Delhi High Court: महिपालपुर मेट्रो स्टेशन का नाम बदलने की याचिका खारिज, कोर्ट का बड़ा फैसला
नेशनल डेस्क। दिल्ली हाईकोर्ट ने सोमवार, 2 फरवरी 2026 को मेट्रो स्टेशन के नाम बदलने से जुड़ी एक अहम याचिका पर बड़ा फैसला सुनाया। कोर्ट ने महिपालपुर मेट्रो स्टेशन का नाम ‘रंगपुरी’ करने की मांग को खारिज कर दिया।
अदालत ने साफ कहा कि मेट्रो स्टेशनों का नाम तय करना सरकार और Delhi Metro Rail Corporation (DMRC) का नीतिगत और प्रशासनिक अधिकार है। जब तक कोई फैसला पूरी तरह मनमाना या संविधान के खिलाफ न हो, तब तक न्यायपालिका इसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकती।
यह फैसला राजधानी में मेट्रो स्टेशनों के नामकरण को लेकर चल रहे विवादों के बीच काफी अहम माना जा रहा है।
कोर्ट ने क्या कहा?
इस मामले की सुनवाई Delhi High Court की एकल पीठ ने की। जस्टिस Purushendra Kumar Kaurav की बेंच ने स्पष्ट किया कि—
- अदालत DMRC या सरकार को नाम बदलने का आदेश नहीं दे सकती
- स्टेशन का नामकरण एक पॉलिसी मैटर है
- न्यायिक हस्तक्षेप सीमित दायरे में ही संभव है
कोर्ट ने कहा कि ऐसे फैसले प्रशासनिक स्तर पर लिए जाते हैं और इसमें न्यायपालिका की भूमिका बेहद सीमित होती है।
DMRC को दिए गए अहम निर्देश
हालांकि कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं की शिकायत को पूरी तरह नजरअंदाज भी नहीं किया। अदालत ने DMRC और संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिए कि—
- याचिका पर गंभीरता से विचार किया जाए
- छह सप्ताह के भीतर निर्णय लिया जाए
- जरूरत पड़ने पर अन्य विभागों से भी राय ली जाए
कोर्ट का कहना था कि नागरिकों की चिंताओं को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता, इसलिए प्रशासन को इस पर विचार जरूर करना चाहिए।
याचिका में क्या थी मांग?
यह याचिका रंगपुरी गांव की रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन (RWA) की ओर से दायर की गई थी।
याचिकाकर्ताओं का दावा था कि—
- दिल्ली मेट्रो फेज-4 की गोल्डन लाइन (एयरोसिटी से तुगलकाबाद) पर बनने वाला महिपालपुर स्टेशन
- जिस जमीन पर बन रहा है, उसका बड़ा हिस्सा रंगपुरी गांव से जुड़ा है
- नामकरण नीति के अनुसार स्टेशन का नाम उसी क्षेत्र के नाम पर होना चाहिए
RWA ने यह भी आरोप लगाया कि जब उन्होंने अधिकारियों से संपर्क किया, तो उन्हें टालमटोल वाले जवाब मिले और जिम्मेदारी एक विभाग से दूसरे विभाग पर डाली जाती रही।
क्यों संवेदनशील है यह मामला?
महिपालपुर और रंगपुरी, दोनों ही Indira Gandhi International Airport के पास स्थित शहरी गांव हैं। बीते कुछ वर्षों में इन इलाकों में तेजी से शहरीकरण हुआ है।
इसके साथ ही—
- स्थानीय पहचान का मुद्दा
- पारंपरिक नामों का संरक्षण
- क्षेत्रीय सम्मान की भावना
भी मजबूत हुई है। यही वजह है कि मेट्रो स्टेशन के नाम को लेकर यह विवाद सामने आया।
स्थानीय पहचान बनाम प्रशासनिक नीति
इस मामले ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि—
- क्या स्टेशनों के नाम स्थानीय पहचान पर होने चाहिए?
- या फिर प्रशासनिक सुविधा और नीति को प्राथमिकता मिलनी चाहिए?
विशेषज्ञों का मानना है कि नामकरण से जुड़ा हर फैसला संतुलन के साथ होना चाहिए, ताकि किसी भी समुदाय में असंतोष न पैदा हो।
DMRC और सरकार पर टिकी निगाहें
कोर्ट के फैसले के बाद अब पूरा ध्यान DMRC और दिल्ली सरकार के अगले कदम पर टिका है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि—
- क्या प्रशासन रंगपुरी RWA की मांग पर दोबारा विचार करेगा?
- या मौजूदा नाम के साथ ही आगे बढ़ेगा?
आने वाले छह सप्ताह में इस पर अंतिम फैसला लिया जा सकता है।
पहले भी सामने आ चुके हैं ऐसे विवाद
दिल्ली मेट्रो फेज-4 के कई स्टेशनों को लेकर पहले भी नामकरण विवाद सामने आ चुके हैं। कुछ मामलों में स्थानीय लोगों ने विरोध किया, तो कहीं राजनीतिक स्तर पर भी बहस हुई।
इस फैसले से अब यह साफ हो गया है कि अदालत ऐसे मामलों में सीमित भूमिका ही निभाएगी।
जनता पर क्या पड़ेगा असर?
इस फैसले का सीधा असर उन लोगों पर पड़ा है, जो मेट्रो स्टेशनों के नामों में स्थानीय पहचान को प्राथमिकता देने की मांग कर रहे थे।
अब भविष्य में ऐसे मामलों में लोगों को सीधे कोर्ट जाने के बजाय प्रशासनिक स्तर पर अपनी बात रखनी होगी।
हमरी राय में
हमरी राय में, दिल्ली हाईकोर्ट का यह फैसला कानून और प्रशासनिक संतुलन के लिहाज से सही दिशा में उठाया गया कदम है। मेट्रो स्टेशनों का नामकरण एक नीतिगत फैसला होता है, जिसमें अदालत का सीमित हस्तक्षेप ही उचित है।
हालांकि, सरकार और DMRC को भी चाहिए कि वे स्थानीय लोगों की भावनाओं और पहचान का सम्मान करें। अगर संवाद और पारदर्शिता के साथ फैसले लिए जाएं, तो ऐसे विवादों से बचा जा सकता है। संतुलित सोच ही शहर के विकास और सामाजिक सौहार्द दोनों के लिए जरूरी है।
