भारत-अमेरिका ट्रेड डील: अमेरिका न जाने का फैसला कोई डर नहीं, बल्कि भारत की 'स्मार्ट चाल' है! जानें 15% टैरिफ की पूरी कहानी
बिजनेस और डिप्लोमेसी डेस्क, नई दिल्ली | 21-22 फरवरी 2026 की रात को जब भारत ने अमेरिका को बताया कि हमारे अफसर 23-24 फरवरी की अहम मीटिंग के लिए वाशिंगटन नहीं आ रहे हैं, तो ये कोई छोटी बात नहीं थी! सोचिए, वाशिंगटन में मीटिंग की पूरी तैयारी थी, फाइलों पर धूल झाड़ी जा रही थी, और अचानक दिल्ली से मैसेज जाता है— 'सॉरी बॉस, अभी नहीं!' कूटनीति की दुनिया में इसे नई दिल्ली का एक बहुत ही सोच-समझकर लिया गया 'स्मार्ट फैसला' माना जा रहा है।
भारत ने दुनिया को एकदम साफ कर दिया है कि व्यापार अब 'दिखावे' या किसी के दबाव में आकर नहीं, बल्कि 'समझदारी और पूरे सब्र' के साथ होगा!
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा झटका और ट्रंप का नया दांव
भारत का ये फैसला तब आया जब कुछ ही दिन पहले अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने वहां की ट्रेड पॉलिसी की पूरी तस्वीर ही पलट कर रख दी!
- 6-3 का ऐतिहासिक फैसला: सुप्रीम कोर्ट ने 6-3 के भारी बहुमत से कहा कि राष्ट्रपति के पास अपनी मर्जी से 'टैरिफ' (टैक्स) थोपने की कोई मनमानी ताकत नहीं है। बरसों से ट्रंप जिस 'टैरिफ कार्ड' को अपनी जेब में लेकर घूमते थे और बात-बात पर दूसरे देशों को डराते थे, कोर्ट ने उस कार्ड को ही अमान्य कर दिया। इस फैसले ने डोनाल्ड ट्रंप के उस 'माय वे और हाईवे' वाले रवैये की जड़ें हिला दीं, जिसके दम पर वे दूसरे देशों पर भारी टैक्स लगाते थे।
- धारा 122 का इस्तेमाल: अचानक अपने हाथ से पावर छिनते देख ट्रंप प्रशासन में हड़कंप मच गया। आनन-फानन में अपनी इज्जत बचाने के लिए उन्होंने 1974 के ट्रेड एक्ट की 'धारा 122' का इस्तेमाल कर डाला। ये एक ऐसा पुराना और धूल फांकता हुआ नियम है जो राष्ट्रपति को बिना संसद की मंज़ूरी के 150 दिनों के लिए 15% तक टैक्स लगाने की 'इमरजेंसी' छूट देता है!
- यूनिवर्सल टैरिफ: अमेरिका ने दुनिया भर के लिए एक जैसा 'अस्थाई टैक्स' (पहले 10% और फिर बढ़ाकर 15%) लगा दिया। इसका सीधा सा मकसद ये था कि कोर्ट के तगड़े झटके के बावजूद ट्रंप दुनिया को ये दिखा सकें कि 'मैं अभी भी सख्त हूँ!'
80% डील पक्की थी, फिर भारत ने कदम क्यों पीछे खींचे?
भारत के लिए इस अचानक हुए बदलाव ने महीनों की कड़ी मेहनत पर पानी फेर दिया। दोनों देशों के अफसर दिन-रात एक करके जो ड्राफ्ट बना रहे थे, वो अब किसी काम का नहीं रहा। जानकारों की मानें तो समझौते का 80% हिस्सा लगभग तैयार था!
जो डील बन रही थी, वो पुराने टैक्स ढांचे पर टिकी थी। उसमें भारत को मिलने वाली खास छूट (GSP) और अमेरिका के खेती (जैसे वाशिंगटन के सेब और कैलिफोर्निया के बादाम) और मेडिकल सामानों को भारत में आसानी से एंट्री देने जैसी कई अहम बातों पर रजामंदी बननी थी। सब कुछ सेट था, बस फाइनल मोहर लगनी बाकी थी!
लेकिन अब खेल बदल गया। वाणिज्य मंत्रालय के एक सीनियर अफसर ने स्थिति को मज़ेदार तरीके से समझाते हुए चुटकी ली:
"जब बेसिक नंबर ही बदल गया हो, तो आप प्रतिशत पर मोलभाव कैसे कर सकते हैं? मान लीजिए आप 100 रुपये की चीज़ पर डिस्काउंट मांग रहे थे, और अचानक कोई कहे कि अब कीमत 150 रुपये है!" भारत अब साफ तौर पर जानना चाहता है कि ये 15% वाला नया टैक्स आगे भी रहेगा या 150 दिन बाद हवा हो जाएगा? और सबसे बड़ी बात ये है कि अमेरिकी संसद (जहां ट्रंप का बहुमत बहुत मामूली है) इस पर क्या फैसला लेती है! जब तक ये क्लियर नहीं होता, डील करने का कोई मतलब नहीं है।
भारत का पलड़ा भारी: जल्दबाजी नहीं, अब चाहिए 'भरोसा'
फरवरी की शुरुआत तक सौदेबाजी में अमेरिका का पलड़ा भारी था, क्योंकि भारत अपने सामानों पर टैक्स में छूट मांग रहा था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अमेरिकी सरकार की सौदेबाजी की ताकत आधी रह गई है। अब वो जो भी छूट देगी, उसकी कोई गारंटी नहीं है, उसे वहां के कोर्ट में कोई भी चुनौती दे सकता है।
भारत को कोई जल्दी नहीं है, क्योंकि सारे आंकड़े हमारे साथ हैं! और ये आंकड़े सच में शानदार हैं:
- पिछले साल अमेरिकी टैक्स के बावजूद भारत का एक्सपोर्ट 6.8% बढ़कर 86 अरब डॉलर पहुंच गया! यानी ट्रंप के पुराने टैरिफ के बावजूद हमारा माल अमेरिका में धड़ल्ले से बिक रहा है।
- भारत और अमेरिका के बीच कुल व्यापार 2024 में 212 अरब डॉलर के पार जा चुका था।
- ये वाशिंगटन न जाने वाला ब्रेक भारत के स्टील, एल्युमीनियम और ऑटो सेक्टर के कारोबारियों को बड़ी तसल्ली देता है। वो अब सुकून की सांस ले रहे हैं कि सरकार उनकी चिंताओं को दरकिनार कर जल्दबाजी में कोई भी खराब डील साइन करके नहीं आएगी।
आगे क्या होगा? 150 दिन का इंतज़ार!
फिलहाल पूरी दुनिया में इस नए टैक्स को लेकर अनिश्चितता और थोड़ी घबराहट है। वियतनाम, थाईलैंड और मलेशिया जैसे देश, जो अब तक चीन-अमेरिका ट्रेड वॉर का जमकर मज़ा ले रहे थे और खूब माल छाप रहे थे, वे भी अब भारत की तरह ही 15% टैक्स के लपेटे में आ गए हैं। वहां तो जैसे हड़कंप मचा हुआ है!
लेकिन ऐसे अफरातफरी वाले माहौल में भारत का सब्र करना काफी समझदारी भरा और कूल कदम है। मोदी सरकार अब पूरी तरह से 'वेट एंड वॉच' के मूड में है। वो देखेगी कि क्या अमेरिकी संसद इस टैक्स को कोर्ट में चुनौती देती है या खुद अमेरिकी बड़ी कंपनियां इसके खिलाफ खड़ी होती हैं। अगर 150 दिन बाद ये टैक्स अपने आप खत्म हो जाता है, तो बातचीत फिर से एक पक्की और भरोसेमंद ज़मीन पर शुरू होगी!
सीधे शब्दों में कहें तो
आज के दौर में इंटरनेशनल व्यापार सिर्फ टैक्स या मुनाफे का खेल नहीं है, बल्कि ये पूरी तरह से 'भरोसे' का खेल है! पिछले 10 सालों में भारत ने देखा है कि अमेरिका कभी उदारीकरण और फ्री-ट्रेड की मीठी-मीठी बातें करता है तो कभी अपनी मर्जी चलाता है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने दिखा दिया कि वहां की सरकार के साथ किया गया एग्रीमेंट भी कभी भी पलटा जा सकता है। भारत अब ऐसे किसी जाल में नहीं फंसना चाहता। वाशिंगटन की फ्लाइट टालना नई दिल्ली की गजब की समझदारी और 'हम किसी से कम नहीं' वाले एटीट्यूड को दिखाता है!
