Indore Water Contamination Case: हाईकोर्ट ने सरकार को फटकारा, मुख्य सचिव को तलब किया, प्रशासनिक जवाबदेही पर बड़ा सवाल PTI via The wire
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने भागीरथपुरा इलाके में दूषित पानी से हुई मौतों के मामले में राज्य सरकार, नगर निगम और जिला प्रशासन के रवैये पर तीखी नाराज़गी जताई है। मंगलवार (6 जनवरी) को हुई सुनवाई के दौरान अदालत ने पूरे घटनाक्रम को बेहद गंभीर बताते हुए प्रशासनिक प्रतिक्रिया को “असंवेदनशील” करार दिया। कोर्ट ने कहा कि जिस इंदौर को देश का सबसे स्वच्छ शहर बताया जाता है, वहां इस तरह की घटना अपने आप में चिंताजनक और चौंकाने वाली है।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने नगर निगम और जिला प्रशासन द्वारा दाखिल स्टेटस रिपोर्ट पर भी सवाल उठाए। अदालत ने स्पष्ट कहा कि मृतकों की संख्या को लेकर तकनीकी या सीमित जानकारी देने से मामले की गंभीरता कम नहीं हो जाती। यह सिर्फ आंकड़ों का विषय नहीं, बल्कि नागरिकों के जीवन और स्वास्थ्य से जुड़ा मामला है। कोर्ट ने संकेत दिए कि वह यह तय करेगी कि इसे महज प्रशासनिक लापरवाही माना जाए या फिर किसी स्तर पर आपराधिक जिम्मेदारी भी तय की जाए।
मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने मध्य प्रदेश सरकार के मुख्य सचिव को 15 जनवरी को व्यक्तिगत रूप से अदालत में पेश होने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने साफ कहा कि इस मामले में शीर्ष स्तर पर जवाबदेही तय होना जरूरी है और यह केवल निचले अधिकारियों तक सीमित नहीं रह सकता। अदालत ने यह भी दोहराया कि हर नागरिक को स्वच्छ पेयजल और समय पर उचित इलाज मिलना सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारी है।
मौतों का आंकड़ा और मौजूदा स्थिति
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इंदौर में अब तक दूषित पानी पीने से 17 लोगों की मौत हो चुकी है। फिलहाल 110 मरीज विभिन्न अस्पतालों में भर्ती हैं, जिनमें से 15 की हालत गंभीर बनी हुई है और उनका इलाज आईसीयू में चल रहा है। दूषित पानी का मामला सामने आने के बाद से कुल 421 मरीज अस्पतालों में भर्ती कराए गए थे, जिनमें से 311 को उपचार के बाद छुट्टी दी जा चुकी है।
पिछले 24 घंटों में उल्टी-दस्त के 38 नए मामले सामने आए हैं, जिनमें से छह मरीजों को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। यह आंकड़े साफ तौर पर दिखाते हैं कि स्थिति अब भी पूरी तरह नियंत्रण में नहीं आई है।
जांच रिपोर्ट में यह सामने आया है कि भागीरथपुरा इलाके में नर्मदा जल आपूर्ति की पाइपलाइन में ड्रेनेज लाइन का पानी मिल गया था। इंदौर नगर निगम को सौंपी गई रिपोर्ट के अनुसार, क्षेत्र से लिए गए पानी के नमूनों में से करीब एक-तिहाई में बैक्टीरियल संक्रमण पाया गया है।
एसडीएम निलंबन से प्रशासनिक विवाद
इस पूरे घटनाक्रम के बीच उज्जैन जिले के एसडीएम आनंद मालवीय का निलंबन भी चर्चा में है। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, यह कार्रवाई कैबिनेट मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के विवादास्पद ‘घंटा’ वाले बयान से जुड़े मामले में हुई है। एसडीएम ने कांग्रेस के विरोध प्रदर्शन के संदर्भ में जारी आदेश में इस बयान को “अमानवीय और तानाशाही व्यवहार” की निशानी बताया था।
जब यह आदेश सार्वजनिक हुआ तो विवाद खड़ा हो गया। बाद में एसडीएम मालवीय ने सफाई दी कि आदेश के कुछ हिस्से कांग्रेस पार्टी के व्हाट्सएप ग्रुप से कॉपी हो गए थे और गलती का पता चलने पर उन्होंने पुराना आदेश वापस लेकर नया आदेश जारी कर दिया था। इसके बावजूद 5 जनवरी को उज्जैन संभाग के कमिश्नर ने उन्हें मध्य प्रदेश सिविल सेवा (आचरण) नियम, 1965 के तहत कदाचार मानते हुए निलंबित कर दिया।
यह घटनाक्रम प्रशासनिक तंत्र के भीतर असमंजस और दबाव की स्थिति को भी उजागर करता है, जहां एक ओर स्वास्थ्य संकट है तो दूसरी ओर राजनीतिक बयानबाज़ी और कार्रवाई का दबाव।
मानवाधिकार आयोग की दखल
इस मामले की गंभीरता को देखते हुए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने भी संज्ञान लिया है। नए साल के पहले दिन आयोग ने मध्य प्रदेश के मुख्य सचिव अनुराग जैन को नोटिस जारी कर दो सप्ताह के भीतर विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। एनएचआरसी का नोटिस इस बात का संकेत है कि मामला अब सिर्फ राज्य स्तर तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राष्ट्रीय संस्थाएं भी इस पर नजर रखे हुए हैं।
हमारी राय
इंदौर का यह मामला प्रशासनिक लापरवाही, ढांचागत कमजोरियों और जवाबदेही की कमी का गंभीर उदाहरण है। “स्वच्छता में नंबर वन” जैसे तमगों के पीछे छिपी वास्तविकता तब सामने आती है, जब बुनियादी सेवाएं—जैसे स्वच्छ पानी—नागरिकों को उपलब्ध नहीं हो पातीं। हाईकोर्ट का सख्त रुख इस बात का संकेत है कि अब केवल औपचारिक रिपोर्ट और आंकड़ों से काम नहीं चलेगा।
हमारी राय में, इस त्रासदी की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच के साथ-साथ स्पष्ट जिम्मेदारी तय होना जरूरी है। यदि केवल निचले स्तर के अधिकारियों पर कार्रवाई कर दी गई और नीतिगत या ढांचागत खामियों को नजरअंदाज किया गया, तो ऐसी घटनाएं दोबारा हो सकती हैं। स्वच्छ पानी कोई सुविधा नहीं, बल्कि मौलिक अधिकार है। सरकार और प्रशासन को यह समझना होगा कि संवेदनशीलता, पारदर्शिता और त्वरित कार्रवाई ही जनता का भरोसा बहाल कर सकती है।
