काम का जानलेवा बोझ: क्या ये 'हसल कल्चर' सच में हमारी जान ले रहा है?
| मानसिक तनाव/सांकेतिक तस्वीर |
क्या आपने कभी 'करोशी' के बारे में सुना है? जापानी भाषा में इसका सीधा सा मतलब है—काम के भारी बोझ तले दबकर जान दे देना! सुनकर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं, है ना? कभी सोचा था कि जिस काम के लिए हम बचपन से इतनी पढ़ाई करते हैं, डिग्रियां लेते हैं और इंटरव्यू के लिए दिन-रात एक करते हैं, वही काम एक दिन हमारी जान का दुश्मन बन जाएगा? हमारे भारत में भी हाल ही में एक ऐसा ही दिल दहला देने वाला मामला सामने आया। इस एक घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है और हम सबको यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर हम किस अंधी दौड़ में भाग रहे हैं!
सितंबर के महीने में एक बेहद दुखी और परेशान मां ने अपनी बेटी के बॉस को एक लंबी-चौड़ी चिट्ठी लिखी। इस चिट्ठी में उन्होंने भारत में फैल रहे उस 'टॉक्सिक वर्क कल्चर' (जहरीले काम के माहौल) की खूब क्लास लगाई, जो सिर्फ काम को पूजता है, ओवरवर्क को महान बताता है और इंसानों की तो जैसे उसे रत्ती भर भी परवाह नहीं है! ऐसा लगता है जैसे इंसान नहीं, बल्कि हम बस एक रिसोर्स (resource) बनकर रह गए हैं, जिसे तब तक निचोड़ा जाता है जब तक कि वह पूरी तरह खत्म न हो जाए।
जरा सोचिए उस मां के दिल पर क्या बीती होगी! उनका यह गुस्सा अपनी 26 साल की जवान बेटी, ऐना सेबेस्टियन की दुखद मौत के बाद फूटा था। ऐना एक बेहद होनहार और टैलेंटेड चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA) थीं। उन्हें ग्लोबल फर्म ईवाई (EY) में अपनी 'ड्रीम जॉब' मिली थी। लोग ऐसी नौकरी पाने के लिए सालों तपस्या करते हैं! पूरे परिवार ने जश्न मनाया होगा। लेकिन, किसे पता था कि यह सपना एक दुःस्वप्न बन जाएगा? सिर्फ चार महीने कोल्हू के बैल की तरह दिन-रात जुटने के बाद, ऐना अचानक अपने घर पर गिर पड़ीं और हमेशा के लिए यह दुनिया छोड़ गईं।
उनकी मां ने अपनी भारी आंखों से उस खत में लिखा, "काम का बेहिसाब बोझ और लगातार कई-कई घंटों तक बिना रुके काम करने की वजह से वह पूरी तरह टूट गई थी।" नौकरी शुरू करते ही उसे घबराहट, रातों की नींद उड़ जाना और भयंकर स्ट्रेस ने घेर लिया था। लेकिन वह बेचारी खुद को जैसे-तैसे घसीटती रही। उसे लगा कि शायद इसी कड़ी मेहनत से उसे कामयाबी मिलेगी और शुरुआती दिनों में ऐसा ही होता है। अरे भाई, लगातार नई मांगें बढ़ाते जाना और कर्मचारियों से हवा-हवाई उम्मीदें पालना तो किसी की भी जान ले सकता है! और इसी अंधी 'टार्गेट' वाली दौड़ के चक्कर में एक इतनी होनहार लड़की, जिसके सामने उसकी पूरी जिंदगी पड़ी थी, हमारे बीच से चली गई।
नींद न आना और स्ट्रेस: आज के यूथ की आम कहानी!
आजकल 'स्ट्रेस', 'नींद न आना', 'एंग्जायटी' और 'बेचैनी' जैसे शब्द तो हर दूसरे एम्प्लॉई की जुबान पर हैं! ऐसा लगता है जैसे ये हमारी जिंदगी का पक्का हिस्सा बन गए हैं। और अगर 'जेन जी' (Gen Z) की बात करें—यानी वो बच्चे जो 1995 से 2012 के बीच पैदा हुए हैं—तो वो तो इसे सबसे ज्यादा भुगत रहे हैं!
'योरदोस्त' नाम के एक जाने-माने ऑनलाइन प्लेटफॉर्म ने 2023 में 2,000 से ज्यादा कर्मचारियों से गहराई से बात की। उनके नतीजे सुनेंगे तो आप भी हैरान रह जाएंगे! पता चला कि 60% से ज्यादा लोग भारी स्ट्रेस में जी रहे हैं। और सबसे बुरा हाल 21 से 30 साल के उन युवाओं का है जो अभी-अभी कॉलेज से निकले हैं। सोशल मीडिया ने भी इस आग में घी डालने का काम किया है। लिंक्डइन (LinkedIn) या इंस्टाग्राम खोलते ही लगता है जैसे बाकी दुनिया तो चांद पर पहुंच गई, सबके पास बड़ी गाड़ियां हैं, बड़े पैकेज हैं, और हम यहीं अटक गए हैं! इस 'फीयर ऑफ मिसिंग आउट' (FOMO) ने युवाओं को इतना खोखला कर दिया है कि वे करियर की शुरुआत में ही अंदर से पूरी तरह थके हुए महसूस कर रहे हैं।
जब तनाव सीधा आपके शरीर पर वार करता है!
यह स्ट्रेस अब सिर्फ दिमाग तक नहीं रुका है, यह सीधे हमारी सेहत और हमारे दिल पर वार कर रहा है। आपने भी हाल ही में ऐसी कई खबरें सुनी होंगी कि आजकल 25-30 साल के एकदम फिट दिखने वाले युवाओं को अचानक जिम में या ऑफिस की कुर्सी पर बैठे-बैठे हार्ट अटैक आ रहा है! पहले हम सोचते थे कि हार्ट अटैक तो बुढ़ापे की बीमारी है, लेकिन अब ये हमारी खराब लाइफस्टाइल और 'डेडलाइन' के डर का नतीजा बन गया है।
2021 की एक WHO (विश्व स्वास्थ्य संगठन) रिपोर्ट के आंकड़े तो सच में डराने वाले हैं। दुनिया भर में लाखों लोग सिर्फ इसलिए जान गंवा बैठे क्योंकि वे अपनी क्षमता से बहुत ज्यादा काम कर रहे थे! किसी को हार्ट अटैक आया तो किसी को ब्रेन स्ट्रोक हो गया। रिपोर्ट ने साफ-साफ कहा है कि जो लोग हफ्ते में 55 घंटे या उससे ज्यादा काम करते हैं, उनके लिए मौत का खतरा बहुत ज्यादा बढ़ जाता है! वहीं, जो लोग नॉर्मल 35-40 घंटे काम करते हैं और अपने काम और निजी जिंदगी में बैलेंस रखते हैं, वे एकदम सेफ रहते हैं।
तनाव सिर्फ आपके शरीर को ही नहीं थकाता, यह आपके दिमाग को भी पूरी तरह सुन्न कर देता है। हमेशा थका-थका लगना, डिप्रेशन, किसी काम में मन न लगना और कई बार तो इस घुटन से बचने के लिए सुसाइड तक के खयाल आने लगते हैं! मशहूर मनोवैज्ञानिक करुणा बासकर एकदम पते की बात कहती हैं— "इंसान के दिमाग और शरीर को एक रबर बैंड की तरह समझिए। अगर आप उसे उसकी लिमिट से ज्यादा खींचेंगे, तो एक दिन वह झटके से टूट जाएगा!" और जब वह टूटता है, तो इंसान बिखर जाता है।
शायद ऐसा ही कुछ यूपी के झांसी के रहने वाले तरुण सक्सेना के साथ हुआ। 42 साल के तरुण ने हाल ही में फांसी लगाकर अपनी जान दे दी। उनका सुसाइड नोट पढ़कर सच में किसी की भी आंखें भर आएंगी। उन्होंने लिखा था, "मैं 45 दिनों से ठीक से सोया नहीं हूं। मेरे गले से खाना नहीं उतर रहा है। मैं भारी तनाव में हूं। सीनियर मैनेजर मुझ पर टार्गेट पूरा करने या नौकरी छोड़ने का प्रेशर बना रहे हैं।"
सोचिए, उस इंसान पर क्या गुजरी होगी जिसे अपने परिवार का पेट भी पालना है और ऑफिस में रोज-रोज बेइज्जती भी सहनी है! और यह कोई इकलौता मामला नहीं है। मुंबई में भी काम के भारी दबाव और सीनियर्स की प्रताड़ना के चलते एक बैंक मैनेजर ने अपनी जान दे दी थी। आखिर ये कौन से टार्गेट हैं जो किसी इंसान की जिंदगी से ज्यादा कीमती हो गए हैं?
आखिर दफ्तरों में इतना बवाल क्यों मचा है?
देखिए, कड़ी मेहनत करना कभी भी कोई समस्या नहीं रही। हमारे माता-पिता ने भी जमकर काम किया है। सच तो यह है कि थोड़े बहुत चैलेंज से ही हम अपना बेस्ट दे पाते हैं और नई चीजें सीखते हैं। तो फिर आज दिक्कत कहां आ रही है? करुणा बासकर इसका बड़ा सटीक जवाब देती हैं— "समस्या तब शुरू होती है, जब काम का दबाव हमारी बर्दाश्त करने की बैटरी को एकदम खत्म कर देता है और हमें रिचार्ज होने का मौका ही नहीं मिलता!"
असल में, भारत के कॉरपोरेट जगत ने अमेरिका का 'हसल कल्चर' एकदम अंधों की तरह कॉपी कर लिया है। 'उठो, भागो, वीकेंड पर भी काम करो और बस काम में जुट जाओ!' वाला यह कल्चर हर जगह फैल गया है। अगर आप शनिवार को अपने परिवार के साथ बाहर हैं या आराम कर रहे हैं, तो आपको ऐसा फील कराया जाता है जैसे आप जिंदगी में बहुत पीछे रह जाएंगे।
हाल ही में इन्फोसिस के संस्थापक नारायण मूर्ति ने एक बयान देकर बड़ा विवाद खड़ा कर दिया था। उन्होंने कहा था कि देश की तरक्की के लिए युवाओं को हफ्ते में 70 घंटे काम करना चाहिए! लेकिन जरा रुकिए! इसका नतीजा क्या हुआ? जापान ने भी यही किया था और आज उन्हें इसी वजह से 'काम से मौत' (करोशी) की महामारी का सामना करना पड़ रहा है! हमारे यहां आज भी सबसे देर तक ऑफिस में रुकने वाले को, और जो कभी छुट्टी नहीं लेता, उसी को सबसे 'डेडीकेटेड' और अच्छा एम्प्लॉई माना जाता है। और इसीलिए, भारत दुनिया भर में सबसे ज्यादा घंटे काम करने वाले देशों की लिस्ट में शर्मनाक तरीके से दूसरे नंबर पर है!
'हमेशा ऑनलाइन' रहने का वो भयानक प्रेशर!
आजकल तो ऑफिस का कोई फिक्स टाइम ही नहीं बचा है! पहले लोग 5 बजे या 6 बजे ऑफिस से निकलते थे तो उनका काम वहीं छूट जाता था। लेकिन जबसे ये स्मार्टफोन्स आए हैं, बॉस को लगता है कि हम 24 घंटे उनकी सेवा में उपलब्ध हैं। आप रात को 9 बजे परिवार के साथ शांति से खाना खा रहे हैं और फोन पर वॉट्सऐप या स्लैक (Slack) की 'पिंग' बज उठती है—बस, वहीं से आपका सारा सुकून खत्म!
आजकल भारतीय कंपनियां पूरी दुनिया के क्लाइंट्स (जैसे अमेरिका, यूरोप) का काम संभाल रही हैं। लोग अलग-अलग शिफ्ट्स में काम कर रहे हैं। कई बार क्लाइंट्स ऐसे डेडलाइन तय कर देते हैं जो बिल्कुल अजीब और नामुमकिन होते हैं! आईटी (IT) और कंसल्टिंग जॉब्स में तो लोगों को शांति से लंच करने तक की फुरसत नहीं मिलती। करण नाम के एक 30 साल के युवा ने अपना दर्द बांटते हुए बताया, "रात 12 या 1 बजे लैपटॉप बंद करना तो हमारे लिए एकदम नॉर्मल सी बात हो गई है! अगर हम रात 9 बजे लॉग ऑफ कर लें, तो अगले दिन बॉस तिरछी निगाहों से देखता है।"
यही हाल सेल्स और मार्केटिंग वालों का भी है। उन्हें हर महीने टार्गेट्स का वो पहाड़ पार करना होता है जो मैनेजमेंट ने एसी कमरों में बैठकर तय किया है। और इन सबके ऊपर सोने पर सुहागा—दफ्तर का 'टॉक्सिक' माहौल! कई बार मैनेजर अपनी सारी फ्रस्ट्रेशन, अपना गुस्सा और अपना प्रेशर अपनी टीम पर निकाल देते हैं। एक सर्वे के मुताबिक भारत के 62% कर्मचारी भयंकर स्ट्रेस में हैं! देविका धर्मराज बिल्कुल सही कहती हैं— "हम हैं तो जीते-जागते इंसान, लेकिन हम खुद के साथ और एक-दूसरे के साथ मशीनों जैसा बर्ताव कर रहे हैं!"
बीच वाले मैनेजर तो सैंडविच बने हुए हैं!
अगर आपको लगता है कि सिर्फ फ्रेशर्स परेशान हैं, तो आप गलत हैं। जो मिडिल लेवल के मैनेजर हैं, उनकी हालत तो शायद सबसे ज्यादा खराब है! वे तो बेचारें सैंडविच बन गए हैं। एक तरफ टॉप मैनेजमेंट का भयंकर प्रेशर होता है कि "रिजल्ट लाओ, प्रॉफिट बढ़ाओ", और दूसरी तरफ अपनी टीम का मनोबल बनाए रखना होता है जो पहले से ही काम के बोझ से दबी हुई है। टॉप मैनेजमेंट भी चैन से नहीं बैठा है, बाजार में इतनी गलाकाट प्रतियोगिता है कि वो भी बस किसी भी कीमत पर नंबर और प्रॉफिट के पीछे भाग रहे हैं।
युवाओं में इतनी बेकरारी और चिड़चिड़ापन क्यों है?
आज की जेन जी और मिलेनियल्स पीढ़ी बहुत महत्वाकांक्षी है। इन्हें सब कुछ बहुत जल्दी चाहिए—जल्दी प्रमोशन, जल्दी पैसा और जल्दी कामयाबी। ये लोग इतनी जल्दी-जल्दी नौकरियां बदलते हैं कि ऑफिस में कोई लंबी दोस्ती, मेंटरशिप या एक-दूसरे पर भरोसा बन ही नहीं पाता। पहले ऑफिस में लोग एक परिवार की तरह होते थे, जो बुरे वक्त में साथ खड़े होते थे।
लेकिन 'वर्क फ्रॉम होम' (WFH) ने तो लोगों को और भी अलग-थलग कर दिया है। आज के युवा फोन और सोशल मीडिया की वर्चुअल दुनिया में ज्यादा बिजी हैं, जिससे उनमें असल जिंदगी का धैर्य खत्म हो गया है। और सबसे दुख की बात? 12-12 घंटे लैपटॉप स्क्रीन के सामने बिताने और घंटों ट्रैफिक में धक्के खाने के बाद, दोस्तों और परिवार के लिए टाइम ही कहां बचता है? इंसान बस एक रोबोट बनकर रह गया है जो वीकेंड पर सिर्फ सोकर अपनी थकान मिटाता है।
शरीर पर पड़ता है सीधा असर! ईएमआई का जाल!
जब भी कोई डेडलाइन सामने होती है या बॉस की डांट पड़ने वाली होती है, तो शरीर घबराहट में आ जाता है। वो 'फाइट या फ्लाइट' मोड में चला जाता है। अगर आप रोज-रोज, हर मिनट इस स्ट्रेस में रहते हैं, तो ये आपके दिल और दिमाग दोनों के लिए बहुत खतरनाक है। 'संडे नाइट एंग्जायटी' (सोमवार की सुबह ऑफिस जाने का डर) तो आप सबने महसूस किया होगा! रविवार की शाम होते ही मूड खराब होने लगता है और सोमवार को ऑफिस पहुंचते ही ऐसा लगता है जैसे सारी एनर्जी किसी ने सोख ली हो।
कई लोग इस नौकरी को छोड़ भी नहीं पाते क्योंकि उन पर ईएमआई (EMI) का भारी जाल होता है—घर का लोन, गाड़ी का लोन, महंगे फोन का लोन। स्ट्रेस से भयंकर सिरदर्द, हाई बीपी, पेट खराब रहना, बाल झड़ना और रातों की नींद उड़ जाना जैसी दिक्कतें आम हो गई हैं। चिड़चिड़ापन इतना बढ़ जाता है कि लोग इसे कम करने के लिए सिगरेट, शराब या जंक फूड का सहारा लेने लगते हैं, जो स्थिति को और भी बदतर बना देता है।
तो फिर इसका उपाय क्या है? क्या हम ऐसे ही पिसते रहेंगे?
डॉ. ब्योत्रा का सीधा सा कहना है— कंपनियों को यह गहराई से समझना होगा कि इंसानों को रोज 7-8 घंटे की अच्छी नींद, सेहतमंद खाना और आराम की सख्त जरूरत है। शरीर कोई सॉफ्टवेयर नहीं है कि उसे अपडेट किया और वो लगातार चलता रहेगा! यह सोचना ही गलत है कि 5 दिन मशीन की तरह बिना थके लग जाओ और सिर्फ वीकेंड के दो दिन में आराम करके मंडे को फिर से ताजे हो जाओ।
कोविड महामारी के बाद से दुनिया में काफी कुछ बदला है। आज का युवा समझ गया है कि 'नौकरी ही जिंदगी नहीं है, यह बस जिंदगी को चलाने का एक छोटा सा हिस्सा है।' वे अपनी आजादी, अपनी हॉबीज और मानसिक शांति से कोई समझौता नहीं करना चाहते।
अच्छी बात यह है कि अब कर्मचारी भी इस टॉक्सिक कल्चर के खिलाफ खुलकर अपनी आवाज उठाने लगे हैं। सोशल मीडिया पर लोग अपनी कंपनियों की पोल खोल रहे हैं। कुछ समझदार कंपनियां भी अब जाग रही हैं। वे समझ रही हैं कि सिर्फ 'फ्री पिज्जा', 'फ्राइडे को समोसा' या ऑफिस में 'पिंग-पोंग टेबल' देने से मेंटल हेल्थ ठीक नहीं होगी। आइकिया (IKEA) और अमरा राजा जैसी बड़ी और अच्छी कंपनियां अब अपने कर्मचारियों के लिए ऑफिस में ही फुल-टाइम काउंसलर रख रही हैं, जहां लोग जाकर अपने मन की भड़ास निकाल सकते हैं।
लीडर्स को खुद पेश करनी होगी मिसाल!
लेकिन एक बात साफ है—जब तक टॉप लीडर्स खुद मिसाल पेश नहीं करेंगे, कुछ नहीं बदलेगा! अगर कंपनी का बॉस या वाइस प्रेसिडेंट खुद छुट्टी पर जाकर भी लैपटॉप खोलकर ईमेल का रिप्लाई करेगा, तो उसका जूनियर कैसे आराम से अपनी छुट्टियां एन्जॉय करेगा? उसे भी लगेगा कि उसे काम करना चाहिए।
कंपनियों को अपने काम करने के तरीके, डेडलाइंस और क्लाइंट्स के साथ कमिटमेंट को ही बदलना होगा। एक इंसान पर चार लोगों का काम लादकर फिर उसे 'स्ट्रेस मैनेजमेंट' की एक घंटे की काउंसलिंग देना तो कोई समझदारी नहीं हुई न! यह तो जले पर नमक छिड़कने जैसा है। अगर लोग लगातार 12-14 घंटे काम कर रहे हैं, तो इसका सीधा मतलब यह है कि कंपनी नए लोगों को हायर करने में कंजूसी कर रही है और पैसे बचा रही है।
अपने कर्मचारियों की मेंटल हेल्थ को इग्नोर करना कंपनियों के लिए भी बहुत बड़ा और महंगा घाटा है। एक डेलॉइट की रिपोर्ट के मुताबिक, एम्प्लॉइज के बीमार पड़ने, छुट्टियां लेने और फ्रस्ट्रेट होकर नौकरी छोड़ने की वजह से भारतीय कंपनियों को हर साल लगभग 1.18 लाख करोड़ रुपये का भारी नुकसान होता है!
जरा सोचिए, जो देश दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का सुनहरा सपना देख रहा है, क्या वह अपने युवाओं की सेहत और उनकी जिंदगियों को दांव पर लगाकर यह मुकाम हासिल कर पाएगा? बिल्कुल नहीं! असली और टिकाऊ तरक्की तभी होगी जब काम करने वाले लोग खुश, तनावमुक्त और एकदम स्वस्थ रहेंगे। आखिर, जान है तो जहान है!
