क्या आप फोन खरीद रहे हैं या 'कर्ज का सब्सक्रिप्शन'? "सिर्फ ₹1999 महीना" के पीछे छिपा मिडिल क्लास का दर्द और EMI का मायाजाल
नई दिल्ली, दिनांक: 15 जनवरी 2026 — भारत के मध्यम वर्ग (Middle Class) की आकांक्षाओं और हकीकत के बीच की खाई को भरने के लिए बाजार ने एक नया मंत्र खोज निकाला है— "सिर्फ ₹1,999 प्रति माह"। आज के इस दौर में, जब 50 हजार से लेकर 1.5 लाख रुपये तक के फ्लैगशिप स्मार्टफोन स्टेटस सिंबल बन चुके हैं, ईएमआई (EMI - Equated Monthly Installment) का विकल्प एक जादू की छड़ी की तरह काम कर रहा है। फेस्टिव सेल हो या किसी बड़े ब्रांड का नया लॉन्च, आसान किश्तों के वादों ने लग्जरी को हमारी जेब की पहुंच में तो ला दिया है, लेकिन वित्तीय विशेषज्ञों का मानना है कि यह सुविधा अब उपभोक्ताओं को एक अंतहीन कर्ज के चक्र (Debt Trap) में फंसा रही है।
लोग महंगे गैजेट्स खरीदकर लंबे समय के लिए ईएमआई करवा लेते हैं, यह सोचकर कि हर महीने थोड़ी रकम देने से बोझ कम होगा। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जिस फोन को आप अपनी शान समझ रहे हैं, वह असल में आपकी वित्तीय आजादी को धीरे-धीरे कैसे खत्म कर रहा है?
फोन नहीं, अब 'सब्सक्रिप्शन' खरीद रहे हैं आप
उपभोक्ता व्यवहार (Consumer Behavior) में एक बड़ा और चिंताजनक बदलाव आया है। एक समय था जब लोग अपनी गाढ़ी कमाई से फोन खरीदते थे और उसे कम से कम 3 से 4 साल तक चलाते थे। लेकिन अब यह पैटर्न पूरी तरह बदल चुका है।
अपग्रेड साइकिल: अब औसत फोन बदलने का समय घटकर 6 से 12 महीने रह गया है। इसके पीछे तकनीक का विकास कम और 'ईएमआई का लालच' ज्यादा है।
सब्सक्रिप्शन मॉडल: लोग अब फोन को एक 'संपत्ति' (Asset) या डिवाइस के तौर पर नहीं, बल्कि नेटफ्लिक्स या जिम की तरह एक 'सब्सक्रिप्शन' की तरह देख रहे हैं। एक साल ईएमआई भरी, नया मॉडल आया, पुराना एक्सचेंज किया और फिर से नई ईएमआई शुरू। कई यूजर्स तो पिछले 10 सालों से लगातार मोबाइल की किश्तें ही भर रहे हैं, बिना यह अहसास किए कि उन्होंने फोन की वास्तविक कीमत से कहीं ज्यादा चुका दिया है।
No-Cost EMI: मुफ्त नहीं है यह सौदा, समझें गणित
कंपनियां जिसे 'No-Cost EMI' (ब्याज मुक्त किश्त) कहकर प्रचारित करती हैं, वह वास्तव में कोई समाज सेवा नहीं है। इसकी असल कीमत आपकी जेब से ही जाती है, बस तरीका अलग होता है।
डिस्काउंट का नुकसान: जब आप किसी प्रोडक्ट का नकद (Upfront) भुगतान करते हैं, तो अक्सर डीलर या बैंक आपको 5% से 7% तक की सीधी छूट (Cash Discount) देते हैं। जैसे ही आप नो-कॉस्ट ईएमआई चुनते हैं, यह डिस्काउंट खत्म हो जाता है। असल में, ब्याज की रकम को ही डिस्काउंट के रूप में पहले ही जोड़ लिया जाता है।
छिपी हुई लागत (Hidden Charges): आपको लगता है कि ब्याज नहीं लग रहा, लेकिन प्रोसेसिंग फीस (Processing Fee), फाइल चार्ज और सबसे महत्वपूर्ण—ब्याज की रकम पर लगने वाला 18% जीएसटी—आपकी जेब पर अतिरिक्त बोझ डालता है। बैंक ब्याज तो माफ कर सकता है (कागजों पर), लेकिन सरकार जीएसटी नहीं छोड़ती।
पेनल्टी और सिबिल स्कोर का खतरा
ईएमआई की सबसे खतरनाक बात यह है कि यह आपको भविष्य के लिए जोखिम में डालती है।
- क्रेडिट स्कोर: अगर आप किसी कारणवश एक भी किश्त चुकाने से चूक जाते हैं (Bounce), तो न केवल भारी लेट फीस लगती है, बल्कि आपके सिबिल (CIBIL) स्कोर पर बुरा असर पड़ता है।
- भविष्य पर असर: एक खराब क्रेडिट हिस्ट्री भविष्य में आपको होम लोन, कार लोन या मेडिकल इमरजेंसी के लिए लोन मिलने की राह को बेहद मुश्किल या महंगा बना सकती है। महज एक फोन के लिए अपने वित्तीय भविष्य को दांव पर लगाना समझदारी नहीं है।
डेटा की हकीकत: 22% से 48% तक पहुंचा ग्राफ
मार्केट एनालिसिस के आंकड़े इस ट्रेंड की पुष्टि करते हैं।
- 2019: भारत में बिकने वाले स्मार्टफोन्स में से केवल 22% क्रेडिट या ईएमआई पर खरीदे जाते थे।
- 2024-25: यह आंकड़ा दोगुने से भी ज्यादा होकर 48% तक पहुंच गया है। यानी बिकने वाला हर दूसरा महंगा फोन उधारी पर लिया जा रहा है।
एक्सचेंज का मायाजाल: एक्सचेंज ऑफर के तहत पुराने फोन की जो 'बंपर कीमत' बताई जाती है, उसमें अक्सर 'एक्सचेंज बोनस' शामिल होता है। यह बोनस कंपनी अपनी जेब से नहीं देती, बल्कि यह नए फोन के मार्जिन में ही एडजस्ट होता है।
हमारी राय (The Trending People Analysis)
स्मार्टफोन आज की जरूरत है, लेकिन अपनी हैसियत से बढ़कर शौक पालना वित्तीय आत्महत्या जैसा है। 20 हजार रुपये कमाने वाला व्यक्ति अगर 1 लाख का फोन ईएमआई पर ले रहा है, तो यह 'एस्पिरेशन' (आकांक्षा) नहीं, बल्कि 'इम्पल्सिव बाइंग' (आवेगपूर्ण खरीदारी) है।
The Trending People का विश्लेषण है कि ईएमआई एक सुविधा है, इसे लत न बनाएं। नो-कॉस्ट ईएमआई के गणित को समझें और अगर संभव हो तो नकद भुगतान कर डिस्काउंट का लाभ उठाएं। फोन एक 'डेप्रिशिएटिंग एसेट' (मूल्य ह्रास वाली संपत्ति) है, जिसका दाम डब्बा खुलते ही गिर जाता है। ऐसे में उस पर ब्याज देना या अपनी सेविंग्स को ईएमआई में फंसाना समझदारी नहीं है। तकनीक का आनंद लें, लेकिन कर्ज के बोझ तले दबकर नहीं।
