एआई सुलभ और किफायती होनी चाहिए: एआई इम्पैक्ट समिट में बोले अमिताभ कांत
नई दिल्ली। नीति आयोग के पूर्व मुख्य कार्यपालक अधिकारी और जी-20 के पूर्व शेरपा अमिताभ कांत ने कहा है कि कृत्रिम मेधा एक अत्यंत परिवर्तनकारी प्रौद्योगिकी है, जो जीवन के हर क्षेत्र को प्रभावित करेगी। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि एआई को सुलभ, किफायती और जवाबदेह नहीं बनाया गया, तो वैश्विक असमानताएं और बढ़ सकती हैं।
राष्ट्रीय राजधानी में आयोजित एआई इम्पैक्ट समिट के एक सत्र ‘भारत की अगली एक अरब आबादी के लिए एआई: समावेशी एवं भविष्य के लिए तैयार वृद्धि के लिए अंतरपीढ़ीगत अंतर्दृष्टि’ में उन्होंने यह बात कही।
ओपन-सोर्स मॉडल से तेज प्रगति
अमिताभ कांत ने कहा कि भारत ने कम समय में दशकों की प्रगति को पीछे छोड़ दिया है। इसका मुख्य कारण भारत की डिजिटल प्रणालियों का ‘ओपन-सोर्स आर्किटेक्चर’, ‘ओपन एपीआई’ और वैश्विक पारस्परिकता पर आधारित होना है।
उनके अनुसार, यही मॉडल भारत को डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना में अग्रणी बनाता है और एआई के क्षेत्र में भी यही दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए।
असमानता बढ़ने की आशंका
कांत ने कहा कि एआई में भारी निवेश हो रहा है, जिससे बड़े पैमाने पर व्यवधान उत्पन्न हो सकता है। उन्होंने आगाह किया कि यदि सावधानी नहीं बरती गई, तो समाज अत्यधिक असमान हो सकता है।
उन्होंने सवाल उठाया कि क्या एआई गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों तक पहुंचेगी, क्या यह शिक्षा, स्वास्थ्य और पोषण जैसी बुनियादी समस्याओं का समाधान कर पाएगी, और क्या यह नागरिकों के जीवन में वास्तविक बदलाव ला सकेगी।
बहुभाषी एआई की जरूरत
अमिताभ कांत ने जोर देकर कहा कि एआई प्रणालियां बहुभाषी होनी चाहिए। यदि तकनीक केवल सीमित भाषाओं तक सिमट गई, तो आबादी का बड़ा हिस्सा इससे वंचित रह जाएगा।
उनका कहना था कि भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में एआई को स्थानीय भाषाओं और स्थानीय जरूरतों के अनुरूप विकसित करना अनिवार्य है।
भारत की रणनीति: 10 बड़े भाषा मॉडल
कांत ने बताया कि भारत 10 बड़े भाषा मॉडल विकसित करने की दिशा में काम कर रहा है। इसके साथ ही डेटा के भंडार खोले जा रहे हैं और स्टार्टअप तथा शोधकर्ताओं को कम लागत पर कंप्यूटिंग सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं।
उन्होंने कहा कि भारत को अपने आंकड़ों, अपनी प्रतिभा और अपनी कंप्यूटिंग शक्ति को नागरिकों तक पहुंचाना होगा, ताकि एआई का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे।
ग्लोबल साउथ के लिए मॉडल
उन्होंने यह भी कहा कि जब भारत या अन्य कम विकसित देश अपने एआई मॉडल तैयार करें, तो वे अपने डेटा और स्थानीय संदर्भों पर आधारित होने चाहिए। इससे तकनीक अधिक प्रासंगिक और प्रभावी बन सकेगी।
कांत के अनुसार, दुनिया तेजी से आगे बढ़ रही है और ऐसे में प्रौद्योगिकी की शक्ति का उपयोग कम विकसित देशों के नागरिकों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए किया जाना चाहिए।
हमरी राय
अमिताभ कांत की टिप्पणी इस बात की ओर संकेत करती है कि एआई केवल तकनीकी विकास का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक संतुलन का भी प्रश्न है। यदि एआई सुलभ, बहुभाषी और जवाबदेह नहीं होगी, तो डिजिटल विभाजन और गहरा सकता है।
भारत के लिए चुनौती यह है कि नवाचार और समावेशन के बीच संतुलन बनाए रखा जाए। यदि डेटा, प्रतिभा और तकनीकी संसाधन आम नागरिकों तक पहुंचे, तो एआई वास्तव में शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक विकास के क्षेत्र में परिवर्तनकारी भूमिका निभा सकती है।
