असम में 'लैंड जिहाद' पर हिमंत सरकार का प्रहार—हिंदू-मुस्लिम के बीच अब सीधे नहीं बिकेगी जमीन, डीसी की 'एनओसी' बिना नहीं होगी रजिस्ट्री
गुवाहाटी/नई दिल्ली, दिनांक: 15 जनवरी 2026 — पूर्वोत्तर के प्रहरी माने जाने वाले असम (Assam) राज्य से एक ऐसा फैसला आया है, जिसने देश भर में एक नई कानूनी और सामाजिक बहस छेड़ दी है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा (Himanta Biswa Sarma) के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने राज्य की बदलती जनसांख्यिकी (Demography) को रोकने और मूल निवासियों के अधिकारों की रक्षा के लिए भूमि हस्तांतरण के नियमों में एक ऐतिहासिक और कड़ा बदलाव लागू कर दिया है।
इस नए कानून के तहत, अब असम में दो अलग-अलग धर्मों के लोगों (जैसे हिंदू और मुस्लिम) के बीच जमीन की खरीद-बिक्री सीधी और तत्काल नहीं हो सकेगी। सरकार ने ऐसे सौदों पर प्रशासन का पहरा बिठा दिया है। इस फैसले के पीछे सरकार का तर्क है कि राज्य में कथित 'लैंड जिहाद' (Land Jihad) के जरिए एक विशेष समुदाय द्वारा सुनियोजित तरीके से जमीनें कब्जाने और जनसांख्यिकीय संतुलन बिगाड़ने की साजिश चल रही है, जिसे रोकना अब अस्तित्व का प्रश्न बन गया है।
क्या है नया नियम? 'धर्म' देखकर होगी रजिस्ट्री
असम सरकार की नई अधिसूचना ने जमीन के सौदे की प्रक्रिया को पूरी तरह बदल दिया है।
- अनिवार्य मंजूरी: नए नियमों के मुताबिक, यदि खरीदार और विक्रेता अलग-अलग धर्मों (Inter-faith) के हैं, तो वे सीधे सब-रजिस्ट्रार ऑफिस जाकर रजिस्ट्री नहीं करा सकते। उन्हें पहले संबंधित जिले के उपायुक्त (Deputy Commissioner - DC) या जिला मजिस्ट्रेट से औपचारिक और लिखित मंजूरी लेनी होगी।
- जांच का दायरा: आवेदन मिलने के बाद जिला प्रशासन यह जांच करेगा कि क्या यह सौदा आपसी सहमति से हो रहा है या किसी दबाव, डर या लालच में। प्रशासन को यह अधिकार होगा कि अगर उन्हें सौदे में कोई गड़बड़ी या सामाजिक तनाव की आशंका लगती है, तो वे इसे रद्द कर सकते हैं।
छूट: हालांकि, सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह नियम एक ही धर्म के लोगों के बीच होने वाली खरीद-बिक्री पर लागू नहीं होगा। यानी हिंदू-हिंदू या मुस्लिम-मुस्लिम के बीच सौदे पहले की तरह सामान्य प्रक्रिया से होते रहेंगे।
क्यों पड़ी इस कानून की जरूरत? (सरकार का तर्क)
हिमंत बिस्वा सरमा सरकार ने इस कठोर कदम के पीछे राज्य की सुरक्षा और मूल निवासियों (Indigenous People) के हितों का हवाला दिया है।
- डेमोग्राफी में बदलाव: सरकार का कहना है कि बांग्लादेशी घुसपैठ और अवैध प्रवासन के कारण असम के कई जिलों—विशेषकर धुबरी, बारपेटा, नगांव और गोलपारा—में जनसंख्या संतुलन पूरी तरह बिगड़ चुका है। मूल निवासी अल्पसंख्यक होते जा रहे हैं।
- जबरन बिक्री: खुफिया रिपोर्ट्स और शिकायतों के आधार पर सरकार का दावा है कि कई इलाकों में बहुसंख्यक समुदाय द्वारा अल्पसंख्यक हिंदू या आदिवासी परिवारों को डरा-धमकाकर या ऊंची कीमतों का लालच देकर उनकी जमीनें खरीदी जा रही हैं, ताकि उन्हें वहां से पलायन करने पर मजबूर किया जा सके। इसे ही भाजपा नेता 'लैंड जिहाद' की संज्ञा दे रहे हैं।
- स्वदेशी सुरक्षा: सरकार का मानना है कि जमीन केवल संपत्ति नहीं, बल्कि पहचान है। अगर जमीन चली गई, तो असमिया संस्कृति और अस्तित्व भी खतरे में पड़ जाएगा।
विपक्ष और कानूनी पेच: क्या यह भेदभाव है?
इस फैसले पर विवाद भी गहरा गया है। विपक्षी दलों और कुछ कानूनविदों ने इसे संविधान के अनुच्छेद 15 (धर्म के आधार पर भेदभाव का निषेध) और संपत्ति के अधिकार का उल्लंघन बताया है।
- आलोचना: आलोचकों का कहना है कि यह कानून एक समुदाय विशेष (मुस्लिमों) को निशाना बनाने और उन्हें संपत्ति के अधिकारों से वंचित करने के लिए लाया गया है। इससे नौकरशाही का हस्तक्षेप बढ़ेगा और भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिल सकता है, क्योंकि मंजूरी के लिए अब डीसी ऑफिस के चक्कर काटने होंगे।
- सामाजिक ताना-बाना: सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या सरकार नागरिकों को धर्म के चश्मे से देख रही है? क्या एक भारतीय नागरिक देश के किसी भी हिस्से में (वंचित क्षेत्रों को छोड़कर) जमीन खरीदने के लिए स्वतंत्र नहीं है?
पूर्वोत्तर पर असर: क्या दूसरे राज्य भी अपनाएंगे यह मॉडल?
असम के इस कदम की गूंज पूरे पूर्वोत्तर भारत (North East) में सुनाई दे रही है। पूर्वोत्तर के कई राज्यों (जैसे नागालैंड, मिजोरम, अरुणाचल) में पहले से ही 'इनर लाइन परमिट' (ILP) और अनुच्छेद 371 के तहत जमीन की सुरक्षा के कड़े कानून हैं, जहां बाहरी लोग जमीन नहीं खरीद सकते। लेकिन असम में, जहां ऐसी सुरक्षा हर जगह लागू नहीं थी, यह नया कानून एक 'ढाल' का काम करेगा। माना जा रहा है कि घुसपैठ की समस्या से जूझ रहे अन्य राज्य भी इस मॉडल का अध्ययन कर सकते हैं।
हमारी राय (The Trending People Analysis)
असम सरकार का यह फैसला निस्संदेह साहसिक है, लेकिन यह एक दोधारी तलवार भी है। जनसांख्यिकीय बदलाव असम की एक कड़वी और खतरनाक हकीकत है, जिससे इनकार नहीं किया जा सकता। मूल निवासियों की सुरक्षा राज्य का धर्म है।
The Trending People का विश्लेषण है कि 'लैंड जिहाद' जैसे शब्दों का इस्तेमाल राजनीतिक हो सकता है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि कई सीमावर्ती जिलों में सामाजिक तनाव बढ़ा है। डीसी की मंजूरी का प्रावधान अगर ईमानदारी से लागू किया जाए, तो यह गरीब और लाचार लोगों को अपनी जमीन औने-पौने दाम में बेचने या दबाव में छोड़ने से बचा सकता है। लेकिन सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि यह कानून केवल 'सुरक्षा' का यंत्र बने, न कि किसी समुदाय के 'उत्पीड़न' का हथियार। पारदर्शिता ही इस कानून की सफलता की कुंजी होगी।
