सुप्रीम कोर्ट में असम सीमा पर अस्पताल विवाद, सेना ने सुरक्षा को लेकर जताई आपत्ति
नई दिल्ली। असम के जोरहाट जिले में भारत–बांग्लादेश सीमा से सटे एक संवेदनशील इलाके में प्रस्तावित मल्टी-स्पेशलिटी अस्पताल का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। यह अस्पताल एक सैन्य शिविर के ठीक सामने प्रस्तावित है, जिस पर भारतीय सेना ने गंभीर सुरक्षा चिंताओं का हवाला देते हुए आपत्ति दर्ज कराई है। सेना का कहना है कि इस तरह की संरचना से राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा पैदा हो सकता है।
सेना की मुख्य आपत्तियां क्या हैं
सुप्रीम कोर्ट में सेना की ओर से दलील दी गई कि अस्पताल जैसी बहुमंजिला इमारत का निर्माण ड्रोन की आवाजाही, निगरानी और लंबी दूरी की स्नाइपर राइफलों के संभावित इस्तेमाल के लिए अनुकूल स्थिति बना सकता है। सेना ने आशंका जताई कि यदि ऊंची इमारत और खुली खिड़कियां सैन्य शिविर की ओर होंगी, तो यह सुरक्षा के लिहाज से गंभीर खतरा हो सकता है।
NOC को लेकर उठा विवाद
यह मामला तब विवाद में आया जब जोरहाट विकास प्राधिकरण ने एक निजी कंपनी को अस्पताल निर्माण के लिए अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) जारी किया। सेना ने शुरुआत में इसी एनओसी पर आपत्ति जताई थी और कहा था कि बिना सुरक्षा एजेंसियों की सहमति के इस तरह की अनुमति देना उचित नहीं है, खासकर तब जब इलाका अंतरराष्ट्रीय सीमा के बेहद करीब और रणनीतिक रूप से संवेदनशील है।
सेना ने रखीं सख्त शर्तें
अब सेना ने सुप्रीम कोर्ट को यह भी बताया है कि यदि अस्पताल के निर्माण की अनुमति दी जाती है, तो उस पर कड़े सुरक्षा मानक लागू होने चाहिए। सेना के अनुसार अस्पताल परिसर के चारों ओर कम से कम 15 फीट ऊंची कंक्रीट की चारदीवारी होनी चाहिए, जिसमें स्पष्ट विभाजक लगे हों। इसके अलावा, बहुमंजिला इमारत की कोई भी खिड़की सैन्य शिविर की ओर नहीं खुलनी चाहिए, ताकि निगरानी या हमले की आशंका को कम किया जा सके।
सीमा क्षेत्र और सुरक्षा का सवाल
असम का जोरहाट क्षेत्र भारत–बांग्लादेश सीमा के पास होने के कारण पहले से ही सुरक्षा एजेंसियों की नजर में रहता है। ऐसे इलाकों में किसी भी बड़े निर्माण को लेकर सेना और अन्य सुरक्षा एजेंसियां अतिरिक्त सतर्कता बरतती हैं। सेना का तर्क है कि नागरिक विकास जरूरी है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा से कोई समझौता नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट में आगे क्या
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दोनों पक्षों की दलीलें सुनी हैं और संकेत दिए हैं कि सुरक्षा और विकास के बीच संतुलन बनाना जरूरी है। कोर्ट आने वाले दिनों में इस पर अंतिम दिशा-निर्देश दे सकता है कि अस्पताल निर्माण को किन शर्तों के साथ अनुमति दी जाए या एनओसी को लेकर क्या फैसला लिया जाए।
हमारी राय
यह मामला एक बार फिर यह सवाल खड़ा करता है कि सीमा क्षेत्रों में विकास और सुरक्षा के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। अस्पताल जैसी स्वास्थ्य सुविधाएं आम जनता के लिए बेहद जरूरी हैं, लेकिन यदि उनका स्थान सैन्य ठिकानों के पास हो, तो सुरक्षा चिंताओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सेना द्वारा उठाई गई आपत्तियां केवल आशंका नहीं, बल्कि बदलते सुरक्षा खतरों को ध्यान में रखकर दी गई चेतावनियां हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका अहम हो जाती है, जो यह तय करेगा कि किस तरह से विकास कार्यों को आगे बढ़ाया जाए, बिना राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौता किए। यदि कड़े मानकों और निगरानी के साथ समाधान निकलता है, तो यह भविष्य के लिए एक मिसाल बन सकता है।
