बेटी को ‘काबिल’ बनाएं, सिर्फ शादी के लिए नहीं: एक मां की प्रेरक कहानी
डिग्रियां थीं, आत्मनिर्भरता नहीं
“जब मेरी शादी हुई, तो मेरे पास डिग्रियां तो थीं, लेकिन उन डिग्रियों को करियर में बदलने का हुनर नहीं सिखाया गया था।”
45 वर्षीय सविता (नाम परिवर्तित) की यह बात आज हजारों मध्यमवर्गीय परिवारों की सच्चाई बयान करती है।
सविता बताती हैं कि उनके घर में पढ़ाई को ‘अच्छा रिश्ता’ पाने का माध्यम माना जाता था, न कि आर्थिक स्वतंत्रता का। शादी के बाद जब जीवन में आर्थिक और पारिवारिक संकट आए, तब उन्हें समझ आया कि Financial Independence सिर्फ एक विकल्प नहीं, बल्कि जरूरत है।
आज उनकी बेटी अवनी यूरोप की एक बड़ी कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर है और अपने परिवार की मजबूत आधारशिला बन चुकी है। सविता का संकल्प साफ है—“बेटी को दुनिया के लिए नहीं, खुद के लिए तैयार करना है।”
परंपरा: पढ़ाई का उद्देश्य—रिश्ता या करियर?
भारतीय समाज में लंबे समय तक बेटियों की पढ़ाई को सामाजिक प्रतिष्ठा से जोड़ा गया। पढ़ी-लिखी बेटी का मतलब था ‘अच्छा घर-वर’। लेकिन आर्थिक आत्मनिर्भरता पर कम ध्यान दिया गया।
समाजशास्त्रियों का मानना है कि यह सोच पितृसत्तात्मक व्यवस्था का हिस्सा रही है, जहां आर्थिक जिम्मेदारी पुरुष पर और घरेलू जिम्मेदारी महिला पर डाली जाती रही।
आध्यात्मिक दृष्टिकोण से भी भारतीय ग्रंथों में ‘शक्ति’ को स्त्री का प्रतीक माना गया है। देवी सरस्वती ज्ञान की और देवी लक्ष्मी समृद्धि की प्रतीक हैं। इसका अर्थ यह है कि ज्ञान और आर्थिक क्षमता दोनों ही स्त्री के स्वाभाविक अधिकार हैं।
आधुनिक दृष्टिकोण: क्यों जरूरी है आर्थिक आत्मनिर्भरता?
आज की दुनिया अनिश्चित है। रिश्तों, नौकरी और अर्थव्यवस्था—हर स्तर पर बदलाव तेज है। ऐसे में बेटियों का आत्मनिर्भर होना समय की मांग है।
1. आर्थिक सुरक्षा (Financial Security)
जीवन में तलाक, बीमारी या आर्थिक मंदी जैसी परिस्थितियां कभी भी आ सकती हैं। आर्थिक रूप से सक्षम महिला संकट का सामना ज्यादा आत्मविश्वास से कर सकती है।
2. निर्णय लेने की शक्ति
जब बेटी कमाती है, तो परिवार के फैसलों में उसकी राय को महत्व मिलता है। यह उसे मानसिक मजबूती और आत्मविश्वास देता है।
3. अगली पीढ़ी के लिए प्रेरणा
एक आत्मनिर्भर मां अपने बच्चों को भी मजबूत बनाती है। शोध बताते हैं कि कामकाजी और आत्मनिर्भर माताओं के बच्चों में आत्मविश्वास और शिक्षा के प्रति जागरूकता अधिक होती है।
सविता की सीख: पेरेंटिंग में बदलाव जरूरी
सविता मानती हैं कि केवल स्कूल की पढ़ाई काफी नहीं। माता-पिता को अपनी सोच और परवरिश के तरीके में बदलाव लाना होगा।
बचपन से सिखाएं मनी मैनेजमेंट
बेटियों को गुल्लक से शुरुआत कर बैंक अकाउंट, डिजिटल पेमेंट और निवेश तक की जानकारी दें। उन्हें समझाएं कि पैसा बचाना और निवेश करना क्यों जरूरी है।
सपनों को जेंडर से न बांधें
अगर आपकी बेटी पायलट, वैज्ञानिक या खिलाड़ी बनना चाहती है, तो उसे “लड़कियों वाला करियर” बताकर सीमित न करें। आज के दौर में करियर का कोई जेंडर नहीं होता।
असफलता से लड़ना सिखाएं
अक्सर बेटियों को जरूरत से ज्यादा सुरक्षित माहौल में रखा जाता है। उन्हें गिरने दें, असफल होने दें और खुद खड़े होना सिखाएं। यही संघर्ष उन्हें मजबूत बनाएगा।
शादी को ‘अंतिम लक्ष्य’ न बनाएं
बेटी से यह न कहें कि “पढ़ लो ताकि अच्छा लड़का मिले।”
उसे कहें—“पढ़ो ताकि तुम्हें किसी के सामने हाथ न फैलाना पड़े।”
आधुनिक जीवन से जुड़ाव
आज डिजिटल युग में स्किल्स की मांग तेजी से बदल रही है। कोडिंग, डिजिटल मार्केटिंग, फाइनेंस, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस—ये क्षेत्र केवल पुरुषों के लिए नहीं हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि माता-पिता को बेटियों को टेक्नोलॉजी और फाइनेंशियल लिटरेसी से जोड़ना चाहिए।
सविता की बेटी अवनी ने भी यही किया। उसने पढ़ाई के साथ-साथ स्किल डेवलपमेंट पर ध्यान दिया। आज वह न केवल कमाती है, बल्कि अपने परिवार के फैसलों में सक्रिय भूमिका निभाती है।
निष्कर्ष: असली संपत्ति क्या है?
सविता कहती हैं, “जब मेरी बेटी अपना चेक खुद साइन करती है, तो मुझे अपनी वर्षों की तपस्या सफल लगती है।”
यह कहानी केवल एक मां-बेटी की नहीं, बल्कि उस सोच की है जो बदल रही है। बेटी की सबसे बड़ी संपत्ति उसके गहने नहीं, बल्कि उसकी योग्यता है।
समाज तब आगे बढ़ता है जब बेटियां केवल घर की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि अपनी पहचान और सपनों की जिम्मेदारी भी उठाती हैं।
हमरी राय
बेटियों को आत्मनिर्भर बनाना केवल व्यक्तिगत निर्णय नहीं, बल्कि सामाजिक निवेश है। जब एक लड़की आर्थिक रूप से सक्षम होती है, तो वह अपने परिवार, समाज और देश की ताकत बनती है।
आज जरूरत है कि हर माता-पिता अपनी सोच में यह बदलाव लाएं—बेटी को पढ़ाएं, लेकिन उससे भी ज्यादा उसे ‘काबिल’ बनाएं।
