दिल्ली के एमसीडी स्कूलों में बच्चों की आंखों की जांच की नई पहल, टीचर करेंगे शुरुआती स्क्रीनिंग
नई दिल्ली: दिल्ली के नगर निगम स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की आंखों की सेहत सुधारने के लिए एक नई पहल शुरू की गई है। Municipal Corporation of Delhi (एमसीडी) ने एक पायलट प्रोजेक्ट लागू किया है जिसके तहत अब स्कूलों के शिक्षक ही बच्चों की आंखों की शुरुआती जांच करेंगे। इस योजना का उद्देश्य कमजोर नजर या देखने में दिक्कत जैसी समस्याओं की समय रहते पहचान करना है ताकि बच्चों को तुरंत इलाज और जरूरत पड़ने पर चश्मा उपलब्ध कराया जा सके।
शिक्षा और स्वास्थ्य से जुड़ी यह संयुक्त पहल बच्चों के सीखने की क्षमता को बेहतर बनाने के व्यापक प्रयास का हिस्सा मानी जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि नजर की समस्या अक्सर पढ़ाई पर सीधा असर डालती है और शुरुआती पहचान से इसका समाधान आसान हो जाता है।
20 प्राथमिक स्कूलों में शुरू हुआ पायलट प्रोजेक्ट
फिलहाल इस योजना की शुरुआत 20 प्राथमिक स्कूलों में ट्रायल के तौर पर की गई है। इस पायलट प्रोजेक्ट में All India Institute of Medical Sciences (एम्स) के विशेषज्ञ शिक्षकों को विशेष प्रशिक्षण दे रहे हैं ताकि वे आंखों की बुनियादी जांच कर सकें।
ट्रेनिंग के दौरान शिक्षकों को सरल तरीकों से विजन स्क्रीनिंग करना सिखाया जा रहा है। इसके लिए ‘ई चार्ट’ और अलग-अलग आकार के अक्षरों वाले कार्डबोर्ड चार्ट का उपयोग कराया जा रहा है। इन उपकरणों की मदद से शिक्षक आसानी से यह पहचान सकेंगे कि किसी बच्चे को बोर्ड देखने या पढ़ने में परेशानी हो रही है या नहीं।
एम्स विशेषज्ञों ने शिक्षकों को यह भी बताया कि किन संकेतों पर विशेष ध्यान देना चाहिए, जैसे बच्चे का किताब को बहुत करीब लाना, बार-बार आंखें मिचमिचाना या बोर्ड से दूरी बनाकर बैठना।
ऐसे होगा पूरा प्रोसेस
प्रशिक्षण पूरा होने के बाद शिक्षक अपने-अपने स्कूलों में बच्चों की विजन स्क्रीनिंग शुरू करेंगे। स्क्रीनिंग के दौरान जिन बच्चों में आंखों से जुड़ी समस्या के संकेत मिलेंगे, उनकी सूची तैयार की जाएगी।
यह सूची एम्स के डॉक्टरों को भेजी जाएगी, जहां विशेषज्ञ बच्चों की विस्तृत जांच करेंगे। जरूरत के अनुसार बच्चों को मुफ्त चश्मा दिया जाएगा या आगे के इलाज के लिए रेफर किया जाएगा। इस पूरी प्रक्रिया का उद्देश्य है कि कोई भी बच्चा केवल नजर की समस्या के कारण पढ़ाई में पीछे न रह जाए।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि स्कूल आधारित स्क्रीनिंग मॉडल कम लागत वाला और प्रभावी तरीका है, जिससे बड़ी संख्या में बच्चों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाई जा सकती हैं।
योजना की पृष्ठभूमि और जरूरत
पिछले कुछ वर्षों में बच्चों में स्क्रीन टाइम बढ़ने और आउटडोर गतिविधियां कम होने के कारण नजर की समस्याएं तेजी से बढ़ी हैं। कई अध्ययनों में पाया गया है कि प्राथमिक स्तर के बच्चों में मायोपिया यानी दूर की नजर कमजोर होने के मामले बढ़ रहे हैं।
एमसीडी स्कूलों में पढ़ने वाले कई बच्चों को नियमित नेत्र जांच की सुविधा नहीं मिल पाती। ऐसे में स्कूल स्तर पर स्क्रीनिंग शुरू करना एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। यह पहल सार्वजनिक स्वास्थ्य और शिक्षा के बीच समन्वय का उदाहरण भी है।
विशेषज्ञों के अनुसार शुरुआती उम्र में पहचान होने पर नजर की समस्या को नियंत्रित किया जा सकता है और बच्चे की सीखने की क्षमता पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभाव को रोका जा सकता है।
शिक्षकों और अभिभावकों की प्रतिक्रिया
शिक्षकों ने इस पहल को सकारात्मक बताया है और कहा है कि इससे बच्चों की पढ़ाई में सुधार होगा। कई अभिभावकों ने भी इस योजना का स्वागत किया है क्योंकि इससे बिना अतिरिक्त खर्च के बच्चों की आंखों की जांच संभव हो सकेगी।
शिक्षा क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि स्वास्थ्य आधारित ऐसी पहलें सरकारी स्कूलों में सीखने के परिणामों को बेहतर बनाने में मदद करती हैं। उनका कहना है कि नजर की समस्या का समय पर समाधान बच्चों के आत्मविश्वास और कक्षा में भागीदारी दोनों को बढ़ाता है।
आगे की योजना और लक्ष्य
यदि 20 स्कूलों में चल रहा पायलट प्रोजेक्ट सफल रहता है तो इसे दिल्ली के सभी एमसीडी स्कूलों में लागू किया जाएगा। प्रशासन का लक्ष्य है कि 31 मार्च तक ट्रायल स्कूलों में स्क्रीनिंग पूरी कर जरूरतमंद बच्चों को चश्मा उपलब्ध कराया जाए।
भविष्य में इस मॉडल को नियमित स्कूल हेल्थ प्रोग्राम का हिस्सा बनाने पर भी विचार किया जा सकता है। इससे हर साल बच्चों की आंखों की जांच सुनिश्चित हो सकेगी और समस्याओं की जल्द पहचान संभव होगी।
संपादकीय विश्लेषण
एमसीडी की यह पहल शिक्षा और स्वास्थ्य के बीच समन्वित दृष्टिकोण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। नजर की समस्या अक्सर बच्चों की पढ़ाई और आत्मविश्वास दोनों को प्रभावित करती है, लेकिन कई मामलों में इसकी पहचान देर से होती है। स्कूल स्तर पर स्क्रीनिंग शुरू करना इस अंतर को भरने की कोशिश है।
यदि यह मॉडल सफल रहता है तो यह देश के अन्य शहरी और ग्रामीण स्कूलों के लिए भी उदाहरण बन सकता है। मुफ्त चश्मा उपलब्ध कराने जैसी व्यवस्था सामाजिक समानता को मजबूत करती है और यह सुनिश्चित करती है कि आर्थिक कारणों से कोई बच्चा पीछे न रह जाए।
यह पहल संकेत देती है कि भविष्य की शिक्षा नीतियों में स्वास्थ्य को भी उतनी ही प्राथमिकता दी जा रही है जितनी अकादमिक प्रदर्शन को।
