ओ रोमियो’ (फर्स्ट हाफ) रिव्यू: विशाल भारद्वाज की 'मसालेदार' बिरयानी; शाहिद कपूर के 'उस्तरे' ने काट दी रूह, नाना पाटेकर का जलवा
एंटरटेनमेंट डेस्क | बॉलीवुड में मसाले हर बार वही होते हैं—वही बड़ी इलायची, जायफल और दालचीनी। लेकिन स्वाद इस बात पर निर्भर करता है कि इसे पकाने वाले हाथ किसके हैं। जब 'सिनेमाई शेफ' विशाल भारद्वाज किचन (सेट) में हों, तो आप साधारण एक्शन-ड्रामा से भी एक अलग जायके की उम्मीद करते हैं। उनकी नई फिल्म ‘ओ रोमियो’ का फर्स्ट हाफ कुछ ऐसा ही है—तीखा, चटपटा और पूरी तरह से रूह में बस जाने वाला।
धमाकेदर शुरुआत: उस्तरा की धार और शाहिद का स्वैग
फिल्म की शुरुआत ही शाहिद कपूर के करियर के सबसे धमाकेदार इंट्रोडक्शन सीन से होती है। शाहिद यहाँ 'उस्तरा' नाम के एक खूंखार गैंगस्टर के रोल में हैं। उस्तरा सिर्फ नाम नहीं, उसका हथियार और पहचान भी है। शाहिद का किरदार इतना पैना है कि वह शरीर से रूह को अलग करने की ताकत रखता है।
विशाल भारद्वाज ने शाहिद को एक ऐसे गैंगस्टर के रूप में पेश किया है जो अपनी मर्जी से कदम थिरकाता है, लेकिन इस 'नाचते' हुए उस्तरे की कमान एक 'मास्टर' के हाथ में है।
नाना पाटेकर: द पपेट मास्टर (Khan Sahab)
फिल्म में नाना पाटेकर 'खान साहब' के किरदार में हैं, जो आईबी (IB) के एक चालाक कॉप हैं। नाना पाटेकर का स्क्रीन प्रेजेंस फिल्म को एक अलग ही ठहराव और गंभीरता देता है। वह उस्तरा (शाहिद) को एक हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं ताकि अंडरवर्ल्ड के बड़े कचरे को साफ किया जा सके। नाना और शाहिद के बीच का तालमेल फिल्म की सबसे बड़ी यूएसपी (USP) बनकर उभरा है।
तृप्ति डिमरी: बदला, प्यार और रूहानी राग
उस्तरा की खूंखार और बेरंग जिंदगी में 'अनसुने राग' तब बजने लगते हैं जब अफशां (तृप्ति डिमरी) की एंट्री होती है। तृप्ति यहाँ केवल 'आई कैंडी' नहीं हैं, बल्कि कहानी का टर्निंग पॉइंट हैं। वह उस्तरा के पास एक 'सुपारी' लेकर आती हैं—बदले की सुपारी।
- टारगेट: जलाल (अविनाश तिवारी) और उसके तीन साथी।
- मकसद: एक पुराना और गहरा जख्म।
तृप्ति और शाहिद के बीच की केमिस्ट्री में विशाल भारद्वाज का सिग्नेचर 'इश्क का लफड़ा-ए-अंजाम' साफ नजर आता है।
90s के गानों की गार्निश और फिल्ममेकिंग
विशाल भारद्वाज ने इस डार्क थ्रिलर पर 90 के दशक के गानों की जो 'गार्निश' की है, वह लाजवाब है। फिल्म की पेस (Pace) पर जबरदस्त पकड़ है। जहाँ कहानी को भागना चाहिए, वहां वह सरपट दौड़ती है और जहाँ दर्शकों को स्वाद लेने के लिए ठहरना चाहिए, वहां फिल्म रुककर आपको उन भावनाओं को महसूस करने का वक्त देती है।
इंटरवल का धमाका: विलेन की एंट्री
कहते हैं कि 'पिक्चर विलेन की एंट्री से शुरू होती है।' इंटरवल से ठीक पहले जलाल (अविनाश तिवारी) की तगड़ी एंट्री ने कहानी में नया तनाव (Tension) घोल दिया है। अविनाश का लुक और उनकी आंखों में छिपी वह दरिंदगी बताती है कि सेकंड हाफ में खून-खच्चर और इमोशन्स का जबरदस्त मेल होने वाला है।
रेटिंग और प्रदर्शन मीटर (First Half Analysis)
- परफॉर्मेंस: शाहिद कपूर (5/5), नाना पाटेकर (4.5/5), तृप्ति डिमरी (4/5)
- म्यूजिक: 90s का नॉस्टैल्जिया और बैकग्राउंड स्कोर कमाल का है।
- डायरेक्शन: विशाल भारद्वाज ने एक बार फिर साबित किया कि वह कहानी को 'स्लो कुकिंग' की तरह बेहतरीन जायके में बदल सकते हैं।
संपादकीय विश्लेषण
'ओ रोमियो' का फर्स्ट हाफ एक मुकम्मल मील (Full Meal) की तरह महसूस होता है। विशाल भारद्वाज ने खून-खच्चर के बीच भी संगीत और इश्क की जो जगह बनाई है, वह काबिले तारीफ है। शाहिद कपूर एक बार फिर 'कबीर सिंह' और 'हैदर' वाले जोन की याद दिलाते हैं, लेकिन एक नई धार के साथ। अब इंतजार है सेकंड हाफ का, जहाँ जलाल और उस्तरा की टक्कर इस सिनेमाई डिश को 'मेन कोर्स' में बदलेगी।