चंद्र ग्रहण 2026: क्या ग्रहण के दौरान किया जा सकता है अंतिम संस्कार? जानें गरुड़ पुराण और शास्त्रों के नियम
नेशनल डेस्क | इस साल 3 मार्च 2026 को चंद्र ग्रहण लगने जा रहा है। हिंदू धर्म और वैदिक ज्योतिष में ग्रहण (Eclipse) को अक्सर एक अशुभ और संवेदनशील समय माना जाता है। सूतक काल और ग्रहण के दौरान पूजा-पाठ, हवन, शुभ कार्य और यहां तक कि भोजन पकाना भी वर्जित होता है। लेकिन ऐसे में एक बड़ा और संवेदनशील सवाल उठता है कि यदि ग्रहण के दौरान किसी व्यक्ति का देहांत हो जाए, तो क्या उसका अंतिम संस्कार (Antim Sanskar) किया जा सकता है या नहीं? आइए जानते हैं इस विषय पर शास्त्र और गरुड़ पुराण क्या कहते हैं।
ग्रहण के दौरान धार्मिक मान्यताएं और रस्में
हिंदू धर्म में मृत्यु के बाद शव का शीघ्र अंतिम संस्कार करना बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। मान्यता है कि इससे मृतक की आत्मा को भटकाव से मुक्ति मिलती है और मोक्ष की प्राप्ति आसान हो जाती है।
सामान्य समय में अंतिम संस्कार के दौरान कई पवित्र रस्में निभाई जाती हैं, जैसे:
- मृतक के सिरहाने तिल के तेल का दीपक जलाना।
- मृतक के शरीर पर पवित्र गंगाजल का छिड़काव करना।
- आत्मा की शांति के लिए मृतक के मुंह में तुलसी का पत्ता रखना।
- अंत में पूरे विधि-विधान और मंत्रोच्चार के साथ मुखाग्नि (अग्नि प्रज्जवलित) देना।
हालांकि, ग्रहण के दौरान किसी भी प्रकार की पूजा सामग्री को स्पर्श करना या अग्नि प्रज्ज्वलित करना पूरी तरह से अशुभ माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ग्रहण के दूषित समय में ये सभी कर्म किए बिना अंतिम संस्कार करने से आत्मा की शांति में भारी बाधा आ सकती है।
इस दुविधा पर शास्त्र और गरुड़ पुराण क्या कहते हैं?
जीवन और मृत्यु से जुड़े इन जटिल सवालों का उत्तर गरुड़ पुराण में स्पष्ट रूप से दिया गया है:
- शव को रोकना अनुचित: गरुड़ पुराण में स्पष्ट लिखा है कि मृत्यु के बाद शव का यथाशीघ्र दाह संस्कार कर देना चाहिए। आत्मा की आगे की यात्रा के लिए शव को रोककर रखना या विलंब करना उचित नहीं माना गया है।
- सूतक और ग्रहण का प्रभाव: हालांकि, चंद्र ग्रहण या सूर्य ग्रहण जैसी अशुभ अवधि में पारंपरिक पूजा-पाठ और शुभ कर्म नहीं किए जाते हैं।
शास्त्रसम्मत दृष्टिकोण (समाधान):
- प्राथमिकता (अगर संभव हो): शास्त्रों के अनुसार, यदि संभव हो तो ग्रहण का मोक्ष (समाप्ति) होने तक का इंतजार करना चाहिए। ग्रहण समाप्त होने के बाद स्नान कर, शुद्ध होकर ही अंतिम संस्कार की प्रक्रिया शुरू करनी चाहिए ताकि सभी धार्मिक कर्म और रस्में सही तरीके से पूरी की जा सकें।
- अत्यावश्यक परिस्थिति: लेकिन यदि परिस्थिति अत्यावश्यक हो (जैसे मृत्यु को काफी समय हो चुका हो या अन्य कारण हों), तो ग्रहण के दौरान भी अंतिम संस्कार किया जा सकता है। शास्त्रों में यह छूट दी गई है क्योंकि शव को बहुत लंबे समय तक बिना दाह किए रखना या सड़ने देना धार्मिक और वैज्ञानिक दोनों ही दृष्टियों से अनुचित माना गया है।
संपादकीय विश्लेषण
जन्म और मृत्यु पर मनुष्य का कोई वश नहीं है। हिंदू धर्म के शास्त्र बेहद व्यावहारिक (Practical) हैं। जहां एक ओर वे ग्रहण काल में नकारात्मक ऊर्जा से बचने के लिए पूजा-पाठ रोकने की सलाह देते हैं, वहीं दूसरी ओर 'शव की दुर्गति न हो' इस बात को सर्वोपरि रखते हुए आपात स्थिति में अंतिम संस्कार की अनुमति भी देते हैं। इसका सीधा अर्थ है कि धर्म में हठधर्मिता से अधिक इंसानियत और मृत देह के सम्मान को प्राथमिकता दी गई है।
