जेनेवा वार्ता के बीच मिडिल ईस्ट में अमेरिकी सैन्य घेराबंदी, ट्रंप की रणनीति पर उठे सवाल
वॉशिंगटन। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की विदेश नीति एक बार फिर वैश्विक चर्चा के केंद्र में है। एक ओर अमेरिका और ईरान के बीच स्विट्जरलैंड के जेनेवा में परमाणु कार्यक्रम को लेकर अप्रत्यक्ष बातचीत जारी है, वहीं दूसरी ओर बीते 24 घंटों में अमेरिका ने मिडिल ईस्ट में 50 से अधिक अत्याधुनिक फाइटर जेट तैनात कर दिए हैं। साथ ही कई युद्धपोतों को रणनीतिक समुद्री क्षेत्रों की ओर रवाना किया गया है।
अमेरिकी रक्षा अधिकारियों का कहना है कि यह कदम “क्षेत्रीय सुरक्षा” और “निवारक क्षमता” को मजबूत करने के उद्देश्य से उठाया गया है। हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह ट्रंप की पारंपरिक दोहरे दबाव की रणनीति का हिस्सा है—बातचीत की मेज पर कूटनीति और मैदान में शक्ति प्रदर्शन।
24 घंटे में सैन्य हलचल तेज
रक्षा सूत्रों के अनुसार, खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी एयरबेसों पर अतिरिक्त फाइटर स्क्वाड्रन पहुंचाए गए हैं। स्थानीय मीडिया रिपोर्टों में बताया गया है कि कुछ एयरबेसों पर सैन्य गतिविधि असामान्य रूप से बढ़ी हुई देखी गई।
खाड़ी क्षेत्र के एक स्थानीय सूत्र ने बताया कि “पिछली रात से लगातार सैन्य विमान उतरते और उड़ान भरते देखे गए हैं। यह सामान्य रोटेशन जैसा नहीं लग रहा।” हालांकि अमेरिकी प्रशासन ने इन गतिविधियों को नियमित तैनाती और सुरक्षा प्रबंधन का हिस्सा बताया है।
प्रशासन की आधिकारिक प्रतिक्रिया
पेंटागन के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बयान जारी कर कहा, “संयुक्त राज्य अमेरिका क्षेत्रीय स्थिरता और अपने सहयोगियों की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध है। हालिया तैनाती निवारक क्षमता को मजबूत करने के लिए है और इसका उद्देश्य किसी संघर्ष को भड़काना नहीं है।”
व्हाइट हाउस के प्रवक्ता ने भी स्पष्ट किया कि जेनेवा में जारी वार्ता और सैन्य तैयारियों के बीच कोई विरोधाभास नहीं है। उनके अनुसार, “कूटनीति तभी प्रभावी होती है जब उसके पीछे विश्वसनीय शक्ति हो।”
जेनेवा में जारी अप्रत्यक्ष वार्ता
स्विट्जरलैंड के जेनेवा में अमेरिका और ईरान के प्रतिनिधियों के बीच परमाणु कार्यक्रम को लेकर अप्रत्यक्ष बातचीत चल रही है। यह वार्ता यूरोपीय मध्यस्थों के माध्यम से हो रही है।
सूत्रों के अनुसार, चर्चा का केंद्र बिंदु ईरान के परमाणु संवर्धन कार्यक्रम पर सीमाएं और अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण तंत्र को लेकर है। हालांकि दोनों पक्षों ने सार्वजनिक रूप से वार्ता की प्रगति पर विस्तृत टिप्पणी नहीं की है।
पृष्ठभूमि: पहले भी दिखी दोहरी रणनीति
ट्रंप प्रशासन के दौरान पहले भी ऐसी रणनीति देखने को मिली थी, जब 2018 में अमेरिका ने ईरान परमाणु समझौते से हटते हुए आर्थिक प्रतिबंध कड़े किए थे और साथ ही सैन्य दबाव भी बढ़ाया था।
विश्लेषकों का कहना है कि ट्रंप अक्सर “मैक्सिमम प्रेशर” नीति अपनाते हैं, जिसमें आर्थिक, कूटनीतिक और सैन्य साधनों का समानांतर उपयोग किया जाता है।
हालिया घटनाक्रम इसी नीति का विस्तार माना जा रहा है।
क्षेत्रीय असर और संभावित जोखिम
मिडिल ईस्ट पहले से ही कई सामरिक तनावों का केंद्र रहा है। अमेरिकी सैन्य जमावड़े से ईरान और उसके सहयोगी देशों की प्रतिक्रिया भी महत्वपूर्ण होगी।
कुछ क्षेत्रीय विश्लेषकों का मानना है कि यह तैनाती ईरान पर दबाव बनाएगी और वार्ता में अमेरिकी पक्ष को मजबूती देगी। वहीं आलोचकों का तर्क है कि इस तरह की सैन्य गतिविधि से गलत संदेश जा सकता है और किसी भी छोटी घटना से बड़ा टकराव पैदा हो सकता है।
खाड़ी क्षेत्र के तेल बाजार और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर भी इसका असर पड़ सकता है। तेल की कीमतों में हल्की बढ़ोतरी की खबरें सामने आई हैं, जिसे बाजार विशेषज्ञ संभावित अस्थिरता से जोड़कर देख रहे हैं।
अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया
यूरोपीय देशों ने संयम बरतने की अपील की है। एक यूरोपीय राजनयिक ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, “वार्ता के दौरान सैन्य संकेतों को सावधानी से संभालना चाहिए, ताकि कूटनीतिक प्रयास कमजोर न हों।”
संयुक्त राष्ट्र के सूत्रों ने भी क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखने और संवाद को प्राथमिकता देने की आवश्यकता पर जोर दिया है।
हमरी राय
अमेरिका की यह रणनीति कूटनीति और शक्ति प्रदर्शन के बीच संतुलन साधने की कोशिश है। इतिहास बताता है कि दबाव की नीति कभी-कभी वार्ता को गति देती है, लेकिन यह जोखिम भी बढ़ाती है।
यदि सैन्य तैनाती केवल निवारक संदेश तक सीमित रहती है और वार्ता सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ती है, तो यह रणनीति सफल मानी जा सकती है। लेकिन यदि क्षेत्रीय तनाव बढ़ता है, तो मिडिल ईस्ट एक नए अस्थिर दौर में प्रवेश कर सकता है।
आने वाले दिनों में जेनेवा वार्ता की प्रगति ही तय करेगी कि यह दोहरी चाल शांति की ओर ले जाती है या टकराव की ओर।