शराब घोटाले में सौम्या चौरसिया को 'डबल झटका'—हाई कोर्ट ने कहा 'नो बेल', ACB और EOW की दलीलों के आगे नहीं चली वकीलों की एक न
बिलासपुर/रायपुर,[दिनांक: 13 जनवरी 2026 — छत्तीसगढ़ की राजनीति और नौकरशाही में कभी रसूख का दूसरा नाम मानी जाने वाली राज्य प्रशासनिक सेवा की अधिकारी सौम्या चौरसिया (Saumya Chaurasia) की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। पहले कोयला लेवी घोटाला और अब बहुचर्चित शराब घोटाले (Liquor Scam) ने उन्हें कानूनी भंवर में फंसा दिया है। मंगलवार को छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट (Bilaspur High Court) से उन्हें एक तगड़ा झटका लगा है। कोर्ट की सिंगल बेंच ने मामले की गंभीरता को देखते हुए उनकी अग्रिम जमानत याचिका (Anticipatory Bail Plea) को सिरे से खारिज कर दिया है।
यह फैसला पूर्ववर्ती सरकार के कार्यकाल में हुए कथित भ्रष्टाचार की जांच कर रही एजेंसियों—एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) और इकोनॉमिक ऑफेंस विंग (EOW)—के लिए एक बड़ी जीत मानी जा रही है। हाई कोर्ट का यह रुख स्पष्ट करता है कि आर्थिक अपराधों में लिप्त रसूखदारों को अब आसानी से राहत मिलने वाली नहीं है।
हाई कोर्ट में क्या हुआ? दलीलों का 'दंगल'
हाई कोर्ट की सिंगल बेंच के समक्ष हुई सुनवाई के दौरान माहौल काफी तनावपूर्ण रहा। सौम्या चौरसिया के वकीलों ने गिरफ्तारी से राहत के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाया, लेकिन जांच एजेंसियों की तैयारी पूरी थी।
- बचाव पक्ष: चौरसिया की ओर से दलील दी गई कि उन्हें राजनीतिक द्वेष के कारण निशाना बनाया जा रहा है और वे जांच में सहयोग करने को तैयार हैं, इसलिए उन्हें अग्रिम जमानत दी जाए।
- एजेंसियों का विरोध: वहीं, एसीबी और ईओडब्ल्यू ने इस याचिका का कड़ा विरोध किया। उन्होंने कोर्ट को बताया कि 2,000 करोड़ रुपये से अधिक के इस घोटाले में सौम्या चौरसिया की भूमिका केवल औपचारिक नहीं, बल्कि 'निर्णायक' रही है।
- कोर्ट का फैसला: दोनों पक्षों को सुनने के बाद कोर्ट ने माना कि मामला 'गंभीर प्रकृति' (Serious Nature) का है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि आरोपी को इस चरण में अग्रिम जमानत देने से जांच प्रभावित (Tampering with Evidence) हो सकती है और गवाहों पर दबाव बनाया जा सकता है। इसी आधार पर याचिका खारिज कर दी गई।
कोयले के बाद शराब: मुश्किलों का 'सिंडिकेट'
सौम्या चौरसिया के लिए यह झटका इसलिए भी बड़ा है क्योंकि वे पहले से ही कोयला लेवी घोटाले (Coal Levy Scam) में जेल की हवा खा चुकी हैं और आरोपी हैं। अब शराब घोटाले में नाम आने से उन पर कानूनी शिकंजा और कस गया है।
2000 करोड़ का खेल: जांच एजेंसियों के मुताबिक, छत्तीसगढ़ में शराब घोटाला एक संगठित अपराध की तरह चलाया गया।
- सिंडिकेट मॉडल: ईडी (ED) और ईओडब्ल्यू की जांच में सामने आया है कि यह घोटाला एक 'सिंडिकेट' के जरिए अंजाम दिया गया। इसमें तत्कालीन सरकार के प्रभावशाली अफसरों, राजनेताओं और शराब कारोबारियों का एक नेक्सस काम कर रहा था।
- मोडस ऑपरेंडी: आरोप है कि सरकारी दुकानों से अवैध शराब बेची गई और उसका राजस्व सरकारी खजाने में जाने के बजाय सीधे सिंडिकेट की जेब में गया। इसमें डिस्टिलरीज से लेकर ट्रांसपोर्टर तक सब शामिल थे।
ED की एंट्री और गिरफ्तारी की टाइमलाइन
इस मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ED) की भूमिका धुरी की तरह रही है।
- 16 दिसंबर: ईडी ने 16 दिसंबर को सौम्या चौरसिया को पूछताछ के लिए बुलाया था। लंबी पूछताछ के बाद उसी शाम उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था, क्योंकि वे पैसों के लेन-देन (Money Trail) को लेकर संतोषजनक जवाब नहीं दे पाई थीं।
- एफआईआर: ईडी ने एसीबी में एक विस्तृत एफआईआर दर्ज कराई थी, जिसमें चौरसिया समेत कई बड़े नामों का जिक्र था। इसी एफआईआर के आधार पर अब राज्य की एजेंसियां भी सक्रिय हो गई हैं।
जांच एजेंसियों की सक्रियता: अब क्या होगा आगे?
हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद यह तय माना जा रहा है कि एसीबी और ईओडब्ल्यू अब सौम्या चौरसिया को रिमांड पर लेने की कोशिश करेंगी। जांच का दायरा अब उन 'सफेदपोशों' तक भी बढ़ सकता है जो अब तक पर्दे के पीछे थे। सूत्रों के अनुसार, एजेंसियों के पास डिजिटल सबूत और गवाहों के बयान हैं जो यह स्थापित करते हैं कि प्रशासनिक फैसलों को प्रभावित करने में चौरसिया की भूमिका अहम थी।
हमारी राय (The Trending People Analysis)
सौम्या चौरसिया की जमानत खारिज होना यह साबित करता है कि कानून के हाथ वाकई लंबे होते हैं, चाहे आरोपी कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो। एक अधिकारी, जिसका काम सिस्टम की रक्षा करना था, अगर वही सिस्टम को लूटने वाले सिंडिकेट का हिस्सा बन जाए, तो यह लोकतंत्र के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है।
The Trending People का विश्लेषण है कि यह मामला छत्तीसगढ़ की प्रशासनिक मशीनरी में फैले भ्रष्टाचार की गहराई को उजागर करता है। हाई कोर्ट का फैसला जांच एजेंसियों के मनोबल को बढ़ाएगा। अब चुनौती यह है कि जांच को तार्किक परिणति तक पहुंचाया जाए और लूटी गई पाई-पाई की वसूली की जाए। यह केवल एक व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई नहीं है, बल्कि यह संदेश है कि 'भ्रष्टाचार का नशा' देर-सवेर उतरता जरूर है।
