India–US Trade Deal Row: मोदी के फोन न करने से अटका समझौता? अमेरिकी मंत्री का बड़ा दावा
भारत और अमेरिका के बीच लंबे समय से चर्चा में चल रहे द्विपक्षीय व्यापार समझौते को लेकर अब एक नया विवाद सामने आ गया है। अमेरिका के वाणिज्य मंत्री हॉवर्ड लुटनिक ने दावा किया है कि यह समझौता इसलिए पूरा नहीं हो सका क्योंकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को फोन नहीं किया। लुटनिक ने यह बयान बृहस्पतिवार को चर्चित ‘ऑल-इन पॉडकास्ट’ में दिया, जिसके बाद भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों को लेकर बहस तेज हो गई है।
हॉवर्ड लुटनिक ने पॉडकास्ट में बातचीत के दौरान बताया कि ट्रंप प्रशासन व्यापार समझौतों को एक तय रणनीति और समयसीमा के तहत करता है। उन्होंने कहा कि जो देश पहले बातचीत पूरी कर लेते हैं, उन्हें बेहतर शर्तें मिलती हैं, जबकि देर करने वालों को नुकसान उठाना पड़ता है। इसी प्रक्रिया में भारत कथित तौर पर पीछे रह गया।
‘पहले आओ, पहले पाओ’ की ट्रंप नीति
लुटनिक ने कहा कि ब्रिटेन के साथ अमेरिका का पहला व्यापार समझौता इसी नीति के तहत हुआ था। ब्रिटेन को स्पष्ट रूप से बताया गया था कि उसे दो शुक्रवार के भीतर समझौता पूरा करना होगा, क्योंकि उसके बाद अमेरिका अन्य देशों के साथ सौदे आगे बढ़ाने वाला था। उनके शब्दों में, “जो पहले चरण में समझौता करता है, उसे सबसे बेहतरीन शर्तें मिलती हैं।”
उन्होंने बताया कि ब्रिटेन के साथ डील के बाद जब लोगों ने पूछा कि अगला देश कौन होगा, तो राष्ट्रपति ट्रंप ने कई बार सार्वजनिक रूप से भारत का नाम लिया। अमेरिका को उम्मीद थी कि भारत भी तय समयसीमा के भीतर समझौता पूरा कर लेगा।
‘तीन शुक्रवार’ और मोदी का फोन
हॉवर्ड लुटनिक के मुताबिक, अमेरिका ने भारत से साफ कहा था कि उसके पास तीन शुक्रवार हैं और इस अवधि में सौदे को अंतिम रूप देना होगा। उन्होंने कहा कि तकनीकी और नीतिगत स्तर पर बातचीत लगभग पूरी हो चुकी थी, लेकिन अंतिम राजनीतिक मंजूरी के लिए ट्रंप सीधे प्रधानमंत्री मोदी से बात चाहते थे।
लुटनिक ने कहा, “मैंने भारत से कहा कि सब कुछ तय है, लेकिन यह ट्रंप का समझौता है। अंतिम फैसला वही लेते हैं। इसलिए मोदी को राष्ट्रपति ट्रंप को फोन करना होगा।”
उनका दावा है कि भारत को इस तरह की सीधी राजनीतिक पहल में असहजता महसूस हुई और प्रधानमंत्री मोदी ने फोन नहीं किया।
भारत पीछे कैसे रह गया
अमेरिकी मंत्री के अनुसार, तय समयसीमा खत्म होने के बाद अमेरिका ने इंडोनेशिया, फिलीपींस और वियतनाम जैसे देशों के साथ व्यापार समझौतों की घोषणा कर दी। अमेरिका को यह उम्मीद थी कि भारत इन देशों से पहले सौदा पूरा कर लेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
लुटनिक ने कहा कि जब बाद में भारत ने संपर्क किया और कहा कि वह समझौते के लिए तैयार है, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। उन्होंने प्रतीकात्मक अंदाज में कहा, “क्या आप उस ट्रेन को पकड़ने के लिए तैयार हैं जो तीन हफ्ते पहले स्टेशन से निकल चुकी है?”
उनके मुताबिक, इसी देरी के कारण भारत को अब ऊंची दरों और कम अनुकूल शर्तों पर बातचीत करनी पड़ रही है।
ट्रंप का रूस और टैरिफ वाला संकेत
लुटनिक का यह बयान ऐसे समय आया है, जब हाल ही में राष्ट्रपति ट्रंप ने यह भी कहा था कि प्रधानमंत्री मोदी जानते थे कि अमेरिका भारत द्वारा रूसी तेल खरीदने से नाखुश है। ट्रंप ने संकेत दिया था कि अमेरिका कभी भी भारत पर शुल्क (टैरिफ) बढ़ा सकता है।
गौरतलब है कि भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते को लेकर अब तक छह दौर की बातचीत हो चुकी है। इस समझौते का एक अहम मुद्दा अमेरिका में प्रवेश करने वाले भारतीय उत्पादों पर लगने वाला 50 प्रतिशत तक का शुल्क है, जिसके समाधान के लिए ढांचागत समझौते की कोशिश की जा रही है।
कूटनीति बनाम कारोबारी स्टाइल
अमेरिकी मंत्री के बयान से साफ झलकता है कि ट्रंप प्रशासन व्यापार समझौतों को एक कारोबारी डील की तरह देखता है, जहां समय, दबाव और व्यक्तिगत नेतृत्व की भूमिका अहम होती है। वहीं भारत की कूटनीति आमतौर पर संस्थागत और औपचारिक प्रक्रियाओं पर आधारित रही है, जिसमें ऐसे सीधे राजनीतिक फोन कॉल्स को प्राथमिकता नहीं दी जाती।
यही फर्क दोनों देशों के बीच इस समझौते के अटकने की बड़ी वजह बताया जा रहा है।
Our Thoughts
भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर हॉवर्ड लुटनिक का बयान कई सवाल खड़े करता है। अगर यह दावा सही है, तो यह दर्शाता है कि ट्रंप प्रशासन व्यक्तिगत नेतृत्व और दबाव की राजनीति को कितनी अहमियत देता है। दूसरी ओर, भारत का सतर्क और संस्थागत दृष्टिकोण उसे कभी-कभी नुकसान की स्थिति में भी ला सकता है।
हालांकि, यह भी सच है कि ऐसे बयान अक्सर दबाव बनाने की रणनीति का हिस्सा होते हैं। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि क्या दोनों देश फिर से किसी मध्य रास्ते पर पहुंचते हैं या यह मुद्दा भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों में एक स्थायी दरार बन जाता है।
