एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक विवाद पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती, BJP ने न्यायपालिका के सम्मान की बात दोहराई
नई दिल्ली: कक्षा आठ की एनसीईआरटी सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक में न्यायिक भ्रष्टाचार से जुड़े एक अध्याय को लेकर उठे विवाद ने राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा और न्यायपालिका के संबंधों पर नई बहस छेड़ दी है। इस मामले में उच्चतम न्यायालय की कड़ी टिप्पणी और पूर्ण प्रतिबंध के आदेश के बाद भारतीय जनता पार्टी ने इसे संवेदनशील मुद्दा बताते हुए न्यायपालिका के प्रति सम्मान और समर्थन की बात दोहराई है। भाजपा ने स्पष्ट किया कि देश की न्यायपालिका स्वतंत्र, निष्पक्ष और लोकतांत्रिक संस्थाओं का मजबूत स्तंभ है, जिस पर पूरे देश को गर्व है।
सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप और प्रतिबंध का आदेश
मामले ने तब तूल पकड़ा जब सुप्रीम कोर्ट ने एनसीईआरटी की कक्षा आठ की उस पाठ्यपुस्तक पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का आदेश दिया जिसमें न्यायपालिका में भ्रष्टाचार से संबंधित अध्याय शामिल था। अदालत ने पुस्तक की सभी भौतिक प्रतियां जब्त करने और डिजिटल संस्करणों को तुरंत हटाने का निर्देश दिया। अदालत की ओर से यह भी कहा गया कि न्यायपालिका की छवि को नुकसान पहुंचाने के लिए एक सुनियोजित प्रयास की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली शामिल थे, ने मामले का स्वतः संज्ञान लिया। वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और अभिषेक सिंघवी द्वारा मामले को तत्काल सुनवाई के लिए उल्लेखित किए जाने के बाद अदालत ने पाठ्यपुस्तक में न्यायपालिका के बारे में कथित आपत्तिजनक सामग्री पर गंभीर आपत्ति जताई।
भाजपा की प्रतिक्रिया: संवेदनशील मुद्दा, न्यायपालिका पर भरोसा
भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता संबित पात्रा ने इस विवाद को संवेदनशील बताते हुए कहा कि पार्टी न्यायपालिका का सम्मान करती है और उसके निष्पक्ष कामकाज पर गर्व करती है। उन्होंने कहा कि भारत ही नहीं बल्कि दुनिया में भारतीय न्यायपालिका जैसी स्वतंत्र संस्था कम ही देखने को मिलती है।
पात्रा ने भाजपा मुख्यालय में मीडिया से बातचीत के दौरान कहा कि देश के हर नागरिक के मन में न्यायपालिका के प्रति सम्मान की भावना है और लोकतंत्र की मजबूती के लिए यह आवश्यक भी है। उन्होंने यह भी बताया कि सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सरकार की ओर से स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार न्यायपालिका के साथ खड़ी है और उसका समर्थन करती है।
भाजपा प्रवक्ता ने जोर देकर कहा कि न्यायपालिका जिस निष्पक्षता के साथ काम करती है, उसे देखते हुए देश को हमेशा उसका सम्मान करना चाहिए और संस्थागत भरोसे को मजबूत करना चाहिए।
एनसीईआरटी की सफाई और माफी
सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी के बाद एनसीईआरटी ने विवादित अध्याय को लेकर माफी मांगी और स्वीकार किया कि सामग्री अनुचित थी। परिषद ने कहा कि संबंधित प्राधिकारियों से परामर्श के बाद पुस्तक को फिर से लिखा जाएगा ताकि भविष्य में ऐसी स्थिति न बने।
एनसीईआरटी ने अपनी वेबसाइट से पुस्तक को हटाने के कुछ घंटों के भीतर ही उसका वितरण भी रोक दिया। परिषद ने यह भी संकेत दिया कि पाठ्यक्रम समीक्षा प्रक्रिया को और मजबूत किया जाएगा ताकि शैक्षणिक सामग्री संतुलित और तथ्यात्मक रहे।
विवाद की पृष्ठभूमि: शिक्षा बनाम संस्थागत छवि की बहस
यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब शिक्षा में संस्थाओं की भूमिका और उनकी आलोचना को लेकर व्यापक बहस चल रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि पाठ्यपुस्तकों में संवेदनशील विषयों को शामिल करते समय भाषा, संदर्भ और संतुलन बेहद महत्वपूर्ण होते हैं।
शिक्षा नीति से जुड़े कई विशेषज्ञों ने कहा कि छात्रों को लोकतांत्रिक संस्थाओं के बारे में जानकारी देना जरूरी है, लेकिन सामग्री ऐसी होनी चाहिए जो आलोचनात्मक सोच को बढ़ावा दे और संस्थाओं की विश्वसनीयता पर अनावश्यक प्रश्न न खड़े करे। वहीं कुछ शिक्षाविदों ने यह भी कहा कि विवाद से यह स्पष्ट होता है कि पाठ्यक्रम निर्माण प्रक्रिया में अधिक पारदर्शिता और विशेषज्ञ समीक्षा की आवश्यकता है।
राजनीतिक और सार्वजनिक प्रतिक्रिया
मामले ने राजनीतिक हलकों में भी चर्चा तेज कर दी है। जहां भाजपा ने न्यायपालिका के समर्थन की बात कही, वहीं विपक्ष के कुछ नेताओं और शिक्षाविदों ने पाठ्यपुस्तकों में बदलाव की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए। सोशल मीडिया पर भी यह मुद्दा ट्रेंड करता रहा और लोगों के बीच शिक्षा की सामग्री की गुणवत्ता और संतुलन को लेकर बहस देखने को मिली।
जनता के एक वर्ग ने अदालत के फैसले को संस्थागत गरिमा की रक्षा के रूप में देखा, जबकि दूसरे वर्ग ने शैक्षणिक स्वतंत्रता और अकादमिक विमर्श की जरूरत पर जोर दिया।
आगे क्या: पाठ्यक्रम समीक्षा और नीति संकेत
इस विवाद के बाद यह संकेत मिल रहे हैं कि भविष्य में पाठ्यपुस्तक निर्माण और समीक्षा प्रक्रिया में अधिक सख्ती अपनाई जा सकती है। शिक्षा मंत्रालय और एनसीईआरटी दोनों स्तरों पर सामग्री की जांच और विशेषज्ञ परामर्श को मजबूत करने पर चर्चा हो रही है।
विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला केवल एक अध्याय तक सीमित नहीं है बल्कि यह शिक्षा, अभिव्यक्ति और संस्थागत सम्मान के बीच संतुलन की व्यापक बहस को सामने लाता है।
संपादकीय विश्लेषण
एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक विवाद ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि शिक्षा प्रणाली में संवेदनशील विषयों को किस तरह शामिल किया जाए। लोकतंत्र में संस्थाओं पर चर्चा और आलोचना दोनों जरूरी हैं, लेकिन भाषा और संदर्भ का संतुलन भी उतना ही महत्वपूर्ण है। सुप्रीम कोर्ट की सख्ती संस्थागत गरिमा की रक्षा का संकेत देती है, जबकि एनसीईआरटी की माफी पाठ्यक्रम समीक्षा की आवश्यकता को रेखांकित करती है।
भाजपा की प्रतिक्रिया इस बात को दर्शाती है कि राजनीतिक स्तर पर न्यायपालिका के प्रति समर्थन का संदेश देना प्राथमिकता बना हुआ है। आने वाले समय में यह मामला शिक्षा नीति और अकादमिक स्वतंत्रता पर व्यापक दिशा तय कर सकता है।
