सुप्रीम कोर्ट सख्त, कहा— ‘रोकथाम इलाज से बेहतर’, सड़कों को कुत्तों से मुक्त करना जरूरी
आवारा कुत्तों की बढ़ती समस्या पर सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कड़ी चिंता जताते हुए स्पष्ट किया कि रोकथाम इलाज से बेहतर है और इस दिशा में ठोस कदम उठाने की जरूरत है। जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने सवाल किया कि आखिर आम लोगों को सड़कों पर कुत्तों की वजह से कब तक परेशानी झेलनी पड़ेगी।
कोर्ट ने कहा कि उसका आदेश सिर्फ संस्थागत क्षेत्रों तक सीमित है, न कि सार्वजनिक सड़कों के लिए। पीठ ने दो टूक कहा कि सड़कों, स्कूलों और संस्थानों में कुत्तों की मौजूदगी से क्या हासिल होता है और उन्हें वहां से हटाने पर आपत्ति क्यों होनी चाहिए। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि भले ही कुत्ते काटें या न काटें, लेकिन वे दुर्घटनाओं का कारण बनते हैं—और यही चिंता का मूल है।
मामले की सुनवाई करीब ढाई घंटे तक चली। अगली सुनवाई 8 जनवरी सुबह 10:30 बजे से फिर शुरू होगी।
‘सड़कों को कुत्तों से साफ होना चाहिए’— कोर्ट का स्पष्ट संदेश
पीठ ने कहा कि सड़कों को कुत्तों से साफ और खाली होना चाहिए। कोर्ट ने उदाहरण देते हुए बताया कि सुबह-सुबह यह पहचानना असंभव है कि कौन सा कुत्ता किस मूड में है। यह स्थिति आम नागरिकों, बच्चों और बुजुर्गों के लिए गंभीर जोखिम पैदा करती है।
अदालत ने एक गंभीर तथ्य साझा करते हुए कहा कि पिछले 20 दिनों में जजों के साथ दो सड़क दुर्घटनाएं हुई हैं, जिनमें से एक जज अब भी रीढ़ की गंभीर चोट से जूझ रहे हैं। कोर्ट ने कहा कि जब जानवर सड़कों पर दौड़ते हैं, तो दुर्घटनाएं होना स्वाभाविक है और इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता।
सिब्बल बनाम कोर्ट: तीखी बहस
वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने पशु-कल्याण का पक्ष रखते हुए कहा कि वे यहां कुत्तों से प्रेम करने वालों के रूप में उपस्थित हैं। उन्होंने तुलना करते हुए कहा कि यदि कोई बाघ आदमखोर हो जाए, तो हम सभी बाघों को नहीं मार देते। समाधान के तौर पर उन्होंने सीएसवीआर मॉडल (Capture, Sterilize, Vaccinate, Release) का समर्थन किया और कहा कि इससे उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में कुत्तों की संख्या लगभग शून्य तक लाई गई है।
सिब्बल ने यह भी कहा कि यदि सभी कुत्तों को स्थायी शेल्टर में रखा गया तो रेबीज फैलने का खतरा बढ़ सकता है। उन्होंने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि उन्हें मंदिरों जैसे स्थानों पर कभी कुत्तों ने नहीं काटा।
इस पर कोर्ट ने व्यंग्यात्मक अंदाज में कहा, “आप भाग्यशाली हैं। लोगों और बच्चों को काटा जा रहा है।” आगे मजाकिया लहजे में कोर्ट ने कहा, “अब बस कुत्तों को काउंसलिंग देना ही बाकी रह गया है, ताकि छोड़े जाने के बाद वे न काटें।”
जब सिब्बल ने कहा कि कुत्ते सड़कों पर नहीं बल्कि परिसरों में होते हैं, तो कोर्ट ने सख्त लहजे में जवाब दिया—“क्या आप गंभीर हैं? आपकी जानकारी पुरानी लगती है। रोकथाम इलाज से बेहतर है। सड़कों को कुत्तों से मुक्त करना होगा।”
ABC नियमों पर सरकार से जवाब
कोर्ट ने केंद्र और राज्यों से पूछा कि 2018 में एनिमल बर्थ कंट्रोल (ABC) को लेकर जो सख्त निर्देश दिए गए थे, वे ठीक से लागू क्यों नहीं हुए। अदालत ने कहा कि नियमों के पालन में देरी से जनता को नुकसान नहीं होना चाहिए।
मामले में न्याय मित्र (Amicus Curiae) गौरव अग्रवाल ने बताया कि अब तक सिर्फ 10 राज्यों ने ही हलफनामा दाखिल कर यह बताया है कि वे आवारा कुत्तों की समस्या से निपटने के लिए क्या कर रहे हैं। मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक और पंजाब जैसे बड़े राज्यों ने अब तक कोई हलफनामा दाखिल नहीं किया है।
आंकड़े क्या कहते हैं?— शेल्टर बनाम नसबंदी
नेशनल एकेडमी ऑफ लीगल स्टडीज एंड रिसर्च के प्रतिनिधि के.के. वेणुगोपाल ने अदालत को बताया कि भारत में कुल 5.25 करोड़ कुत्ते हैं, जिनमें से 1 करोड़ से ज्यादा आवारा हैं। इन कुत्तों के लिए अनुमानतः 77,347 शेल्टर की जरूरत होगी (एक शेल्टर में 200 कुत्ते)।
उन्होंने बताया कि प्रति कुत्ते का रोजाना भोजन खर्च करीब ₹40 है, यानी कुल मिलाकर ₹61.81 करोड़ प्रतिदिन का खर्च आ सकता है। ये आंकड़े यह दिखाते हैं कि केवल शेल्टर मॉडल अपनाना आर्थिक और प्रशासनिक रूप से कितनी बड़ी चुनौती है।
पिछला आदेश और बदला रुख
पिछले साल यह मामला तब राष्ट्रीय चर्चा में आया था जब सुप्रीम कोर्ट की एक पीठ (जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन) ने दिल्ली नगर निगम को आवारा कुत्तों को पकड़कर शेल्टर होम में रखने का निर्देश दिया था।
इस आदेश के खिलाफ पशु अधिकार समूहों ने विरोध प्रदर्शन किए। इसके बाद मौजूदा पीठ ने रुख बदला और कहा कि स्थायी शेल्टर में रखने के बजाय टीकाकरण और नसबंदी कर कुत्तों को छोड़ा जाए। अब अदालत का फोकस सार्वजनिक सुरक्षा, दुर्घटनाओं की रोकथाम और ABC नियमों के प्रभावी क्रियान्वयन पर दिख रहा है।
कानूनी और प्रशासनिक संतुलन की चुनौती
यह मामला केवल पशु अधिकार बनाम मानव सुरक्षा का नहीं, बल्कि प्रभावी शासन का भी है। अदालत यह स्पष्ट कर चुकी है कि संस्थागत क्षेत्रों और सड़कों पर जोखिम कम करना प्राथमिकता है, जबकि पशु कल्याण के लिए वैज्ञानिक और मानवीय उपाय (जैसे ABC) को गंभीरता से लागू किया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक जानकारी और आदेशों के लिए देखें:
- Supreme Court of India: https://www.sci.gov.in
- Animal Birth Control (ABC) Rules (MoEFCC): https://moef.gov.in
Our Thoughts
आवारा कुत्तों का मुद्दा भावनाओं से नहीं, डेटा, विज्ञान और प्रशासनिक इच्छाशक्ति से सुलझेगा। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी यह याद दिलाती है कि सार्वजनिक सुरक्षा सर्वोपरि है—खासकर बच्चों और बुजुर्गों के लिए। साथ ही, पशु कल्याण भी उतना ही जरूरी है। दोनों के बीच संतुलन तभी बनेगा जब ABC नियमों को ईमानदारी से लागू किया जाए, नगर निकायों को संसाधन दिए जाएं और राज्यों से जवाबदेही तय हो।
केवल शेल्टर मॉडल आर्थिक रूप से अव्यावहारिक है, जबकि बिना निगरानी के रिलीज़ भी जोखिम बढ़ा सकता है। समाधान क्षेत्र-विशेष रणनीति, बेहतर डेटा मैपिंग, समयबद्ध नसबंदी-टीकाकरण, और संस्थागत/सड़क क्षेत्रों को जोखिम-मुक्त करने से निकलेगा। अदालत की सख्ती उम्मीद जगाती है कि अब टालमटोल नहीं, कार्रवाई होगी।
