवाद और सहयोग जरूरी है, न कि आशंकाओं के आधार पर विरोध।
निष्कर्ष
मलयालम भाषा विधेयक 2025 को भाषाई असहिष्णुता के चश्मे से देखने के बजाय संवैधानिक अधिकारों और संघीय ढांचे के संदर्भ में समझना होगा। यह विधेयक मलयालम को सशक्त करने का प्रयास है, न कि अन्य भाषाओं को हाशिये पर डालने का।
अंतर-राज्य परिषद जैसी संस्थाओं को सक्रिय कर राज्यों के बीच भाषाई और सांस्कृतिक मुद्दों पर संवाद बढ़ाया जाना चाहिए। यही रास्ता भारत की भाषाई विविधता को ताकत में बदल सकता है, न कि विवाद का कारण।
हमारी राय
भारत की भाषाई विविधता उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी सबसे बड़ी शक्ति है। केरल का मलयालम भाषा विधेयक उसी आत्मविश्वास को दर्शाता है। जब तक भाषा नीति समावेशी और संवैधानिक दायरे में है, उसे राजनीतिक विवाद का विषय बनाने के बजाय संवाद के जरिए समझा जाना चाहिए।
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