क्या आप जानते हैं टाइप 1.5 के बारे में? सही पहचान न होने पर बन सकती है जानलेवा
नई दिल्ली, दिनांक: 29 जनवरी 2026 — डायबिटीज (Diabetes) आज के दौर में एक वैश्विक महामारी बन चुकी है। दुनियाभर में करोड़ों लोग इस बीमारी के साथ जी रहे हैं और भारत को तो पहले ही 'डायबिटीज की राजधानी' कहा जाने लगा है। आम तौर पर जब भी शुगर की बीमारी की बात होती है, तो लोगों के जेहन में सिर्फ दो ही प्रकार आते हैं—टाइप 1 और टाइप 2 डायबिटीज। लेकिन क्या आपने कभी 'टाइप 1.5 डायबिटीज' के बारे में सुना है? यह नाम सुनने में थोड़ा अजीब जरूर लग सकता है, लेकिन चिकित्सा जगत में यह एक गंभीर चर्चा का विषय बना हुआ है। डॉक्टरों की मानें तो यह एक ऐसी जटिल अवस्था है जिसमें टाइप 1 और टाइप 2 दोनों के लक्षण मिले-जुले होते हैं, जिसके कारण इसे सही डायग्नोज (पहचान) करना बेहद मुश्किल हो जाता है। सही जानकारी और इलाज के अभाव में यह स्थिति मरीज के लिए जानलेवा साबित हो सकती है।
टाइप 1.5 डायबिटीज को मेडिकल भाषा में 'लेटेंट ऑटोइम्यून डायबिटीज इन अडल्ट्स' यानी LADA कहा जाता है। क्लीवलैंड क्लीनिक की रिपोर्ट के मुताबिक, यह एक ऑटोइम्यून बीमारी है, जिसका मतलब है कि इसमें शरीर का अपना ही इम्यून सिस्टम गलती से पैंक्रियास (अग्न्याशय) की इंसुलिन बनाने वाली बीटा कोशिकाओं को दुश्मन मानकर नष्ट करने लगता है। यह प्रक्रिया टाइप 1 डायबिटीज जैसी ही है, लेकिन इसमें एक बड़ा फर्क है। टाइप 1 में बीटा कोशिकाओं के नष्ट होने की रफ्तार बहुत तेज होती है और यह अक्सर बचपन या किशोरावस्था में ही सामने आ जाती है। इसके विपरीत, टाइप 1.5 में यह प्रक्रिया बहुत धीमी गति से होती है। यही कारण है कि इस बीमारी की शुरुआत में शरीर थोड़ा-बहुत इंसुलिन बनाता रहता है और मरीज को कई महीनों या कभी-कभी सालों तक इंसुलिन के इंजेक्शन की जरूरत नहीं पड़ती।
इस बीमारी की सबसे बड़ी चुनौती इसकी पहचान यानी डायग्नोसिस है। चूंकि इसके लक्षण आमतौर पर 30 से 50 साल की उम्र के बीच प्रकट होते हैं, जो कि टाइप 2 डायबिटीज की भी सामान्य उम्र है, इसलिए अक्सर डॉक्टर भी धोखा खा जाते हैं। शुरुआत में मरीजों को अत्यधिक प्यास लगना, बार-बार पेशाब आना, अचानक वजन कम होना, थकान महसूस होना और धुंधला दिखाई देने जैसी समस्याएं होती हैं। ये सभी लक्षण टाइप 2 डायबिटीज से हूबहू मिलते हैं। नतीजतन, कई बार डॉक्टर इसे टाइप 2 मानकर इलाज शुरू कर देते हैं और मरीज को खाने की दवाइयां (Oral Medication) देते रहते हैं। मरीज को कुछ समय के लिए आराम भी मिलता है, लेकिन धीरे-धीरे दवाइयां असर करना बंद कर देती हैं क्योंकि शरीर में इंसुलिन का बनना लगभग खत्म हो जाता है।
हेल्थ एक्सपर्ट्स का कहना है कि जब कोई मरीज, विशेषकर जो दुबला-पतला हो और उसे कम उम्र में डायबिटीज हो जाए, अगर डाइट, एक्सरसाइज और मेटफॉर्मिन जैसी दवाओं से भी अपनी शुगर कंट्रोल नहीं कर पा रहा है, तो यह LADA का संकेत हो सकता है। ऐसी स्थिति में सही पहचान के लिए विशेष ब्लड टेस्ट की जरूरत होती है। सबसे प्रमुख है GAD Antibody Test, जिससे यह पता चलता है कि शरीर में ऑटोइम्यून एंटीबॉडी मौजूद हैं या नहीं। इसके अलावा, C-Peptide Test से यह जांचा जाता है कि पैंक्रियास वास्तव में कितना इंसुलिन बना रहा है। इन टेस्ट के नतीजे ही यह साफ करते हैं कि मरीज को टाइप 2 नहीं, बल्कि टाइप 1.5 डायबिटीज है।
इलाज के नजरिए से देखें तो LADA का प्रबंधन थोड़ा चुनौतीपूर्ण होता है। शुरुआत में भले ही ओरल दवाओं से काम चल जाए, लेकिन समय के साथ-साथ पैंक्रियास की इंसुलिन बनाने की क्षमता खत्म होने लगती है और आखिरकार मरीज को जीवित रहने के लिए इंसुलिन इंजेक्शन पर निर्भर होना पड़ता है। कई विशेषज्ञ मानते हैं कि LADA के मरीजों में जल्दी इंसुलिन थेरेपी शुरू करने से पैंक्रियास की बची-खुची कोशिकाओं को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है। अगर सही समय पर इलाज न मिले और शुगर लेवल अनियंत्रित रहे, तो यह स्थिति बेहद खतरनाक हो सकती है। इससे किडनी डैमेज, आंखों की रोशनी जाना (Retinopathy), नर्व डैमेज (Neuropathy) और डायबिटिक कीटोएसिडोसिस (DKA) जैसी जानलेवा जटिलताएं पैदा हो सकती हैं।
हमारी राय (The Trending People Analysis)
डायबिटीज की दुनिया में टाइप 1.5 एक 'छिपा हुआ दुश्मन' है। जागरूकता की कमी के कारण हजारों मरीज गलत इलाज का शिकार होते रहते हैं। यह बीमारी हमें सिखाती है कि हर डायबिटीज का केस एक जैसा नहीं होता।
The Trending People का विश्लेषण है कि अगर आप या आपके परिवार में कोई डायबिटीज का मरीज है जो स्वस्थ जीवनशैली और दवाओं के बावजूद अपने शुगर लेवल को नियंत्रित नहीं कर पा रहा है, तो उसे एक बार LADA की जांच जरूर करानी चाहिए। सही डायग्नोसिस ही सही इलाज की पहली सीढ़ी है। चिकित्सा विज्ञान लगातार तरक्की कर रहा है और अब समय आ गया है कि हम डायबिटीज को केवल 'शुगर की बीमारी' न मानकर इसके सूक्ष्म प्रकारों को समझें ताकि कीमती जानें बचाई जा सकें।
