टी20 वर्ल्ड कप 2026: भानुका राजपक्षे के 'सुपीरियर बैट' वाले बयान पर मचा बवाल, अब श्रीलंकाई दिग्गज ने दी सफाई; जानें क्या है पूरा सच
स्पोर्ट्स डेस्क, नई दिल्ली | टी20 वर्ल्ड कप 2026 के रोमांच के बीच एक नया विवाद खड़ा हो गया है। श्रीलंका के आक्रामक बल्लेबाज भानुका राजपक्षे द्वारा भारतीय खिलाड़ियों के बल्लों (Bats) को लेकर की गई एक टिप्पणी ने सोशल मीडिया से लेकर क्रिकेट गलियारों तक बहस छेड़ दी थी। हालांकि, बढ़ते विवाद को देखते हुए अब राजपक्षे ने इस पर अपनी विस्तृत सफाई पेश की है।
क्या था पूरा मामला?
विवाद की शुरुआत राजपक्षे के एक हालिया इंटरव्यू से हुई, जिसमें उन्होंने कथित तौर पर यह संकेत दिया था कि भारतीय खिलाड़ियों के पास ऐसे "सुपीरियर" बल्ले हैं जो अन्य टीमों के पास उपलब्ध नहीं हैं। उनके बयान से यह आभास हुआ कि ये बल्ले अतिरिक्त पावर (Extra Power) पैदा करते हैं, जिससे भारतीय बल्लेबाज आसानी से लंबे छक्के जड़ने में सक्षम होते हैं।
यह टिप्पणी सामने आते ही क्रिकेट जगत में 'फेयर प्ले' को लेकर सवाल उठने लगे। सोशल मीडिया पर इसे 'बैट टेंपरिंग' या तकनीकी धोखाधड़ी तक से जोड़कर देखा जाने लगा।
राजपक्षे की सफाई: "मेरे बयान को गलत समझा गया"
विवाद बढ़ता देख राजपक्षे ने स्पष्ट किया कि उनका मकसद किसी भी तरह का आरोप लगाना नहीं था। उन्होंने सोशल मीडिया पर पोस्ट साझा करते हुए लिखा:
"मेरा इरादा भारत की क्रिकेट व्यवस्था की तारीफ करना था। भारत का सिस्टम, इंफ्रास्ट्रक्चर और उपकरण मानक (Equipment Standards) बेहद उन्नत हैं। मेरे बयान के कुछ हिस्से अनुवाद (Translation) के दौरान गलत तरीके से पेश किए गए। मैं केवल यह कह रहा था कि उनके पास सर्वश्रेष्ठ संसाधन उपलब्ध हैं।"
ICC के नियम और हकीकत
क्रिकेट की नियामक संस्था आईसीसी (ICC) के नियम बल्ले के निर्माण को लेकर बेहद सख्त हैं:
- सामग्री: आईसीसी नियम 5.4.2 के अनुसार, बल्ला पूरी तरह से प्राकृतिक लकड़ी (Willow) का होना चाहिए।
- जांच: मैचों के दौरान अंपायर नियमित रूप से बल्लों की मोटाई (Thickness), किनारों (Edges) और वजन की जांच करते हैं।
- प्रतिबंध: किसी भी प्रकार की कृत्रिम लेयर या संरचनात्मक बदलाव (जैसे कार्बन फाइबर का उपयोग) सख्त मना है।
भारतीय टीम के खिलाफ अब तक कोई आधिकारिक शिकायत दर्ज नहीं की गई है और न ही आईसीसी ने इस मामले में कोई जांच शुरू की है, जो यह दर्शाता है कि भारतीय खिलाड़ियों के उपकरण पूरी तरह नियमों के दायरे में हैं।
'सुपीरियर बैट' की तकनीकी सच्चाई: विशेषज्ञों की राय
खेल विशेषज्ञों का मानना है कि 'सुपीरियर बैट' का मतलब कोई जादुई ताकत नहीं, बल्कि 'कस्टमाइजेशन' है। आधुनिक क्रिकेट में भारतीय खिलाड़ी (विशेषकर सूर्या, यशस्वी जायसवाल और शुभमन गिल) उच्च गुणवत्ता वाले 'ग्रेड-1' इंग्लिश विलो का उपयोग करते हैं।
- डकबिल प्रोफाइल (Duckbill Profile): यह आजकल बहुत लोकप्रिय है। इसमें बल्ले का वजन नीचे की ओर संतुलित किया जाता है जिससे 'पिक-अप' हल्का महसूस होता है और बल्ले की गति (Bat Speed) बढ़ जाती है।
- पावर हिटिंग एज: बल्लों के किनारों को 40mm तक रखा जाता है, जो अधिकतम पावर ट्रांसफर सुनिश्चित करते हैं।
- आर्थिक बढ़त: आईपीएल (IPL) और बीसीसीआई के मजबूत आर्थिक ढांचे के कारण, भारतीय खिलाड़ियों को दुनिया के बेहतरीन बैट-मेकर्स तक सीधी पहुंच मिलती है, जो उनके खेलने की शैली के अनुसार बल्ले को 'ट्यून' करते हैं।
डेटा और रैंकिंग का सच
अगर आंकड़ों पर नजर डालें, तो भारत की सफलता का राज उनके बल्ले नहीं बल्कि उनकी फॉर्म है:
- T20I टीम रैंकिंग: भारत वर्तमान में दुनिया की नंबर 1 टीम है (रेटिंग: 268)।
- स्ट्राइक रेट: भारतीय टॉप-ऑर्डर का औसत स्ट्राइक रेट इस वर्ल्ड कप में 155.4 रहा है, जो टूर्नामेंट में सबसे अधिक है।
- सिक्स हिटिंग रिकॉर्ड: 2024-26 के बीच भारत ने टी20 अंतरराष्ट्रीय में सबसे ज्यादा छक्के (500+) जड़ने का रिकॉर्ड बनाया है।
पहले भी उठ चुके हैं निराधार सवाल
यह पहली बार नहीं है जब टीम इंडिया की सफलता पर उंगली उठी हो।
2023 वनडे वर्ल्ड कप: पाकिस्तान के हसन रजा ने दावा किया था कि भारतीय गेंदबाजों को 'अलग गेंदें' दी जा रही हैं। उस बयान को वसीम अकरम जैसे दिग्गजों ने 'बकवास' करार दिया था।
विशेषज्ञों का मत: "अक्सर जब कोई टीम लगातार डोमिनेट करती है, तो प्रतिद्वंद्वी तकनीकी कारणों में दोष ढूंढने लगते हैं। असलियत कड़ी मेहनत और बेहतर तैयारी है।"
संपादकीय विश्लेषण
राजपक्षे का बयान और फिर उस पर दी गई सफाई खेल जगत की उस असुरक्षा को दर्शाती है जो भारत के प्रभुत्व से पैदा हुई है। भारतीय क्रिकेट अब केवल मैदान पर ही नहीं, बल्कि खेल विज्ञान और संसाधनों के मामले में भी काफी आगे निकल चुका है। बीसीसीआई का मजबूत ढांचा खिलाड़ियों को वह तकनीक प्रदान करता है जो शायद कई छोटे बोर्ड्स के लिए सपना है।
किसी भी खिलाड़ी के लिए बल्ला उसका हथियार होता है, और अगर वह हथियार दुनिया के सर्वश्रेष्ठ इंजीनियरों और कारीगरों द्वारा तैयार किया गया है, तो उसे 'फायदा' मिलना स्वाभाविक है। लेकिन यह फायदा नियमों के दायरे में है। खेल भावना की मांग है कि हम तकनीक को दोष देने के बजाय, उस स्तर तक पहुंचने की कोशिश करें। भारतीय खिलाड़ियों की सफलता उनकी टाइमिंग और कौशल का परिणाम है, न कि किसी 'सुपीरियर' लकड़ी का।
